बिना दिल्ली गए, सिर्फ ऑनलाइन पढ़ाई पर किया भरोसा... शांभवी तिवारी ने कैसे गाड़े UPSC में झंडे?
upsc success story shambhavi tiwari : यूपीएससी 2025 में 46वीं रैंक हासिल करने वाली शांभवी तिवारी की कहानी हर युवा के लिए एक मिसाल है। लगातार असफलता और सीसैट में फेल होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।

upsc success story shambhavi tiwari : जिंदगी में जब सब कुछ खत्म होता सा लगे तो समझ लीजिए कि वही वक्त एक नई शुरुआत का है। असफलताएं इंसान को तोड़ती नहीं, बल्कि भीतर से तराशती हैं। उत्तराखंड के शांत और हरे भरे शहर पंतनगर की रहने वाली शांभवी तिवारी का सफर कुछ ऐसा ही है। ये उस आम लड़की की कहानी है जिसने शुरुआती दो प्रयासों में प्रीलिम्स तक क्लीयर नहीं किया। एक बार तो सीसैट (CSAT) के पेपर ने ऐसा तगड़ा झटका दिया कि पूरा एक साल ही हाथ से फिसल गया। लेकिन, शांभवी ने हार मानकर बैठ जाने के बजाय अपनी कमियों को पहचाना, रणनीति बदली और यूपीएससी सीएसई 2025 में 46वीं रैंक हासिल कर इतिहास रच दिया। आइए जानते हैं शांभवी तिवारी की सफलता की कहानी…
बचपन में ही पड़ गए थे जन सेवा के बीच
शांभवी का बचपन बड़े ही सुकून भरे माहौल में बीता। उनका भविष्य उसी घर में खामोशी से आकार ले रहा था जहां वह पली बढ़ीं। महज चार महीने की उम्र से ही उनकी परवरिश उनके नाना नानी ने की। हालांकि उनके पिता एक प्राइवेट स्कूल में टीचर और मां सरकारी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर थीं, लेकिन शांभवी की दुनिया उनके नाना नानी के इर्द गिर्द ही बुनी गई। इसके पीछे वजह बहुत साफ थी जिंदगी में एक ठहराव और स्थिरता लाना।
उनके नाना जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में प्लांट पैथोलॉजी के हेड और एक जाने माने वैज्ञानिक थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन विज्ञान के जरिए किसानों की भलाई और फसलों की नई किस्में विकसित करने में गुजार दिया। उन्हें दिन रात काम करता देख शांभवी को समझ आने लगा कि लोगों की सेवा करना महज कोई किताबी कॉन्सेप्ट नहीं, बल्कि जिंदगी जीने का एक सलीका है। यहीं से उनके मन में पब्लिक सर्विस की राह पर चलने का सपना पनपने लगा।
मशीनों से हटकर इंसानों को समझने का फैसला
शांभवी की शुरुआती पढ़ाई पंतनगर के ही कैंपस स्कूल से हुई। इसके बाद उन्होंने 2021 में उसी यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री पूरी की। पहली नजर में उनका करियर पूरी तरह से टेक्निकल फील्ड की तरफ जाता दिख रहा था। लेकिन पढ़ाई के दौरान ही उनका झुकाव मशीनों से हटकर समाज और इंसानों की तरफ होने लगा। जब यूपीएससी के लिए ऑप्शनल सब्जेक्ट चुनने की बारी आई, तो उन्होंने बहुत ही कैलकुलेटेड कदम उठाया। कॉलेज की एक काउंसलिंग के दौरान उन्हें एंथ्रोपोलॉजी का सुझाव मिला। उनका मानना था कि इसका सिलेबस ना सिर्फ छोटा और संभाला जा सकने वाला है, बल्कि यह समाज और सामाजिक न्याय के असल मुद्दों से गहराई से जुड़ता है। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग उनकी अकादमिक नींव जरूर थी, लेकिन एंथ्रोपोलॉजी वह चश्मा बन गया जिससे वह उस दुनिया को समझ सकती थीं, जिसे बदलने की वह ख्वाहिश रखती थीं।
दो प्रयासों में नहीं पास हुआ प्रीलिम्स
शांभवी का यूपीएससी का यह सफर कोई रातों रात मिली कामयाबी का किस्सा नहीं है। पहले दो प्रयासों में बात प्रीलिम्स के स्टेज से आगे ही नहीं बढ़ पाई। ना कोई रैंक, ना कोई इंटरव्यू की कॉल। बस फिर से जीरो से शुरू करने की वही चुभती हुई हकीकत। लेकिन इस हार ने उन्हें मायूस करने के बजाय सोचने पर मजबूर किया। उन्होंने अपनी गलतियों का बारीक एनालिसिस किया। अपने पहले प्रयास में उन्होंने एक बहुत बड़ी भूल की थी कि पिछले सालों के सवालों को समझने के बजाए उन्हें रट लिया था। वह खुद मानती हैं, "मुझे लगता था कि पीवाईक्यू रट लेना काफी है। लेकिन बाद में मुझे समझ आया कि हर सवाल के हर ऑप्शन की चीर फाड़ करना और बैकवर्ड लिंकेज बनाना कितना जरूरी है।" इस एक छोटे से बदलाव ने पूरे खेल को पलट कर रख दिया। उनके प्रीलिम्स के नंबर, जो पहले 85 के आसपास अटक जाते थे, वह अगले प्रयासों में 100 के पार जाने लगे।
