भोजशाला मामले में केवल मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज नहीं, एक और पक्ष को कोर्ट ने दिया ‘प्यार’ से झटका
लंदन म्यूजियम में रखी उस मूर्ति पर अंकित शिलालेख में लिखा है, 'राजा भोज के शासनकाल में जैन धर्म की चंद्रनगरी और विद्याधरी शाखाओं के धार्मिक अधीक्षक वररुचि ने सबसे पहले माता वाग्देवी की मूर्ति बनाई, और उसके बाद तीन जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां बनाईं, और फिर अंबिका की यह सुंदर प्रतिमा तैयार की।'

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला परिसर को लेकर MP हाईकोर्ट का बहुप्रतीक्षित फैसला शुक्रवार को आ गया, जिसमें उसने इस मध्यकालीन परिसर को हिंदू धर्म से जुड़ा 'वाग्देवी सरस्वती' का मंदिर माना, साथ ही इस विवाद में मुस्लिम पक्ष को झटका देते हुए परिसर के कमाल मौला मस्जिद होने के दावे को खारिज कर दिया, इसके अलावा समुदाय के लोगों को हर शुक्रवार को परिसर में दी गई नमाज पढ़ने की अनुमति को भी रद्द कर दिया। हालांकि इस केस में एक तीसरा पक्ष भी था, जिसके दावे को मानने से हाई कोर्ट ने इनकार कर दिया। दरअसल हिंदू और मुस्लिम याचिकाकर्ताओं के साथ ही जैन समुदाय के एक सदस्य ने भी एक अलग याचिका दायर करते हुए परिसर को अपने धर्म से जुड़ा बताया था। अपनी याचिका में उन्होंने तर्क दिया गया था कि यह जगह हमेशा से एक जैन मंदिर रही है, और विवाद के केंद्र में मौजूद इंग्लैंड के म्यूजियम में रखी मूर्ति भी हिंदू देवी सरस्वती की नहीं, बल्कि जैन देवी अंबिका की है।
हालांकि कोर्ट ने इस जगह को देवी सरस्वती के मंदिर के तौर पर मान्यता देते हुए हिंदू पक्ष को सौंप दिया, और मुस्लिम पक्ष के साथ-साथ जैन पक्ष की तरफ से लगाई गई याचिका को भी खारिज कर दिया। जैन पक्ष का दावा खारिज करते हुए, कोर्ट ने कहा कि 'जैन धर्म असल में, हिंदू धर्म की ही एक एक शाखा है।' अपनी इस बात को साबित करने के लिए कोर्ट ने दो कानूनी प्रावधानों का हवाला भी दिया।
सन 1091 के शिलालेख वाली मूर्ति को लेकर था दावा
जैन पक्ष की तरफ से यह याचिका सालेक चंद जैन नाम के शख्स ने अपने वकील दिनेश पी. राजभर के जरिए दायर की थी। यह उन कई संबंधित याचिकाओं में से एक थी, जिनकी सुनवाई हाई कोर्ट की इंदौर बेंच कर रही थी। सालेक चंद जैन का मामला भोजशाला परिसर में मिली एक मूर्ति पर खुदे 1091 ईस्वी के एक शिलालेख पर आधारित था। यह वही मूर्ति है, जो कि अब लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है और जिसके वाग्देवी सरस्वती की मू्र्ति होने का दावा हिंदू पक्ष करता रहता है।
जैन पक्ष ने कहा- वह मूर्ति अंबिका देवी की है
मूर्ति पर अंकित शिलालेख के बारे मेंशुरुआत में माना जा रहा था कि मुख्य रूप से वाग्देवी का जिक्र है, जो कि सरस्वती का ही एक और नाम है। लेकिन बाद में संस्कृत और प्राकृत भाषा के प्रकांड विद्वान हरिवल्लभ भायाणी ने अपने द्वारा किए गए शोध कार्यों के बाद बताया कि इस शिलालेख का मुख्य विषय अंबिका हैं, जो कि एक जैन देवी हैं। याचिका में भी जैन पक्ष की तरफ से यही बात कही गई थी।

