ईरान पर हमला और खामेनेई के कत्ल पर भी क्यों बेहतर है भारत की चुप्पी; एक्सपर्ट ने क्या बताया
भारत के लिए चिंता की बात यह है कि संयुक्त अरब अमीरात में 30 फीसदी आबादी भारतीय मूल की है। इसलिए हमारे हित ईरान से ज्यादा खाड़ी देशों से जुड़ते हैं। चाबहार पोर्ट और तेल को लेकर हमारे संबंध रहे हैं, लेकिन उनमें कमी है। बीते कुछ सालों में खामेनेई ने भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणियां की थीं।

अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए भीषण हमलों और सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई के कत्ल पर अब तक भारत का कोई सख्त स्टैंड नहीं है। पूरे घटनाक्रम में भारत की जो प्रतिक्रिया है, उसे चुप्पी के तौर पर ही परिभाषित किया जा रहा है। पीएम नरेंद्र मोदी ने नेतन्याहू से बात की है और संयुक्त अरब अमीरात के नेता से भी संपर्क किया है। किंतु ईरान को लेकर कोई अपडेट नहीं है। माना जा रहा है कि भारत की इसके पीछे एक रणनीति है। वह बीते कई सालों से इजरायल और खाड़ी देशों के करीब भी गया है। ऐसे में ईरान पर इस हमले के बाद भी भारत की यही नीति कायम है और यही शायद फायदे में भी है।
इस संबंध में लाइव हिन्दुस्तान से बातचीत में भू-रणनीतिक मामलों के जानकार संदीप कुमार सिंह से हमने विस्तार से बात की। उन्होंने ईरान पर हमलों को लेकर भारत की रणनीतिक चुप्पी की कई वजहें गिनाईं और बताया कि इसके क्या मायने हैं और क्या फायदे हैं। उन्होंने कहा, 'भारत को बीते एक साल के दौरान काफी टैरिफ का सामना करना पड़ा है। इजरायल की अमेरिका से बहुत करीबी है। ईरान और मिडल ईस्ट में भारत का दखल बहुत अधिक है। हमारी एक बड़ी आबादी खाड़ी देशों में काफी ज्यादा बसी है। इसके अलावा तेल और एनर्जी को लेकर भी हमारे रिश्ते अहम हैं।'
वह कहते हैं, 'भारत को शायद ही इस बात का अंदाजा रहा होगा कि अयातुल्लाह अली खामेनेई की ही हत्या हो जाएगी। भारत ने संवाद कायम करने की बात कही है, लेकिन भारत के लिए सामने यह विवशता है कि वह अन्य मुस्लिम देशों से दूरी नहीं बना सकता। अहम बात यह है कि ईरान के सुप्रीम लीडर ने बार-बार भारत के ही आंतरिक मामलों में टिप्पणी की है। यदि भारत इस मामले में ईरान का पक्ष भी लेता है तो उससे राष्ट्रीय हितों को साधा नहीं जा सकता। फिलहाल खाड़ी देश, इजरायल और अमेरिका ही हमारे साथ हैं।'
'ईरान से कभी नहीं रहा रूस जैसा संबंध'
जेएनयू में इंटरनेशनल रिलेशंस पढ़ाने वाले असिस्टेंट प्रोफेसर संदीप कुमार सिंह ने कहा कि यदि ईरान से दोस्ती की बात की जा रही है तो यह संबंध ऐसा नहीं है, जैसा रूस के साथ रहा है। हमारा रूस के साथ टाइम टेस्टेड संबंध रहा है। ईरान के साथ हमारे संबंध ऐसे नहीं रहे हैं। भारत के लिए संतुलन की नीति ही सही है। दुनिया में एक संदेश यह भी जा रहा है कि पीएम मोदी इजरायल से निकले और उधर हमले शुरू हो गए। हालांकि सच्चाई यही है कि भारत ऐसे संघर्षों को बढ़ावा नहीं देता।
'UAE में रहते हैं 30 फीसदी भारतीय, ईरान से ज्यादा अहम खाड़ी देश'
उनका कहना है कि भारत के लिए चिंता की बात यह है कि संयुक्त अरब अमीरात में 30 फीसदी आबादी भारतीय मूल की है। इसलिए हमारे हित ईरान से ज्यादा खाड़ी देशों से जुड़ते हैं। चाबहार पोर्ट और तेल को लेकर हमारे संबंध रहे हैं, लेकिन उनमें कमी है। बीते कुछ सालों में खामेनेई ने भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणियां की थीं। ऐसी स्थिति में भारत के लिए यह सही नहीं है कि वह आगे बढ़कर बात करे। भारत ने तो काफी संतुलित नीति अपनाई है। वहां हजारों प्रदर्शनकारी मारे गए, लेकिन भारत ने ईरान का आंतरिक मामला मानते हुए उस पर कोई टिप्पणी नहीं की। भारत यह जरूर चाहेगा कि जंग जल्दी समाप्त हो, लेकिन उसके लिए किसी का पक्ष लेनी उचित नहीं है। तटस्थता ही सही है।
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