सिनेमा और पॉपकॉर्न का क्या है कनेक्शन? फिल्म देखने वालों में क्यों इतना पॉपुलर है यह स्नैक?
सिनेमाघरों में फिल्म देखने के साथ जिस एक चीज का सबसे ज्यादा डीप कनेक्शन नजर आता है, वो है पॉपकॉर्न। लेकिन कभी सोचा है ऐसा क्यों? आखिर पॉपकॉर्न ही क्यों? कुछ और क्यों नहीं? चलिए जानते हैं पॉपकॉर्न और फिल्मों के बीच क्या है कनेक्शन?

आज के दौर में सिनेमा हॉल में फिल्म देखने जाएं और पॉपकॉर्न न खाएं, ऐसा लगभग नामुमकिन सा लगता है। मूवी और पॉपकॉर्न का कॉम्बिनेशन इतना मशहूर हो चुका है कि दोनों को एक-दूसरे से अलग करके सोचना ही मुश्किल है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शुरुआती दौर में सिनेमा हॉल्स में पॉपकॉर्न की एंट्री बिल्कुल बैन थी?
शुरू में थिएटर्स में बैन थे पॉपकॉर्न
1920 के दशक में थिएटर मालिक अपने हॉल्स को क्लासिकल थिएटर की तरह लग्जरी बनाए रखना चाहते थे। इसमें आलीशान कारपेट और आरामदायक सीटें होती थीं। सिनेमाघर मालिकों को डर लगता था कि पॉपकॉर्न के दाने फर्श पर गिरकर गंदगी फैलाएंगे, इसलिए लोगों को थिएटर के बाहर ही अपने स्नैक्स छोड़ने पड़ते थे।
शुरू में थिएटर्स के बाहर बिकते थे
फिर 1927 में जब साउंड वाली फिल्में यानी 'टॉकीज' आए, तो सिनेमा का चलन आम लोगों में बढ़ने लगा। उस वक्त तक पॉपकॉर्न पहले ही सर्कस, मेलों और सड़कों पर काफी पॉपुलर स्नैक बन चुका था। जब ज्यादा से ज्यादा लोग सिनेमा देखने आने लगे, तो स्ट्रीट वेंडर्स ने मौके को भांप लिया और थिएटर के बाहर पॉपकॉर्न बेचना शुरू कर दिया।
थिएटर मालिकों को दिखा बिजनेस
धीरे-धीरे थिएटर मालिकों को समझ आया कि इस स्नैक की सेल इतनी ज्यादा है कि वो इस बिजनेस को खुद भी संभाल सकते हैं। उन्होंने वेंडर्स को एक तय फीस पर लॉबी के भीतर पॉपकॉर्न बेचने की इजाजत दे दी। साल 1940 के दशक तक ज्यादातर सिनेमाघरों में अपने खुद के बिक्री काउंटर खोल दिए जहां दर्शक इंटरवल और मूवी शुरू होने से पहले पॉपकॉर्न और बाकी स्नैक्स खरीद सकते थे।

थिएटर और दर्शकों दोनों को भाया
जब अमेरिका और अन्य देशों में काम और अन्य चीजों को लेकर तनाव बढ़ा तो पॉपकॉर्न और सिनेमा का रिश्ता और भी मजबूत हो गया। मंदी का वक्त आया और उस वक्त एक ही चीज थी जो थिएटर में फिल्म देखने के दौरान बहुत सस्ती कीमत पर मिल जाया करती थी, यह था पॉपकॉर्न। यह थिएटर मालिकों को फायदा देता और दर्शकों की जेब पर भारी भी नहीं पड़ता। लिहाजा लोग फिल्म देखने के साथ-साथ पॉपकॉर्न का मजा लेने लगे।
विश्व युद्ध II में हुआ और पॉपुलर
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान शुगर की स्टोरेज की जाने लगी और कैंडी-मिठाइयां महंगी हो गईं, लेकिन पॉपकॉर्न पर इसका कोई असर नहीं हुआ। साल 1945 तक अमेरिका में खाए जाने वाले आधे से ज्यादा पॉपकॉर्न का सेवन मूवी थिएटर्स में ही होता था, और यह कॉम्बिनेशन पूरी तरह कल्चर का हिस्सा बन चुका था। बिजनेस के नजरिए से देखें तो पॉपकॉर्न थिएटर मालिकों के लिए सोने की चिड़िया साबित हुआ।
थिएटर्स का 85% तक प्रॉफिट
पॉपकॉर्न बनाना बेहद सस्ता है और इस पर थिएटर्स को करीब 85 परसेंट तक का मुनाफा होता है, जो उनकी कुल कमाई का 46 फीसदी हिस्सा बनता है। दर्शकों के लिए भी यह परफेक्ट स्नैक है क्योंकि इसे हाथ से आसानी से खाया जा सकता है, फिल्म देखते वक्त अलग से ध्यान देने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि इसमें कोई चम्मच-कांटे की जरूरत नहीं होती। थिएटर में अंधेरा होने के बावजूद आप आराम से इसे एन्जॉय कर सकते हैं और बहुत शोर भी नहीं होता। ताजा बने पॉपकॉर्न की महक ही इतनी लुभावनी होती है कि लोग अपने आप इसकी तरफ खिंचे चले आते हैं। तो इस तरह जिस पॉपकॉर्न को आप आज थिएटर्स में एन्जॉय करते हैं, उसकी कहानी बहुत पुरानी है।
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