ईरान पर हमले से चीन को सीधा नुकसान, फिर भी क्यों साध ली चुप्पी; क्या है इनसाइड स्टोरी
आखिर चीन इस जंग को लेकर चुप क्यों है। वह इस पर कुछ बोलने से बच क्यों रहा है? चीन की ओर से ईरानी नेता के कत्ल की निंदा की गई है। लेकिन उस एक बयान के आगे बढ़ने की जहमत चीन ने नहीं उठाई है। उसने अमेरिका या इजरायल पर किसी तरह के आर्थिक प्रतिबंध या सख्ती की बात भी नहीं की है।

अमेरिका और इजरायल के हमलों से ईरान में बड़ी तबाही हुई है। सबसे बड़ा नुकसान यही है कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई मारे गए हैं। इन हमलों से ठीक पहले तक ईरान से सस्ते तेल की जमकर खरीद चीन कर रहा था। अब जो हमला हुआ है, उससे हालात बदल गए हैं और चीन को होने वाली तेल की सप्लाई भी बाधित हुई है। फिर भी सवाल यह है कि आखिर चीन इस जंग को लेकर चुप क्यों है। वह इस पर कुछ बोलने से बच क्यों रहा है? चीन की ओर से ईरानी नेता के कत्ल की निंदा की गई है। लेकिन उस एक बयान के आगे बढ़ने की जहमत चीन ने नहीं उठाई है। उसने अमेरिका या इजरायल पर किसी तरह के आर्थिक प्रतिबंध या सख्ती की बात भी नहीं की है।
ईरान के कुल तेल निर्यात का 80 फीसदी हिस्सा चीन को ही जाता था। 2025 में चीन ने हर दिन 1.38 मिलियन बैरल तेल ईरान से खरीदा। यह चीन के कुल आयात का 14 फीसदी था। यह चीन के लिए एक बड़ा शेयर था, लेकिन यह एकमात्र ऐसा विकल्प नहीं था, जिससे चीन को कोई खास दिक्कत हो। अब भी उसके पास तेल की खरीद के लिए दो बड़े विकल्प रूस और सऊदी अरब मौजूद हैं। यही नहीं इस जंग के जोर पकड़ने से थोड़ा पहले ही चीन ने ईरान से तेल की खरीद कम कर दी थी। इसके अलावा रूस से तेल की खरीद में इजाफा कर लिया था।
जानकार मानते हैं कि ईरान ने एक बड़ी रणनीतिक चूक कर दी है। अमेरिका और इजरायल जैसी दो मिलिट्री सुपरपावर से लड़ते हुए उसने 6 मुस्लिम देशों पर ही हमला कर दिया। ऐसी स्थिति में वह अकेला खड़ा हो गया है और चीन या फिर रूस जैसे देश इतने मुल्कों के विपरीत जानकर उसका साथ देने का रिस्क शायद नहीं लेंगे। अहम बात यह है कि चीन के पास ऊर्जा के जो विकल्प मौजूद हैं, उनमें वही देश शामिल हैं, जिन पर ईरान ने अटैक किया है। ऐसी स्थिति में चीन को चुप्पी में ही फायदा दिख रहा है। चीन और ईरान के संबंध में बीते कुछ सालों में काफी बेहतर हुए थे।
इन्फ्रास्ट्रक्चर, ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और तेल की खरीद समेत कई मोर्चों पर दोनों देशों के रिश्ते आगे बढ़ रहे थे। लेकिन चीन के पास इस्लामिक दुनिया में सऊदी अरब, तुर्की जैसे विकल्प मौजूद हैं। ऐसे में वह अकेले ईरान के लिए किसी तरह की आक्रामकता नहीं दिखाना चाहता। एक्सपर्ट मानते हैं कि ईरान ने उन देशों पर हमला करके गलती की है, जिन्होंने उस पर सीधे वार नहीं किया। ऐसा करके उसने उन देशों को खुद से दूर कर लिया है, जो अब तक इस जंग में न्यूट्रल थे। अब उन देशों के लिए तटस्थता बरतते हुए ईरान के प्रति समर्थन जाहिर करना मुश्किल होगा।
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