'वररुचि ने बनाई थी जैन देवी अंबिका की मूर्ति'
कोर्ट ने अपने 242 पन्नों के फैसले में भी इस शिलालेख का अनुवाद करते हुए इसका जिक्र किया। लंदन म्यूजियम में रखी उस मूर्ति पर अंकित शिलालेख में लिखा है, 'वररुचि- जो कि राजा भोज के शासनकाल में जैन धर्म की चंद्रनगरी और विद्याधरी शाखाओं के धार्मिक अधीक्षक थे, ने सबसे पहले माता वाग्देवी की मूर्ति बनाई, और उसके बाद तीन जैन तीर्थंकरों (जिनों) की मूर्तियां बनाईं, और फिर अंबिका की यह सुंदर प्रतिमा तैयार की।'
इसी आधार पर, याचिकाकर्ता ने यह तर्क कोर्ट को दिया कि यह मूर्ति जैन धर्म से संबंधित है, और यह जगह मूल रूप से एक जैन मंदिर और विद्या का केंद्र थी। इसके अलावा, परिसर की वास्तुकला राजस्थान के माउंट आबू में स्थित जैन मंदिरों की वास्तुकला से काफी मिलती-जुलती होने का दावा भी याचिकाकर्ता की ओर से किया गया।
ASI के साल 2003 में दिए आदेश पर जताई आपत्ति
जैन पक्ष की तरफ से भी साल 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा जारी किए गए उस आदेश पर आपत्ति जताई गई, जिसके तहत इस जगह पर पूजा-अर्चना के नियमों को तय किया गया था। उस आदेश के तहत हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों को ही इस जगह पर जाने की अनुमति दी गई थी, लेकिन जैन समुदाय को पूरी तरह से बाहर रखा गया था, जबकि याचिका के अनुसार, जैन समुदाय का इस जगह पर एक मजबूत ऐतिहासिक दावा मौजूद था।
इसके बावजूद जैन समुदाय के याचिकाकर्ता ने इस इमारत पर अपने लिए किसी भी तरह के 'विशेष स्वामित्व' की मांग नहीं की थी। उनके वकील ने साफ किया कि उनकी अर्जी केवल इस बात तक सीमित है कि उस जगह पर जैन विरासत को मान्यता दी जाए, जैन भक्तों को वहां पूजा करने की अनुमति मिले और लंदन से मूर्ति वापस लाई जाए।
हाई कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की बेंच ने मूर्ति की तस्वीरों और उस पर लिखे लेख की जांच की और अपने दिए निर्णय में उन्होंने कहा कि मूर्तिकार वररुचि ने 'दो प्रतिमाएं बनाई थीं, एक 'वाग्देवी' की और दूसरी 'अम्बा' की। ये दोनों रूप 'सरस्वती' के दिव्य स्वरूप को दर्शाते हैं।'
अदालत ने आगे कहा कि वाग्देवी की मूर्ति के आसपास दिख रही गणेश और दुर्गा की आकृतियों को हिंदू मूर्ति-कला की परंपरा के जरिए समझाया गया है, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू परंपराओं में इन देवी-देवताओं की पूजा एक साथ की जाती है। मुख्य मूर्ति के साथ दिख रही जैन मूर्तियों के बारे में अदालत ने कहा, 'देवी सरस्वती की हिंदू मूर्ति के पीछे, पद्मासन में बैठे किसी जैन तीर्थंकर या साधक या तपस्वी की मौजूदगी पूरी तरह से स्वाभाविक है, क्योंकि असल में जैन धर्म, हिंदू धर्म की ही एक शाखा है।'
भोजशाला में तीर्थंकरों की मूर्तियां मिलने पर यह कहा
अदालत ने यह भी कहा, 'भारत में, जैन धर्म और हिंदू धर्म अलग-अलग चीजें नहीं हैं। हालांकि, इन दोनों धर्मों में पूजा-पाठ के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन प्राचीन काल से ही ये दोनों धर्म एक-दूसरे के साथ-साथ विकसित हुए हैं और एक ही परम सत्ता की पूजा करते हैं। इसलिए, अक्सर जैन और हिंदू, दोनों ही परंपराओं की मूर्तियाँ एक-दूसरे के मंदिरों में मिल जाती हैं।'
'जैन व बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म का हिस्सा माना जाता है'
फैसले में यह भी कहा गया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2(1)(a) और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2(1) के तहत, जैन धर्म और बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म का ही हिस्सा माना जाता है। अदालत ने कहा कि इसलिए, उस जगह पर खुदाई के दौरान जैन तीर्थंकर की मूर्ति मिलना कोई हैरानी की बात नहीं है। लेकिन, यह ध्यान रखना जरूरी है कि भारत सरकार ने 2014 में 'राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992' के तहत जैन समुदाय को औपचारिक रूप से राष्ट्रीय धार्मिक अल्पसंख्यक के तौर पर अधिसूचित किया था।
दावा क्यों किया गया खारिज?
जैन अधिकारों से जुड़ी याचिका को खारिज करने के पीछे अदालत के तर्क देते हुए कहा कि 'कोई भी ऐतिहासिक, पुरातात्विक या ASI सर्वे यह नहीं बताता कि विवादित जगह कभी जैन मंदिर थी। अगर यह बात मान भी ली जाए कि मूर्ति मां अंबिका की हो सकती है, तब भी विवादित जगह को जैन मंदिर घोषित करने का उनका दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। मूर्ति सरस्वती की है या अंबिका की, इस बात से उनके इस दावे को कोई खास मदद नहीं मिलती कि विवादित जगह एक जैन मंदिर थी।'
अदालत ने जैन समुदाय के लोगों को उस जगह पर जाने देने, परिसर में मौजूद जैन पुरावशेषों के संरक्षण, या लंदन से उस मूर्ति को वापस लाने के संबंध में कोई निर्देश जारी नहीं किया।




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