mining is prohibited under 500 meter limit of forest in jharkhand high court order झारखंड हाई कोर्ट का आदेश, अब जंगलों के 500 मीटर दायरे के बाहर ही होगा खनन; 250 मीटर वाला नियम रद्द, Jharkhand Hindi News - Hindustan
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झारखंड हाई कोर्ट का आदेश, अब जंगलों के 500 मीटर दायरे के बाहर ही होगा खनन; 250 मीटर वाला नियम रद्द

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में संरक्षित जंगलों की सीमा से पत्थर खनन और क्रशर लगाने के लिए न्यूनतम दूरी 250 मीटर से बढ़ाकर 500 मीटर कर दी है। यानी अब जंगलों से 500 मीटर के दायरे के बाहर ही खनन की अनुमति रहेगी।

Wed, 22 April 2026 01:19 PMMohammad Azam लाइव हिन्दुस्तान, रांची
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झारखंड हाई कोर्ट का आदेश, अब जंगलों के 500 मीटर दायरे के बाहर ही होगा खनन; 250 मीटर वाला नियम रद्द

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में संरक्षित जंगलों की सीमा से पत्थर खनन और क्रशर लगाने के लिए न्यूनतम दूरी 250 मीटर से बढ़ाकर 500 मीटर कर दी है। यानी जंगलों से 500 मीटर के दायरे के बाहर ही खनन की अनुमति रहेगी। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने गुरुवार को पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए यह महत्वपूर्ण निर्देश दिया। मामले की अंतिम सुनवाई अब 18 जून 2026 को होगी। तब तक यह व्यवस्था जारी रहेगी।

खंडपीठ ने कहा, जेएसपीसीबी (राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) द्वारा 2015 व 2017 में जारी अधिसूचनाओं में दूरी घटा 250 मीटर की गई थी। इसपर कोर्ट ने कहा, दूरी घटाना अप्रासंगिक तथ्यों पर आधारित है। फिर कोर्ट ने इन अधिसूचनाओं को खारिज कर पहले वाली व्यवस्था यानी 500 मीटर दूरी बहाल कर दी।

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जनवरी में 1 किमी के दायरे में खनन पर रोक लगी थी

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 16 जनवरी, 2026 वाला वह आदेश, जिसमें संरक्षित जंगलों से एक किमी के दायरे में खनन पर रोक लगाई गई थी, सुप्रीम कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या पर आधारित था। सुप्रीम कोर्ट ने तीन जून 2022 और 26 अप्रैल 2023 के आदेशों में स्पष्ट किया था कि एक किमी का ईको-सेंसिटिव जोन मात्र राष्ट्रीय उद्यानों व वन्यजीव अभयारण्यों के लिए है, न कि सामान्य संरक्षित जंगलों के लिए। पत्थर खनन के लिए मात्र 250 मीटर की दूरी मनमाना है। इस संबंध में पूर्व वन अधिकारी आनंद कुमार ने जनहित अर्जी दी है। जिसमें कहा कि 250 मीटर का बफर जोन पर्यावरण के लिए घातक है।

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कोर्ट ने क्या दिया तर्क

कोर्ट ने जेएसपीसीबी की 2015 की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि समिति में ज्यादातर नौकरशाह शामिल थे। इसमें वन एवं पर्यावरण के विशेषज्ञों को शामिल नहीं किया गया। समिति ने बिना झारखंड के जंगलों की स्थिति का आकलन किए, अन्य राज्यों (बिहार, ओडिशा, पंजाब) के नियमों के तहत दूरी घटा दी।

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