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चलना मुश्किल था मां ने उठाया हर बोझ; अब बेटा बना अफसर, UPSC में हासिल की फतह

nitish kumar upsc success story: हरियाणा के नितीश कुमार ने कठिन परिस्थितियों और शारीरिक चुनौतियों के बावजूद यूपीएससी 2024 में सफलता हासिल की। उन्होंने अपनी इस सफलता के जरिए मां के संघर्ष और अपने धैर्य की जो कहानी लिखी है वो मिसाल है।

Sat, 18 April 2026 03:19 PMHimanshu Tiwari लाइव हिन्दुस्तान
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चलना मुश्किल था मां ने उठाया हर बोझ; अब बेटा बना अफसर, UPSC में हासिल की फतह

nitish kumar upsc success story: कहते हैं मन में कुछ बनने का निश्चय कर लिया हो तो कठिन से कठिन परिस्थिति भी किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। ऐसी ही एक कहानी हरियाणा के नीतीश कुमार की है जिन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों को झेलते हुए यूपीएससी में कामयाबी हासिल की है। मगर नीतीश की इस कामयाबी में सिर्फ उनका ही हाथ नहीं बल्कि उनकी मां भी इसमें बराबर की सहभागी हैं। जब नीतीश ने यूपीएससी 2024 के रिजल्ट में 847 रैंक हासिल की तो सबसे पहले उनके मन में सबसे पहला ख्याल अपनी मां का आया। वही मां, जिनके कंधों पर बैठकर उन्होंने स्कूल तक का सफर तय किया था। आइए जानते हैं इस मां के संघर्ष और बेटे के सपनों की उड़ान की अनोखी कहानी के बारे में...

बचपन से ही मुश्किलों से सामना

नितीश का जन्म हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के खटोटी कला गांव में हुआ। उनका बचपन बाकी बच्चों जैसा नहीं था। जहां दूसरे बच्चे खेलते कूदते बड़े होते हैं, वहीं नितीश को बहुत छोटी उम्र में ही शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। चार पांच साल की उम्र में ही उन्हें चलने फिरने में दिक्कत होने लगी। घर की आर्थिक स्थिति भी बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन उनके माता पिता ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने हर संभव इलाज करवाने की कोशिश की। कई डॉक्टरों के पास गए, कई उपाय अपनाए लेकिन कोई स्पष्ट समाधान नहीं मिला। फिर एक दिन गांव के लोगों की सलाह पर परिवार उन्हें जोधपुर के एक आध्यात्मिक केंद्र ले गया। वहां से पूरी तरह ठीक तो नहीं हुए, लेकिन उनकी स्थिति इतनी बेहतर जरूर हो गई कि वे पढ़ाई की ओर ध्यान दे सकें।

घर से शुरू हुई पढ़ाई

नितीश की पढ़ाई किसी स्कूल से नहीं बल्कि उनके घर से शुरू हुई। शारीरिक परेशानी के कारण वे शुरू में स्कूल नहीं जा पाए। उन्होंने घर पर ही किताबों से दोस्ती कर ली। अखबार उनके लिए दुनिया को समझने का जरिया बन गया। धीरे-धीरे उन्होंने खुद ही पढ़ना सीख लिया। उनकी लगन इतनी गहरी थी कि गांव में आए कुछ शिक्षक जो जनगणना के काम से वहां पहुंचे थे, उनकी प्रतिभा से प्रभावित हो गए। उन्होंने नितीश के परिवार को समझाया कि बच्चे को स्कूल जरूर भेजना चाहिए।

देर से शुरू लेकिन तेजी से आगे बढ़े

कक्षा 7 से नितीश ने गांव के सरकारी स्कूल में दाखिला लिया। शुरुआत भले देर से हुई लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत से इस कमी को जल्दी ही पूरा कर लिया। आगे की पढ़ाई के लिए वे नारनौल के एक निजी स्कूल गए, जहां स्कूल प्रशासन ने उनकी फीस माफ कर दी। यह मदद उनके लिए बहुत बड़ी थी। उन्होंने स्नातक और फिर हिंदी में स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई पूरी की। हर कदम उनके लिए सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि हालात पर जीत थी।

मां का त्याग बना सबसे बड़ी ताकत

नितीश की कहानी उनकी मां के बिना अधूरी है। उनकी शारीरिक स्थिति के कारण कहीं भी जाना आसान नहीं था। ऐसे में उनकी मां ही उनका सहारा बनीं। कई सालों तक उन्होंने अपने बेटे को खुद कंधों पर बैठाकर स्कूल पहुंचाया। यह कोई एक दिन या एक हफ्ते की बात नहीं थी बल्कि रोज का सिलसिला था। घर के काम, खेत की जिम्मेदारी और बेटे की पढ़ाई सब कुछ उन्होंने साथ संभाला। उन्होंने सिर्फ नितीश को उठाया ही नहीं, बल्कि उनका हौसला भी हमेशा ऊंचा रखा। कभी उन्हें कमजोर महसूस नहीं होने दिया।

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4 प्रयासों में मिली असफलता

नितीश ने कॉलेज के दौरान ही यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी थी। लेकिन उनके लिए यह सफर आसान नहीं था। बड़े शहरों में जाकर कोचिंग करना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने ऑनलाइन पढ़ाई का रास्ता चुना। शुरुआती प्रयास सफल नहीं रहे। एक दो नहीं, बल्कि चार बार उन्हें असफलता का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। धीरे धीरे उन्होंने अपनी गलतियों को समझा। उन्हें एहसास हुआ कि ज्यादा किताबें पढ़ने से ज्यादा जरूरी है सही चीजों को बार बार पढ़ना। उन्होंने सीमित अध्ययन सामग्री पर ध्यान देना शुरू किया और बार बार दोहराव किया। पिछले सालों के प्रश्नपत्रों का अभ्यास किया, टेस्ट सीरीज दी और उत्तर लिखने की कला को बेहतर बनाया। अखबार पढ़ना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया।

मानसिक मजबूती ने बदली दिशा

नितीश की सफलता सिर्फ पढ़ाई की वजह से नहीं, बल्कि उनके मजबूत मनोबल की वजह से भी है। उन्होंने कभी खुद को कमजोर नहीं माना। परिवार का साथ, खासकर मां का भरोसा, उन्हें हर मुश्किल में संभालता रहा। साथ ही उन्होंने आध्यात्मिकता को भी अपने जीवन का हिस्सा बनाया। गीता के विचार, ध्यान और जप ने उन्हें मानसिक संतुलन दिया।

जब मेहनत रंग लाई

जब रिजल्ट आया, तो यह सिर्फ एक रैंक नहीं थी। यह सालों की मेहनत, संघर्ष और मां के त्याग का फल था। उस समय उनकी मां खेत में काम कर रही थीं। जब नितीश ने उन्हें अपनी सफलता के बारे में बताया, तो वह पल सिर्फ खुशी का नहीं बल्कि भावनाओं का सैलाब था।

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