Why Should Litigants Be Punished for Mistake of Lawyer? Chhattisgarh HC Significant Verdict गलती वकील की, तो सजा निर्दोष मुकदमा लड़ने वाले पक्ष को क्यों; हाई कोर्ट ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला, Chhattisgarh Hindi News - Hindustan
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गलती वकील की, तो सजा निर्दोष मुकदमा लड़ने वाले पक्ष को क्यों; हाई कोर्ट ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला

मामले की सुनवाई के बाद 8 अप्रैल को दिए गए अपने फैसले में हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में कोर्ट को उदार रवैया अपनाना चाहिए, जिसमें वकील की लापरवाही की वजह से किसी मुकदमा लड़ने वाले की गैर-मौजूदगी में फैसला सुनाया गया हो।

Thu, 9 April 2026 05:59 PMSourabh Jain लाइव हिन्दुस्तान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
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गलती वकील की, तो सजा निर्दोष मुकदमा लड़ने वाले पक्ष को क्यों; हाई कोर्ट ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि वकीलों की लापरवाही या चूक के कारण मुकदमा लड़ने वालों को परेशानी या नुकसान नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जब कोई पक्षकार वकील नियुक्त कर देता है, तो वह यह मानकर चलता है कि उसका मामला सही तरीके से पेश किया जाएगा।

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले में की, जिसमें जमीन के विवाद में फंसे कुछ लोग अपना केस ठीक से लड़ नहीं पाए, क्योंकि उनके वकील ने उन्हें ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही के बारे में ठीक से जानकारी नहीं दी थी। जिसके कारण वो नियत समय के अंदर फैसले के खिलाफ याचिका नहीं लगा पाए थे, वहीं जब उन्होंने याचिका लगाई तो निर्धारित समयसीमा गुजरने की बात कहते हुए अदालत ने उनकी अपील को ठुकरा दिया था। जिसके बाद हाईकोर्ट ने उन्हें राहत देते हुए इस मामले में हुई देरी को माफ़ कर दिया और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह याचिकाओं पर उनके गुण-दोष के आधार पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया।

वकील ने की लापरवाही, तय समय पर दर्ज नहीं हो पाया केस

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार जब ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की गैर-मौजूदगी में उनके खिलाफ फैसला सुनाया, तो उन्होंने अपने वकील को ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील दायर करने का निर्देश दिया। लेकिन वकील ने तय समयसीमा के अंदर अपील दायर नहीं की और मुवक्किल की फाइल को बस दूसरे वकील के पास भेज दिया।

माफी मांगने के बाद भी अदालत ने खारिज कर दी मांग

बाद में वकील द्वारा इस बारे में अपील दायर की गई और साथ ही अपील दायर करने में हुई देरी को लेकर एक माफी की अर्जी भी दी गई। लेकिन, संबंधित कोर्ट ने देरी को माफ करने से इनकार कर दिया और अपील को इस आधार पर खारिज कर दिया कि इसे तय कानूनी समय-सीमा के अंदर दायर नहीं किया गया था। इसके बाद, परेशान लोगों ने राहत पाने के लिए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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हाई कोर्ट ने कहा- उदार रवैया अपनाना चाहिए

मामले की सुनवाई के बाद 8 अप्रैल को दिए गए अपने फैसले में हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में कोर्ट को उदार रवैया अपनाना चाहिए, जिसमें वकील की लापरवाही की वजह से किसी मुकदमा लड़ने वाले की गैर-मौजूदगी में फैसला सुनाया गया हो।

हाई कोर्ट ने दिया SC के फैसले का उदाहरण

सुप्रीम कोर्ट के सुनाए एक फैसले का उदाहरण देते हुए हाई कोर्ट ने कहा, 'माननीय उच्चतम न्यायालय ने रफीक बनाम मुंशीलाल (1981) केस में यह फैसला दिया था कि किसी मुकदमा लड़ने वाले को उसके वकील की गलती, लापरवाही या निष्क्रियता की वजह से परेशानी नहीं होनी चाहिए। एक बार जब कोई पक्ष किसी वकील को नियुक्त कर लेता है और उसे केस लड़ने की जिम्मेदारी सौंप देता है, तो उसे यह मानने का अधिकार है कि वकील कोर्ट के सामने उसका ठीक से प्रतिनिधित्व करेगा, और साथ ही मुकदमा लड़ने वाले से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह लगातार कार्यवाही पर नजर रखे या वकील पर पहरेदार की तरह निगरानी करे। इसलिए, निर्दोष पक्ष को उसके वकील की चूक के लिए सजा नहीं मिलनी चाहिए।'

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पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए जमीन बेचने का था मामला

यह मामला प्रदेश के बलौदा बाजार जिले के किरवाई और दरचुरा गांवों में खेती की जमीन को लेकर कमल प्रसाद द्वारा दायर एक दीवानी मुकदमे से जुड़ा था। कमल प्रसाद ने आरोप लगाया था कि जयराम दुबे नाम के एक व्यक्ति ने एक फर्जी 'पावर ऑफ अटॉर्नी' (मुख्तारनामा) तैयार करके उसकी जमीन कई खरीदारों को बेच दी। हालांकि जमीन खरीदने वालों (प्रतिवादियों) ने सिविल कोर्ट के सामने आरोपों का विरोध करते हुए यह तर्क दिया कि पावर ऑफ अटॉर्नी को सही तरीके से निष्पादित किया गया था।

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उन्होंने दावा किया कि बिक्री दुबे के माध्यम से की गई थी, जो अधिकृत पावर ऑफ अटॉर्नी धारक थे, और ये सौदे विधिवत पंजीकृत थे। हालांकि, लिखित बयान दाखिल करने के बाद, प्रतिवादियों ने सबूत पेश करने के चरण में मुकदमे की कार्यवाही में भाग नहीं लिया, जिसके बाद ट्रायल कोर्ट ने उनकी बात सुने बिना कार्यवाही आगे बढ़ा दी और फैसला सुना दिया था।

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