accused of corruption over Rs 20 bribe, Gujarat constable dies day after acquittal 20 रुपए की घूस लेने के मामले में 30 साल लड़ी कानूनी लड़ाई, बरी होने के अगले ही दिन कांस्टेबल ने तोड़ा दम, Gujarat Hindi News - Hindustan
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20 रुपए की घूस लेने के मामले में 30 साल लड़ी कानूनी लड़ाई, बरी होने के अगले ही दिन कांस्टेबल ने तोड़ा दम

मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि अदालत से बरी होने के एक दिन बाद गुरुवार को जब प्रजापति अपने वकील नितिन गांधी से मिलने उनके ऑफिस पहुंचे तो वकील ने उन्हें सरकार से बकाया लाभों और अन्य पैसों को वसूलने के लिए आवेदन करने की सलाह दी।

Sat, 7 Feb 2026 07:09 PMSourabh Jain लाइव हिन्दुस्तान, अहमदाबाद, गुजरात
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20 रुपए की घूस लेने के मामले में 30 साल लड़ी कानूनी लड़ाई, बरी होने के अगले ही दिन कांस्टेबल ने तोड़ा दम

गुजरात से एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां पर एक पुलिस कांस्टेबल अपने ऊपर लगे 20 रुपए की रिश्वत लेने के दाग को मिटाने के लिए करीब 30 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ता रहा और आखिरकार उनकी मेहनत रंग भी लाई और हाई कोर्ट ने उन्हें इस मामले में बरी करते हुए उनके दामन से यह दाग भी मिटा दिया, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। क्योंकि अपने बेदाग होने की खुशी को वह ज्यादा देर तक सेलिब्रेट नहीं कर सके और एक दिन बाद ही नींद में उनकी मौत हो गई। खास बात यह है कि हाई कोर्ट के 4 फरवरी को दिए गए फैसले में बेगुनाह बताए जाने के बाद उन्होंने अपने वकील से कहा था, 'मेरी जिंदगी से कलंक हट गया है, अब अगर भगवान मुझे उठा भी ले, तो कोई दुख नहीं होगा।'

एसीबी ने दर्ज किया था तीन कांस्टेबलों के खिलाफ मामला

यह मामला 20 नवंबर, 1996 को तब शुरू हुआ था जब कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति समेत वेजलपुर पुलिस स्टेशन में तैनात दो अन्य कांस्टेबलों पर ट्रक ड्राइवरों से 20-20 रुपए की रिश्वत लेने का आरोप लगा था। एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा दर्ज किए गए मामले के अनुसार वह गाड़ियों को शहर में अवैध रूप से घुसने देने के बदले ट्रक ड्राइवरों से 20 रुपए की रिश्वत ले रहे थे। जिसके बाद एसीबी ने एक जाल बिछाकर तीनों को पकड़ा था और उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था। उस समय प्रजापति की उम्र करीब 34 साल थी और वह अहमदाबाद में रहते थे, लेकिन बाद में वह पाटण जिले में स्थित अपने गृहनगर में शिफ्ट हो गए थे, और वहीं से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।

ट्रायल कोर्ट ने दोषी मानकर सुनाई थी 4 साल की सजा

प्रजापति के अलावा इस मामले में दो अन्य कांस्टेबलों सेवनकुमार राठवा और नसरुल्लाह खान पर भी पैसे लेने का मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई अगले 30 साल तक चलती रही। पहले अहमदाबाद की ट्रायल कोर्ट में मामला चला, जहां हुई सुनवाई के बाद कोर्ट ने साल 2004 में तीनों को दोषी ठहराते हुए उन्हें 4-4 साल कैद की सजा सुनाई थी, साथ ही 3-3 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया था। जिसके चलते इन तीनों पुलिसकर्मियों की नौकरी चली गई थी।

ट्रायल कोर्ट के 22 साल बाद आया हाई कोर्ट का फैसला

हालांकि इसके बाद तीनों पुलिसकर्मियों ने उसी साल ट्रायल कोर्ट के फैसले को गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। जिसका फैसला 4 फरवरी को आया, जिसमें उच्च न्यायालय ने प्रजापति समेत तीनों कांस्टेबलों को रिश्वत के आरोप से बरी कर दिया। जस्टिस एसवी पिंटो ने इस मामले में बुधवार को फैसला सुनाया और घटना के 30 साल बाद तीनों कांस्टेबलों को बरी कर दिया। अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को माना कि अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही में गंभीर विसंगतियां थीं और जिस तरह से मामले की जांच की गई थी, उसमें खामियां थीं। कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार कर लिया और सजा को रद्द कर दिया।

बोले थे- अब भगवान उठा ले तो भी कोई दुख नहीं

मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि अदालत से बरी होने के एक दिन बाद गुरुवार को जब प्रजापति अपने वकील नितिन गांधी से मिलने उनके ऑफिस पहुंचे तो वकील ने उन्हें सरकार से बकाया लाभों और अन्य पैसों को वसूलने के लिए आवेदन करने की सलाह दी। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार वे इसके लिए ज्यादा इच्छुक नहीं थे, बल्कि इसी दौरान उनके मुंह से निकला कि 'अब जब मेरी जिंदगी से दाग हट गया है तो अच्छा होगा कि भगवान अब मुझे अपने पास बुला ले।'

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इस बारे में जानकारी देते हुए नितिन गांधी ने बताया कि, 'जब वह कल ऑफिस आए थे, तो बहुत खुश थे क्योंकि उन्हें बरी कर दिया गया था। मैंने उनसे कहा, अंकल आपको सरकार से मिलने वाले सभी फायदों के लिए आवेदन करना चाहिए। अगले दिन जब मैंने उन्हें फिर से फोन किया, तो पता चला कि उनकी हार्ट अटैक से मौत हो गई है।'

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