बोझ बढ़ जाएगा; कुत्तो के लिए शेल्टर होम वाले SC के आदेश पर झारखंड सरकार ने जताई आपत्ति
आवारा कुत्तों को पकड़ कर पुन: उसी स्थान पर नहीं छोड़ने और उन्हें आश्रयगृहों में रखने के लिए राज्य सरकार द्वारा व्यवस्था करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर झारखंड सरकार ने आपत्ति जताई है।

आवारा कुत्तों को पकड़ कर पुन: उसी स्थान पर नहीं छोड़ने और उन्हें आश्रयगृहों में रखने के लिए राज्य सरकार द्वारा व्यवस्था करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर झारखंड सरकार ने आपत्ति जताई है। आपत्ति के पीछे कई तर्क देते हुए झारखंड सरकार ने फैसला लिया है कि कोर्ट के आदेश पर पुनर्विचार करने के लिए आवश्यक विधिक कार्रवाई की जाएगी। इसे लेकर नगर विकास और आवास विभाग ने आदेश जारी किया है।
विभाग का तर्क है कि कोर्ट के पारित आदेश को लागू करने से राज्य सरकार पर अत्यधिक वित्तीय बोझ बढ़ने की संभावना है। अनुमानित तौर पर झारखंड में करीब 5 लाख कुत्तों की आबादी है। यह आबादी बड़े शहरी केंद्रों पर ज्यादा घनत्व में स्थित, लगभग 50 प्रतिशत कुत्ते शहरी क्षेत्र में ही रहते हैं। ऐसी परिस्थिति में इतनी बड़ी संख्या में इन कुत्तों को आश्रयगृहों में रखे जाने के लिए वृहद अवसंरचना (रख-रखाव, खर्च) के निर्माण की आवश्यकता होगी, जिससे भारी मात्रा में वित्तीय भार राज्य सरकार पर आएगा। इसके अलावा सभी संस्थानों यथा-शैक्षणिक संस्थान (निजी/सरकारी), अस्पताल, बस स्टैंड/डिपो आदि की घेराबंदी कर कुत्तों के प्रवेश निषिद्ध करने से भी अत्यधिक वित्तीय भार आने की संभावना है।
राज्य सरकार ने कहा है कि अगले तीन माह के भीतर प्रत्येक नगरपालिका क्षेत्र में नगर विकास और ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज विभाग द्वारा अनुमंडलवार (कम से कम प्रत्येक अनुमंडल मुख्यालय में एक) पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 (एबीसी रूल. 2023) के मानकों के अनुरूप पशु आश्रय-सह-पशु जन्म नियंत्रण केंद्र स्थापित किए जायेंगे।
पशुपालन निदेशालय द्वारा अभियान चलाकर वैक्सीनेशन के आंकड़ों को बढ़ाया जाएगा। सभी संबंधित नगर निकायों एवं प्रखंडों द्वारा स्टरलाइजेशन किया जाएगा, जिससे स्टरलाइजेशन/वैक्सीनेशन में बढ़ोतरी होगी एवं राज्य स्तर पर प्रत्येक 15 दिनो में इसकी समीक्षा की जाएगी। कृषि, पशुपालन और सहकारिता विभाग द्वारा सभी शहरी स्थानीय निकाय एवं अनुमंडल मुख्यालय में तीन माह के भीतर कुत्तों को पकड़ने वाले वाहन उपलब्ध कराए जाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर पूरी योजनाओं की समीक्षा करने के लिए राज्य और जिला स्तर पर समिति गठित की जाती है। राज्य स्तर पर निदेशक, नगरीय प्रशासन निदेशालय को नोडल पदाधिकारी नामित किया जाता है।
राज्य सरकार का मानना है कि इन कुत्तों को स्थायी रूप से हटाने का सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन से एक क्षेत्रीय शून्यता पैदा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यह शून्यता भविष्य में बिना नसबंदी वाले और बिना टीकाकरण वाले कुत्तों से भर जाने की संभावना होगी। इससे पूरा पशु जन्म नियंत्रण नियम (एबीसी नियम) विफल हो जाएगा और जन सुरक्षा व रेबीज नियंत्रण संबंधी मुद्दे बने रहेंगे, जिनके समाधान के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्देश दिए गए हैं। क्रूरता का निवारण अधिनियम-1960 को बनाने की शक्ति केंद्र सरकार के पास है। राज्य सरकार द्वारा इस विषय पर पृथक एवं विरोधाभाषी कानून अथवा नियम बनाना संविधान-254 के विरुद्ध है।
उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल 07 नवंबर को पारित अपने आदेश में सभी राज्यों को आवारा कुत्तों और पशु नियंत्रण को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे। इससे पहले राज्य के मुख्य सचिव द्वारा 31 अक्तूबर को सर्वोच्च न्यायालय में शपथ पत्र दाखिल कर कुत्ते के काटने के मामले, पशु जन्म नियंत्रण केंद्र, टीकाकरण हुए कुत्ते, रेबीज संक्रमित कुत्तों की जानकारी दी गई थी। इसके अलावा न्यायालय द्वारा दिए आदेश के आलोक में राज्य सरकार ने बाद में भी कई प्रमुख जानकारी दी है।




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