LPG संकट ने छीनी रोजी-रोटी, ट्रेनों में भरकर बिहार लौट रहे प्रवासी मजदूर
दिल्ली, पंजाब, गुजरात, तेलंगाना, तमिलनाडु समेत अन्य राज्यों में काम करने वाले बिहार के प्रवासी मजदूर के सामने एलपीजी संकट ने रोजी-रोटी छीन ली है। बड़ी संख्या में लोग ट्रेनों में चढ़कर बिहार लौट रहे हैं।

LPG Crisis: ईरान और मध्य पूर्व में युद्ध से भारत में आए एलपीजी संकट से दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में रहने वाले बिहारी मजदूरों की रोजी-रोटी छीन गई है। प्रवासी मजदूर दूसरे राज्यों से ट्रेनों में भर-भरकर वापस अपने गांव-घरों की ओर लौट रहे हैं। दिल्ली, महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु समेत अन्य राज्यों से बिहार आने वाली ट्रेनों में प्रवासी मजदूरों की भीड़ है। सभी निराश होकर बिहार लौट रहे हैं। अब उनके सामने चुनौती है कि गांव में रहकर कैसे अपने परिवार का पेट पालेंगे।
परदेस में रुखा-सुखा खाकर दिन काट रहे थे
पटना के दानापुर स्टेशन पर शुक्रवार को पुणे-दानापुर स्पेशल, जनसाधारण, अमृत भारत और लोकामान्य तिलक टर्मिनल-भागलपुर एक्सप्रेस से लौटे कई कामगारों ने अपना दर्द बयां किया। पुणे से लौटे पूर्णिया के मेजर और इस्तहार ने बताया कि पुणे में अपार्टमेंट बनाने वाले ठेकेदार के अंदर मजदूरी करते थे। महीने भर से गैस की किल्लत थी। इससे 15-20 दिनों से लकड़ी के चूल्हे पर खाना बना रहे थे। युद्ध जैसे ही शुरू हुआ, गैस की कीमत दूसरे दिन से ही बढ़ गई। जो गैस 50-60 रुपये किलो मिलता था वह 300 से 400 रुपये किलो मिलने लगा। पिछले दो-तीन दिनों से लकड़ी भी नहीं मिल रहा था। इससे रुखा-सुखा खाकर दिन काट रहे थे। लेकिन बच्चे भोजन के बिना बिलबिला रहे थे। पैसा भी उतना नहीं था कि कहीं होटल में जाकर खाना खा सकें, इसी कारण वापस घर लौट आए।
कंपनी ने नहीं दी पूरी मजदूरी
कटिहार के बीपुरा सिंह, रहीम और सूरज ने बताया कि पुणे के सरिया कंपनी में काम करते थे। लेकिन युद्ध के कारण चार दिन पहले कंपनी ने रहीम और सूरज को हटा दिया। पहले ही गैस की किल्लत से परेशान थे। खाना नहीं बना रहे थे। ठेला पर खाना खाकर दिन गुजारना पड़ता था। आखिरकार हम लोगों ने घर लौटने का फैसला किया। कंपनी ने पूरी मजदूरी भी नहीं दी। युद्ध खत्म होने के बाद दोबारा जाएंगे, देखते हैं नौकरी मिलती है या नहीं।
दिल्ली में कारखाना बंद कर मोतिहारी लौटे
पूर्वी चंपारण जिले के बंजरिया ब्लॉक के जटवा, खैरी, सुंदरपुर हित अन्य गावों से करीब दर्जन भर लोगों ने दिल्ली के पंजाबी बाग में लेडीज सैंडल निर्माण कारखाना खोला था। 15 सालों से चल रहे इस कारखाने में स्थानीय कारीगर भी काम करते थे। ईरान-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद एलपीजी संकट आया तो दिल्ली में गैस सिलेंडर रिफिल कराने की दिक्कत हुई। कुछ दिन जैसे-तैसे ब्लैक में महंगी गैस खरीद कर खाना पकाया। मगर अब दुकानदारों ने गैस रिफिल करने से मना कर दिया तो सभी को कारखाना बंद कर दिल्ली से भागकर अपने घर आना पड़ा। इनका कहना है कि एलपीजी संकट से इनका रोजगार छीन गया और कमाई पर बट्टा लग गया। कौशर आलम, मेराज, असगर, सद्दाम, कयामुद्दीन समेत अन्य लोगों को कहना है कि अब गैस संकट दूर होने के बाद ही वे दिल्ली जाएंगे।
