TET : 25 लाख शिक्षकों की नौकरी पर खतरा कायम, टीईटी अनिवार्यता पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट, लेटेस्ट अपडेट
टीईटी अनिवार्यता मामले में प्रभावित लाखों शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के आसार कम ही दिख रहे हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि शिक्षक केवल अपनी नौकरी की सुरक्षा के बारे में न सोचें, बल्कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने पर भी ध्यान दें।

TET : टीईटी अनिवार्यता मामले में देश के लाखों शिक्षकों की नौकरी पर खतरा कायम है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी से नौकरी की अनिश्चतितता झेल रहे शिक्षकों को राहत के आसार कम लग रहे हैं। देश की शीर्ष अदालत ने राहत की मांग कर रहे शिक्षकों को दो टूक कहा है कि वे स्वार्थी न बनें और केवल अपनी नौकरी की सुरक्षा के बारे में ही न सोचें, बल्कि उन बच्चों के बारे में भी विचार करें जिन्हें क्वालिटी वाली एजुकेशन की आवश्यकता है। अदालत ने यह कड़ी टिप्पणी तब की जब वह मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों तथा पश्चिम बंगाल व केरल के शिक्षक संघों द्वारा दायर की गई कईं टीईटी अनिवार्यता विरोधी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में सितंबर 2025 के सर्वोच्छ न्यायालय के उस फैसले की समीक्षा की मांग की गई थी, जिसमें देशभर के गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले कार्यरत शिक्षकों को दो वर्षों के भीतर शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करने का निर्देश दिया गया था।
स्कूल टीचरों से खाली हो जाएंगे
तमिलनाडु ने तर्क दिया था कि इस फैसले से अकेले उस राज्य में लगभग चार लाख शिक्षक प्रभावित होंगे। राज्य ने यह भी कहा था कि यदि इसे जमीनी स्तर पर लागू किया गया, तो राज्य को शिक्षकों के बिना कक्षाएं चलानी पड़ेंगी। स्कूल टीचरों से खाली हो जाएंगे। द हिन्दू की एक रिपोर्ट के मुताबिक न्यायमूर्ति दिपांकर दत्ता ने कहा, 'बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम (शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009) बच्चों के लिए बनाया गया है। केवल अपनी नौकरी की सुरक्षा के बारे में सोचकर मतलबी मत बनिए और यह मत कहिए कि मुझे केवल अदालत से अपनी नौकरी की सुरक्षा के आदेश चाहिए और मैं बच्चों के बारे में नहीं सोचूंगा।'वे न्यायमूर्ति मनमोहन के साथ गठित पीठ की अध्यक्षता कर रहे थे और समीक्षा याचिकाकर्ताओं पर जवाब दे रहे थे।
जस्टिस दत्ता ने याद दिलाई टीईटी वाली धारा
जस्टिस दत्ता ने शिक्षा का अधिकार 2009 अधिनियम की धारा 23(2) का जिक्र किया, जिसमें प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी और शिक्षक शिक्षा संस्थानों की अपर्याप्तता के मामलों में शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्य योग्यता हासिल करने के लिए पांच वर्ष का समय दिया गया है। इसके बाद न्यायाधीश ने धारा 23(2) के दूसरे प्रावधान की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसे 2017 में अधिनियम में संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था। इसमें 31 मार्च 2015 तक नियुक्त या कार्यरत उन शिक्षकों को अतिरिक्त राहत दी गई थी, जिनके पास न्यूनतम आवश्यक शैक्षणिक योग्यता नहीं थी। उन्हें यह योग्यता प्राप्त करने के लिए चार वर्ष का अतिरिक्त समय दिया गया था।
वर्षों से कार्यरत टीचरों के अधिकारों को उल्लंघन
उत्तर प्रदेश की ओर से एडिश्नल सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी, मध्य प्रदेश की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी और राकेश द्विवेदी तथा देसीया अध्यापक परिषद (NTU केरल) की ओर से टॉमी चाको सहित अन्य वकीलों ने कहा कि टीईटी की अनिवार्यता को पिछली तारीख से लागू करना उन अनुभवी शिक्षकों के अधिकारों का उल्लंघन है, जो दशकों से सेवा में हैं और अपने काम में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।
कोर्ट ने सिर्फ कानून में दी गई टीचरों की न्यूनतम अनिवार्य योग्यता को दोहराया
जस्टिस मनमोहन ने कहा कि अदालत ने शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता की वैधानिक अनिवार्यता को केवल दोहराया है, जो कि टीईटी पास करना है। जस्टिस मनमोहन ने याचिकाकर्ताओं से पूछा, 'बेहतर शिक्षक पाने के लिए ही उच्च शैक्षणिक योग्यता की मांग की जाती है। जब तक किसी बच्चे को अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा नहीं मिलेगी, तब तक वह कैसे आगे बढ़ेगा?'
पुनर्विचार याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इन पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है।
क्या है पूरा मामला
आपको बता दें कि टीचरों को नौकरी में बने रहने या प्रमोशन पाने के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को अनिवार्य करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से देश भर के हजारों प्राइमरी शिक्षकों की नौकरी पर तलवार लटक गई है। यूपी, झारखंड, एमपी व राजस्थान समेत देश के विभिन्न राज्यों में ऐसे लाखों शिक्षक हैं जो बगैर टीईटी पास किए वर्षों से स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। अब इन टीचरों को 2 साल ( सितंबर 2025 - कोर्ट के फैसले की तिथि से ) में टीईटी पास करना ही होगा वरना या तो इन्हें इस्तीफा देना होगा या फिर इन्हें जबरन रिटायर कर दिया जाएगा। इस कड़े फैसले से सिर्फ उन्हें छूट मिलेगी जिनकी नौकरी 5 साल की बची है। लेकिन इन्हें भी अगर प्रमोशन चाहिए तो टीईटी पास करना ही पड़ेगा। सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किए जाने के फैसले के खिलाफ तमिलनाडु, यूपी, मध्य प्रदेश समेत कई राज्य पुनर्विचार याचिका दायर कर चुके हैं।




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