UPSC : क्या यूपीएससी CSE प्रीलिम्स के CSAT पेपर में होगा बड़ा बदलाव, संसदीय समिति ने आयोग से क्या कहा
UPSC CSE CSAT : संसदीय समिति ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे नॉन-साइंस छात्रों को सीसैट के वर्तमान पैटर्न के चलते हो रहे नुकसान की बात उठाई है। समिति ने यूपीएससी से एप्टीट्यूड पेपर की समीक्षा करने के लिए कहा है।

UPSC CSE CSAT : एक संसदीय स्थायी समिति ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) से सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के एप्टीट्यूड टेस्ट सीसैट (CSAT) की व्यापक समीक्षा करने की सिफारिश की है। समिति का कहना है कि यूपीएससी सीएसई प्रीलिम्स का सीसैट पेपर नॉन-साइंस और नॉन-क्वांटिटेटिव शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के लिए काफी मुश्किलें पैदा करता है। राज्यसभा में बीजेपी सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी रहे बृज लाल की अध्यक्षता वाली इस समिति ने कहा कि आयोग को सीसैट पेपर को तर्कसंगत बनाने के लिए उसकी समीक्षा करनी चाहिए। इस समीक्षा में सीसैट का सिलेबस और उसकी कठिनाई का स्तर भी शामिल होना चाहिए, ताकि विभिन्न शैक्षणिक पृष्ठभूमियों के उम्मीदवारों पर इसके प्रभाव का आकलन किया जा सके।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक यह सिफारिश कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी विभागीय संसदीय स्थायी समिति की 160वीं रिपोर्ट में की गई थी। यह रिपोर्ट 16 मार्च, 2026 को राज्यसभा में प्रस्तुत की गई थी और उसी दिन लोकसभा के पटल पर भी रखी गई थी।
क्या है सीसैट और कितना टेढ़ा है इसका पैटर्न
आपको बता दें कि यूपीएससी सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में दो पेपर होते हैं - पेपर 1 जनरल स्टडीज का होता है और दूसरा पेपर सीसैट (CSAT) का होता है। सीसैट का पैटर्न ऐसा होता है कि बहुत से अभ्यर्थी तो कई अटेम्प्ट के बाद भी प्रीलिम्स पास नहीं कर पाते। कई अभ्यर्थी ऐसे होते हैं जो पिछले प्रयासों में इंटरव्यू व मेन्स तक पहुंचने के बावजूद प्रीलिम्स में गच्चा खा जाते हैं। प्रीलिम्स में सीसैट ( CSAT ) के पेपर से निपटना ज्यादातर अभ्यर्थियों के लिए चुनौती रहता है खासतौर पर आर्ट्स बैकग्राउंड वालों के लिए। बताया जाता है कि इसका एप्टीट्यूट व क्वांटिटेटिव वाला हिस्सा आर्ट्स वालों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी करता है जबकि मैथ्स, साइंस, इंजीनियरिंग बैकग्राउंड वालों को इसमें आसानी होती है।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि सीसैट पेपर का झुकाव ज्यादातर क्वांटिटेटिव और एनालिटिकल प्रश्नों की ओर होता है। पेपर के इस स्वरूप से ग्रामीण व पिछड़े इलाकों और दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले उम्मीदवारों को इसे क्रैक करने में दिक्कत होती है, क्योंकि उनके पास विशेष कोचिंग या तैयारी का सहारा सीमित होता है। समिति ने याद दिलाया कि सिविल सेवा परीक्षा का मूल उद्देश्य हमेशा से अलग-अलग शैक्षणिक क्षेत्रों से प्रतिभाओं को आकर्षित करना रहा है इसलिए सीसैट के पैटर्न और स्तर की समीक्षा करके सभी छात्रों के लिए बराबरी का मौका सुनिश्चित करना चाहिए। समिति ने स्पष्ट कहा कि भविष्य के सिविल सेवकों में विश्लेषणात्मक क्षमता, कॉम्प्रीहेंशन और निर्णय लेने की क्षमता जांचना जरूरी है, लेकिन प्रारंभिक परीक्षा में सभी स्ट्रीम विज्ञान,कला,वाणिज्य आदि के छात्रों को समान अवसर मिलना भी उतना ही जरूरी है। समिति ने सुझाव दिया कि इस समीक्षा को छात्रों के परफॉर्मेंस पैटर्न का वास्तविक डेटा लेकर किया जाए।
संसद में भी गूंजा था मुद्दा
करीब एक माह पहले राज्यसभा में भारतीय जनता पार्टी के सांसद बृजलाल ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के एप्टीट्यूड टेस्ट (सीसैट) को खत्म करने या तर्कसंगत बनाने की मांग करते हुए कहा था कि यह परीक्षा सिविल सेवाओं में विविधता के रास्ते में बाधा बन रही है। उच्च सदन में शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए बृजलाल ने कहा कि सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा आगामी 24 तारीख को होने वाली है। बृजलाल ने कहा 'सीसैट एक क्वालीफाइंग पेपर है, जिसमें न्यूनतम 33 प्रतिशत यानी 66 अंक लाना अनिवार्य है। यदि कोई अभ्यर्थी सीसैट में पास नहीं होता, तो जीएस-1 में उसकी उत्तर पुस्तिका की जांच ही नहीं की जाती।' उन्होंने कहा कि इस वजह से प्रतिनिधित्व असंतुलित हो गया है। सफल उम्मीदवारों में करीब 65 प्रतिशत इंजीनियर होते हैं, जबकि ह्यूमैनिटीज और आर्ट्स वर्ग के अभ्यर्थियों को सीसैट के तकनीकी, गणित आधारित प्रश्नों में कठिनाई होती है।
सीसैट को समाप्त किया जाए, समान अवसर मिले
इसे सिविल सेवाओं में विविधता के लिए सबसे बड़ी बाधा बताते हुए बृजलाल ने सरकार से मांग की कि या तो सीसैट को समाप्त किया जाए या इसे इस तरह तर्कसंगत बनाया जाए कि इंजीनियरिंग, विज्ञान, चिकित्सा और कला वर्ग, सभी पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित हो सके। उन्होंने पारदर्शिता की कमी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि सीसैट में असफल होने वाले अभ्यर्थियों को न तो उनके अंक बताए जाते हैं और न ही कोई फीडबैक दिया जाता है, जबकि केवल सफल उम्मीदवारों को ही उनके अंक मिलते हैं। उन्होंने कहा, पारदर्शिता की कमी समाप्त होनी चाहिए, ताकि सिविल सेवा भर्ती प्रक्रिया में न्याय और समानता सुनिश्चित की जा सके।




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