सुपौल विधानसभा सीट: जेडीयू के मजबूत दुर्ग को ढहाना महागठबंधन के लिए बड़ी चुनौती
बिहार की सुपौल विधानसभा सीट को जेडीयू का मजबूत गढ़ माना जाता है। जेडीयू के वरीय नेता एवं नीतीश सरकार में मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव यहां से 8 बार के विधायक हैं। महागठबंधन के सामने जदयू को हराना चुनौती है।

साल 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के कद्दावर नेता प्रमोद कुमार सिंह को 4256 वोटों से हराकर बिजेंद्र प्रसाद यादव ने सुपौल को फतह कर ऐसा अभेद्य किला बनाया कि अब तक उसे प्रतिद्वंद्वी ढह नहीं पाए। इसके बाद से न केवल उनकी जीत का सिलसिला चलता रहा है, बल्कि जीत का अंतर भी लगातार बढ़ता गया। इस दौरान उनके प्रतिद्वंद्वी बदलते रहे। हर साल कोसी की बाढ़ की विभीषिका झेलने वाला सुपौल इन साढ़े तीन दशकों में बदल गया। यह अनुमंडल से जिला बना। सुपौल संसदीय क्षेत्र भी बन चुका। सुपौल विधानसभा क्षेत्र जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) का सुरक्षित या अभेद्य किला बना रहा। इस बार साल 225 के विधानसभा चुनाव में भी महागठबंधन के लिए जदयू के इस दुर्ग को भेद पाना बड़ी चुनौती होगी।
सुपौल विधानसभा सीट पर आजादी के बाद पहली बार (1952) में हुए चुनाव कांग्रेस के लहटन चौधरी ने जीत हासिल की थी। तब से अब तक इस सीट पर कुल 17 बार विधानसभा चुनाव (उप चुनाव समेत) हो चुके हैं। इन चुनावों में से आठ बार (करीब आधे) चुनाव अकेले बिजेंद्र प्रसाद यादव ने जीते हैं। पार्टी के लिहाज से देखें तो कांग्रेस को 6, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को 3, जनता पार्टी को एक, जनता दल को 2 और जदयू को 6 बार जीत मिली है।
बिजेंद्र प्रसाद ने 1990 और 1995 में जनता दल, जबकि 2000 से लेकर 2020 तक कुल 6 बार जदयू के टिकट पर चुनाव लड़कर जीते। बिजेंद्र यादव ने जब पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा था तो सुपौल, सहरसा जिले का हिस्सा था। सहरसा से अलग होकर यह 14 मार्च 1991 को नया जिला घोषित हुआ। जिले में आधारभूत संरचना का विकास हुआ। बिजली की व्यवस्था बेहतर हुई। सड़क व पुल-पुलिया, ग्रीन फील्ड सड़क बने और इंजीनियरिंग कॉलेज खुला। हालांकि बाढ़ और कटाव और विस्थापन अब भी बड़ी समस्या है।
सुपौल विधानसभा सीट एक नजर में-
सुपौल के उत्तर में निर्मली, दक्षिण में सहरसा, पूरब में पिपरा और पश्चिम में मधुबनी आता है। सुपौल विधानसभा में कुल मतदाताओं की संख्या 3,18,016 है। इनमें 1,64,251 पुरुष और 1,53,762 महिला वोटर हैं। 3 थर्ड जेंडर मतदाता भी हैं। 18-19 साल के युवा वोटर की संख्या 5358 है। सुपौल कभी मिथिला का हिस्सा था। जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर परसरमा परसौनी स्थित लक्ष्मीनाथ गोसाईं मंदिर ऐतिहासिक धरोहर है। इसे जल्द ही पर्यटन स्थल का भी दर्जा दिया जाना है।
सुपौल में बीते 5 सालों में हुए ये बदलाव-
⦁ परसरमा से अररिया तक ग्रीनफील्ड सड़क का निर्माण
⦁ इंजीनियरिंग कॉलेज और 300 बेड का गर्ल्स हॉस्टल बनकर तैयार
⦁ दीनापट्टी में मेडिकल कॉलेज का निर्माण शुरू
⦁ आधारभूत संरचना का विकास, सड़क एवं पुल-पुलिया तथा ट्रेनों का विस्तार हुआ
⦁ इनडोर-आउटडोर स्टेडियम, अंबेडकर छात्रावास, 600 सीटों का टाउन हॉल बना।
वायदे, जो पूरे नहीं हुए
⦁ सुपौल में आरओबी निर्माण का शिलान्यास 2020 में हुआ, अब तक तैयार नहीं
⦁ जाम से लोगों को नहीं मिली मुक्ति
⦁ इंजीनियरिंग कॉलेज के पास सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं बना
⦁ बाढ़ से स्थायी राहत अभी तक नहीं मिल पाई
⦁ युवाओं को रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं मिले
2025 में चुनाव के मुद्दे
⦁ स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हुईं, लेकिन अधिकांश मरीज बाहर रेफर किए जा रहे
⦁ बाढ़, पलायन और रोजगार के मुद्दे भी चर्चा में
⦁ जिला मुख्यालय में जाम से स्थायी निजात
⦁ रोजगार के अवसर बढ़ाने को उद्योगों की स्थापना
⦁ सिंचाई और जल निकासी की सुविधा।
सुपौल विधानसभा सीट पर अब तक हुए चुनावों के विजेता
1952 : लहटन चौधरी, इंडियन नेशनल कांग्रेस
1957 : परमेश्वर कुमार, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी
1962 : परमेश्वर कुमार, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी
1967 : यू सिंह, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1969 : उमाशंकर सिंह, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1972 : उमाशंकर सिंह, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1977 : अमरेंद्र प्रसाद सिंह, जनता पार्टी
1980 : उमाशंकर सिंह, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1985 : प्रमोद कुमार सिंह , भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1990: बिजेंद्र प्रसाद यादव, जनता दल
1995 बिजेंद्र प्रसाद यादव, जनता दल
2000 से 2020 तक: बिजेंद्र प्रसाद यादव जदयू
ऊर्जा मंत्री एवं सुपौल के विधायक बिजेंद्र प्रसाद का दावा है कि सुपौल में शिक्षा, सड़क एवं दूसरे शहरों से कनेक्टिविटी के क्षेत्र में काफी काम किया गया है। इंजीनियरिंग कॉलेज, एसएसबी ट्रेनिंग सेंटर, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, कौशिकी भवन, पॉलिटेक्निक समेत कई संस्थान बन चुके हैं। परसरमा से अररिया तक ग्रीनफील्ड सड़क बनी। वह जब पहली बार विधायक बने थे तो सुपौल अनुमंडल के रूप में मिला था। उन्होंने इसे संपन्न जिला और लोकसभा क्षेत्र बनवाया।
उनके खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके मिन्नतुल्लाह रहमानी का आरोप है कि सुपौल में विकास सिर्फ कागजों पर हुआ, हकीकत में नहीं। ना शैक्षणिक और ना ही स्वास्थ्य के नजरिए से लोगों को सुविधा मिली। आज भी इलाके के लोग दिल्ली-पंजाब जाकर मजदूरी करने जा रहे हैं। बेटियों की उच्च शिक्षा के लिए महिला कॉलेज नहीं खुला। डगमारा पनबिजली परियोजना पर वर्षों से डीपीआर बनाने में करोड़ों खर्च हो गए। अधूरे ओवरब्रिज के कारण लोगों को जाम से मुक्ति नहीं मिली।




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