गरीब बस्ती : पेयजल का भीषण संकट, बूंद-बूंद को तरस रहा गला
नवादा में भीषण गर्मी ने दलित बस्तियों की स्थिति को गंभीर बना दिया है। यहां के लोग पीने के पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गर्मी के कारण बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है, लेकिन चिकित्सा सुविधा का अभाव है। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि प्रशासन को तुरंत कदम उठाने की आवश्यकता है।

वैशाख की चिलचिलाती धूप और 42 डिग्री के आसपास रहे पारे ने तो सम्पन्न लोगों का जीना मुहाल कर रखा है। ऐसे में शहर के पम्पुकल चौक के समीप समेत मिर्जापुर व स्टेडियम रोड दलित टोली तथा लूटनबिगहा स्थित मलिन बस्ती में दोपहर होते ही उनके टीन और प्लास्टिक आदि से बने घर भट्ठी जैसा तपने लग जा रहे हैं। इन दलित बस्तियों में रहने वाले अधिकांश परिवार प्लास्टिक की पन्नी, फटे पुराने बोरे या लोहे की चद्दरों (टीन) के नीचे गुजर-बसर करते हैं। इन बस्तियों में सबसे बड़ी समस्या पीने के पानी की है। अधिकांश सरकारी चापाकल सूख चुके हैं या उनसे बेहद गंदा पानी निकल रहा है।
नगर परिषद के टैंकरों की कोई सेवा अब तक शुरू नहीं हो सकी है। इस कारण महिलाओं को एकाध सही काम कर रहे चापाकल पर तपती धूप में घंटों लाइन में लगना पड़ रहा है। पम्पूकल चौक के समीप की दलित बस्ती की बसंती देवी कहती हैं कि उनके टोले का चापाकल गर्मी की शुरुआत से ही कम पानी दे रहा है। घंटों खड़े हो कर इस धूप में पानी का जुगाड़ करना एक जंग जैसा हो गया है। नहाने की बात तो दूर, पीने का पानी जुटाना भी भारी पड़ रहा है। इसी बस्ती के ही विकास डोम, महेश डोम आदि का कहना है कि जितनी कठिनाई से हम सब इस भीषण गर्मी के दिन काट रहे हैं, उसका बेहतर अंत होता नहीं दिख रहा है। एक-एक दिन बिताना भारी पड़ रहा है। हर दिन लगता है कि इससे अच्छा तो ठंड का ही दिन था, कम से कम इतनी फजीहत तो नहीं थी। कहीं किसी कोने में दुबके पड़े रहते थे। गर्मी से बचाव का साधन बन रहा बोरा और पानी इन बस्तियों में रहने वाले लोग गर्मी से बचने के लिए देसी और संघर्षपूर्ण तरीके अपना रहे हैं। कई घरों में टीन की छत पर पुआल बिछाकर उस पर पानी डाला जाता है ताकि थोड़ी ठंडक रहे। रात के समय उमस इतनी बढ़ जाती है कि लोग सड़कों के किनारे चटाई बिछा कर सो जा रहे हैं। जिनके घरों में छत है, वह वहीं सोने को मजबूर हैं। ऐसे खुले स्थानों पर मच्छरों का आतंक अलग ही समस्या बनकर सामने खड़ा होता है। कुछ लोग अपनी कच्ची दीवारों पर मिट्टी का लेप लगाकर ठंडक की तलाश कर रहे हैं। उपचार की कमी के बीच बीमारियों का डर भीषण गर्मी और लू जैसी स्थिति के कारण इन बस्तियों में डिहाइड्रेशन, उल्टी-दस्त और बुखार का प्रकोप अमूमन दिख रहा है। विडंबना यह है कि इन बस्तियों के पास प्राथमिक उपचार की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। ले-दे कर सरकारी अस्पताल का ही सहारा है। कुछ लोग दूरी के कारण आसपास के झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे रहने को मजबूर हैं। गर्मी और लू की चपेट सबसे ज्यादा बच्चे और बुजुर्ग आ रहे हैं। लू लगने पर प्राथमिक उपचार के नाम पर यहां केवल नमक-चीनी का घोल ही एकमात्र सहारा है। अधिक बीमार होने पर सदर अस्पताल के भरोसे रहना पड़ रहा है। व्यवस्था की बेरुखी पर उठा रहे सवाल नवादा की इन मलिन बस्तियों के बुरे हाल से त्रस्त पम्पुकल चौक के समीप स्थित दलित बस्ती के एक बुजुर्ग अर्जुन डोम कहते हैं कि दलित बस्तियों की एक बड़ी आबादी आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है। भीषण गर्मी में अब तक प्रशासन को टैंकरों की संख्या बढ़ानी चाहिए थी लेकिन कुछ भी नहीं हो पा रहा है। यदि जल्द ही पेयजल और स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया गया, तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। (नवादा से राजेश मंझवेकर)
लेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




साइन इन