तेल, कूटनीति और युद्ध का खतरा; ईरान-अमेरिका विवाद दुनिया के लिए अहम क्यों; UPSC अभ्यर्थियों को जानना जरूरी
ईरान-अमेरिका तनाव क्यों बढ़ा, इजराय ल हमले, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का महत्व, तेल कीमतों पर असर और भारत से इन सब का क्या जुड़ाव है? ये सभी बातें यूपीएससी और सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने वालों को जानना जरूरी है।

iran america tension for upsc: मिडिल ईस्ट एक बार फिर दुनिया की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक हलचल का केंद्र बन गया है। हाल के दिनों में अमेरिका, ईरान और इजराय ल के बीच बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने वैश्विक राजनीति, ऊर्जा बाजार और सुरक्षा संतुलन को हिला दिया है। धमाकों, मिसाइल अलर्ट और सैन्य बयानबाजी के बीच यह सवाल सबसे अहम है कि आखिर यह टकराव अचानक इतना तेज क्यों हो गया और इसका असर दुनिया, खासकर भारत पर क्या पड़ेगा। यूपीएससी और स्टेट सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए इन मुद्दों को जानना काफी जरूरी है क्योंकि इनसे जुड़े सवाल सिविल सेवा प्री परीक्षा और मेन्स परीक्षा में पूछे जा सकते हैं।
ताजा घटनाओं ने क्यों बढ़ाई चिंता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू करने की पुष्टि की। इसके कुछ ही घंटों बाद तेहरान में धमाकों की आवाजें सुनाई दीं और इज़राइल ने ईरान पर पूर्वव्यापी हमला करने की बात कही। रिपोर्टों के अनुसार हमले ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई से जुड़े इलाकों के आसपास हुए। इसके बाद दोनों देशों ने अपने हवाई क्षेत्र बंद कर दिए और क्षेत्र में सुरक्षा अलर्ट बढ़ा दिया गया। इजरायली सेना ने नागरिकों को मिसाइल हमले की आशंका को लेकर चेतावनी दी, जबकि ईरान ने जवाब देने की कसम खाई। इससे स्थिति सीधे सैन्य टकराव के मोड़ पर पहुंचती दिखाई दी।
असल वजह क्या है? सिर्फ हमला नहीं, पुराना संघर्ष
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव नया नहीं है। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से दोनों देशों के संबंध बेहद खराब रहे हैं। मुख्य विवाद तीन मुद्दों पर केंद्रित रहा है - पहला, ईरान का परमाणु कार्यक्रम। अमेरिका और उसके सहयोगियों को डर है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर सकता है। दूसरा, मिडिल ईस्ट में प्रभाव की लड़ाई। ईरान क्षेत्रीय ताकत बनना चाहता है, जबकि अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ संतुलन बनाए रखना चाहता है। तीसरा, प्रॉक्सी युद्ध। यमन, सीरिया, इराक जैसे क्षेत्रों में दोनों पक्ष अलग अलग समूहों का समर्थन करते रहे हैं। हाल की बातचीत बिना ठोस नतीजे के खत्म होने के बाद तनाव और बढ़ गया।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों है असली ‘गेम चेंजर’
इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील बिंदु स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है। यह फारस की खाड़ी को दुनिया के समुद्री व्यापार मार्गों से जोड़ने वाला बेहद संकरा समुद्री रास्ता है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, यूएई और कुवैत जैसे बड़े तेल उत्पादक देश अपने निर्यात के लिए इसी मार्ग पर निर्भर हैं। अगर ईरान इस मार्ग को बाधित करता है, तो वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर भारी असर पड़ सकता है।
तेल बाजार क्यों हुआ बेचैन
तनाव बढ़ते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें छह महीने के उच्च स्तर तक पहुंच गईं। ब्रेंट क्रूड 71 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चला गया और विशेषज्ञों का मानना है कि हालात बिगड़ने पर कीमतें 100 डॉलर से भी ऊपर जा सकती हैं। संभावित परिदृश्य इस तरह समझे जा सकते हैं -
- सीमित संघर्ष रहा तो कीमतों में 10 से 12 डॉलर तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
- होर्मुज बाधित हुआ तो कीमत 90 डॉलर से ऊपर जा सकती है।
- तेल ढांचे पर हमले हुए तो 100 डॉलर पार संभव है।
- पूरे क्षेत्र में युद्ध फैला तो कीमतें 130 डॉलर तक जा सकती हैं।
यानी यह सिर्फ सैन्य तनाव नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक जोखिम भी है।
भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है और अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत तेल आयात करता है। भारत हर साल करीब 2 अरब बैरल तेल खरीदता है। तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की वृद्धि से भारत का आयात बिल लगभग 2 अरब डॉलर बढ़ जाता है। भारत के 40 प्रतिशत से ज्यादा तेल आयात इसी होर्मुज मार्ग से आते हैं। इसलिए यह संकट भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई और चालू खाते के संतुलन पर सीधा असर डाल सकता है।
विकल्प क्यों सीमित हैं
कुछ वैकल्पिक पाइपलाइन मौजूद हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है। अगर बड़ा संघर्ष हुआ तो वैश्विक मांग का लगभग 9 प्रतिशत हिस्सा जोखिम में आ सकता है। इसके अलावा लाल सागर क्षेत्र से जुड़े बाब-अल-मंदेब जैसे दूसरे समुद्री मार्गों पर भी हमलों की आशंका जताई जा रही है, जिससे सप्लाई चेन और अस्थिर हो सकती है।
पूरी दुनिया क्यों सतर्क है
अगर कूटनीति सफल होती है तो हालात सामान्य हो सकते हैं। लेकिन अगर सैन्य कार्रवाई बढ़ी, तो यह संकट केवल क्षेत्रीय नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक आर्थिक झटका बन सकता है।




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