वो एक चूक जिसने छीन लिया पूरा साल
तैयारी जब सही ट्रैक पर आ रही थी, तभी एक और बड़ी ठोकर लगी। एक अटेंप्ट में वह सीसैट के पेपर में फेल हो गईं। उनका स्कोर सिर्फ 65 रह गया। असल में इंजीनियरिंग बैकग्राउंड होने की वजह से उन्होंने सीसैट को बहुत हल्के में ले लिया था। उनकी इस एक लापरवाही की कीमत उन्हें अपना पूरा एक साल देकर चुकानी पड़ी। वह बिना किसी झिझक के कहती हैं, “मुझे एहसास हुआ कि मैं सीसैट को नजरअंदाज कर रही थी। उसके बाद मैंने इसकी बहुत जम कर और गहराई से तैयारी की।”
रैंक 445 से रैंक 46 तक की बड़ी छलांग
अपने तीसरे प्रयास में शांभवी ने जोरदार वापसी की और 445वीं रैंक हासिल कर इंडियन रेलवे मैनेजमेंट सर्विस (ट्रैफिक) में अपनी जगह पक्की कर ली। यह एक बड़ा मुकाम था, लेकिन मंजिल अभी बाकी थी। इसलिए, उन्होंने अपना चौथा अटेंप्ट दिया। इस बार उनकी तैयारी में गजब की धार थी। उन्होंने अपने नोट्स रिफाइन किए, आंसर लिखने के स्ट्रक्चर में सुधार किया और कॉन्सेप्ट को रटने के बजाय गहराई से समझने पर फोकस किया। नतीजा सबके सामने था—यूपीएससी सीएसई 2025 में ऑल इंडिया 46वीं रैंक। यह छलांग किसी किस्मत का नतीजा नहीं थी, बल्कि बार बार की गई मेहनत और हर हार से ली गई सीख का परिणाम थी।
कोचिंग हब से दूर घर से बनाई अपनी रणनीति
आज के डिजिटल दौर में जहां लाखों छात्र कोचिंग के लिए दिल्ली जैसे बड़े शहरों का रुख करते हैं, वहीं शांभवी ने अपने घर पर रहकर ही यह मुकाम हासिल किया। उनकी रणनीति बेहद सादी मगर सख्त अनुशासन से भरी थी -
- पूरी तरह से ऑनलाइन सोर्सेज और यूट्यूब के मैराथन लेक्चर्स पर भरोसा।
- किताबों की सिर्फ ऊपरी रीडिंग के बजाय पुराने सवालों का गहरा एनालिसिस।
- लगातार पन्ने भरने के बजाय टेस्ट सीरीज के सवालों पर खूब ब्रेनस्टॉर्मिंग।
- अपने नोट्स में हमेशा नए और जरूरी कीवर्ड्स को जोड़ना।
मेंस के लिए उन्होंने लिखने की मात्रा के बजाय विचारों की स्पष्टता पर जोर दिया। वहीं इंटरव्यू की तैयारी के लिए उन्होंने खूब मॉक इंटरव्यू दिए, ताकि सालों से घर में बैठकर तैयारी करने के कारण जो झिझक थी, वह दूर हो सके। इस दौरान उन्हें आईपीएस अधिकारी महेश भागवत का मार्गदर्शन भी मिला, जिन्होंने उनके DAF (डिटेल्ड एप्लीकेशन फॉर्म) को निखारने और पर्सनैलिटी टेस्ट के लिए उन्हें सही दिशा दिखाने में बड़ी मदद की।
तनाव के बीच खुद को कैसे किया शांत
तैयारी के उस भारी तनाव के बीच भी शांभवी ने खुद को रिलैक्स रखने के कुछ खास तरीके खोज निकाले थे। वह गुजरात के कच्छ की मशहूर 'लिपन आर्ट' करती थीं। उन्होंने अपनी छत पर एक छोटा सा किचन गार्डन भी बना रखा था। और जब भी दिमाग को एक ब्रेक की जरूरत महसूस होती, वह डांस का सहारा लेती थीं। ये शौक उनके लिए कोई भटकाव नहीं थे, बल्कि खुद को मानसिक तौर पर मजबूत और एकाग्र रखने का एक जरिया थे।
कैसी अफसर बनना चाहती हैं शांभवी?
इंडियन मास्टरमाइंड को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा अब जब वह प्रशासनिक सेवा के सिस्टम में कदम रखने जा रही हैं, तो उनके इरादे जमीन से जुड़े हुए हैं। वह कहती हैं, "मेरा पूरा फोकस इस बात पर रहेगा कि सरकारी योजनाएं और सुविधाएं आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचें।" उनका नजरिया उस अनुभव से बना है जहां वह आम आदमी की परेशानी को समझती हैं। उनका मानना है कि सेक्टर कोई भी हो, लोगों के साथ पूरी करुणा और संवेदनशीलता के साथ पेश आना चाहिए। महिलाओं को शिक्षा के जरिए सशक्त बनाना उनका एक ऐसा लक्ष्य है जिसे वह लंबे समय तक समाज में बदलाव लाने का सबसे बड़ा हथियार मानती हैं।




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