जिले के मेहसी में सप्तक्रांति एक्सप्रेस ट्रेन में सवार होकर दिल्ली, गाजियाबाद, मुरादाबाद और लखनऊ से शुक्रवार को लौटे लोगों ने अपना दुखड़ा सुनाया। बरहवा गांव निवासी सिकन्दर पंडित ने बताया कि वे लोग जिस फैक्ट्री में काम करते थे, वहां खाना बनाने के लिए गैस नहीं मिलने के कारण परेशानी हो रही थी। इस कारण घर लौट गए हैं। मीनापुर गांव निवासी सिकन्दर ने भी बताया गैस नहीं मिलने से भोजन की समस्या हो रही थी। ऐसे में वे लोग घर लौट आये हैं। लालबाबू कुमार ने बताया कि वे लोग डेरा लेकर दिल्ली में रहते थे और वहां फैक्ट्री में काम करते थे। गैस नहीं मिलने के कारण होटल में खाने लगे लेकिन गैस की किल्लत होने से कई छोटे छोटे होटल बंद हो चुके हैं ,कई बंद होने के कगार पर हैं।
जितनी महंगी गैस उतनी तो आमदनी नहीं
सिकंदराबाद एक्सप्रेस से लौटे मधुबनी निवासी रामानंद ने बताया कि वे छह माह पहले हैदराबाद गए थे। पेपर मिल में काम कर परिवार का भरण-पोषण करते थे, लेकिन गैस की किल्लत के कारण खाना बनाना मुश्किल हो गया। अगर कहीं गैस मिल भी रही है तो 400 रुपये किलो तक मिल रही है, जो हमारी आमदनी से बाहर है।
अररिया निवासी मो. ने बताया कि भाई के साथ सिकंदराबाद काम करने गया था, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी पर है। बहन की शादी, मां-बाप की दवा सब कुछ का इंतजाम करना है, लेकिन वहां खाने का बड़ा संकट हो गया। होटल भी बंद हैं और कई दिन तक भुजा, फल और बिस्किट खाकर गुजारा करना पड़ा। बेगूसराय निवासी राजा कुमार ने बताया कि वे साथियों के साथ हैदराबाद में काम कर रहे थे, लेकिन दो सप्ताह से स्थिति बिगड़ गई है।
गयाजी के अमरीश कुमार, नवादा के कुलेश्वर कुमार, अमरेश प्रसाद और जगजीवन प्रसाद ने बताया कि दिल्ली में मजदूरी करते हैं। कई साथी है जो होटल, ढाबा में भी काम करते हैं। गैस की नियमित सप्लाई प्रभावित होने से वहां काम पर भी असर पड़ने लगा है। ऐसे में फिलहाल घर लौट आए हैं। उन्होंने कहा कि स्थिति सामान्य होने पर फिर वापस जाएंगे।
मुंबई, सूरत, जयपुर और लुधियाना से लौटे युगेश सिंह कमलकांत रविदास, सोहन राजवंशी और उमाशंकर प्रसाद ने गयाजी में बताया कि गैस की कमी के कारण खाना बनाना मुश्किल हो गया है और होटलों में भोजन भी महंगा हो गया है। बताया कि शहरों में खाना बनाना मुश्किल हो गया है। गैस की कमी के कारण होटल और ढाबों में भी खाने की कीमतें बढ़ गई हैं। ऐसे में रोज मजदूरी करने वाले श्रमिकों के लिए खर्च संभालना मुश्किल हो रहा है। शुक्रवार को नई दिल्ली-पूरी पुरुषोत्तम एक्सप्रेस से गया जंक्शन आए तथा आगे के लिए सफर कर रहे कई श्रमिकों ने बताया कि वे दिल्ली में रहकर काम करते थे।
जालंधर से नौकरी छोड़ दिल्ली गए, वहां भी काम नहीं मिला तो बिहार की ट्रेन पकड़ ली
स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस ट्रेन से मुजफ्फरपुर पहुंचे कामगारों ने बताया कि पंजाब के जालंधर में खाना महंगा हुआ तो गुजर बसर मुश्किल हो गया। उन्होंने वहां प्लाई फैक्ट्री की नौकरी छोड़ दी। इनमें मुजफ्फरपुर के सादपुरा इलाके के निवासी राशिद एवं विवेक महतो के अलावा सीतामढ़ी के मेजरगंज के केशव पटेल और दिलीप कुमार शामिल हैं।
इन्होंने बताया कि जालंधर से निकलने के बाद विकल्प की तलाश में वे दिल्ली पहुंचे। वहां नोएडा की एक लोकल जूते-चप्पल बनाने वाली कंपनी में परिचित की मदद से काम की तलाश की। मुश्किल से एक-दो जगहों पर काम तो मिला पर पगार काफी कम थी। आवासीय या भोजन की भी सुविधा नहीं थी। आखिरकार मायूस होकर दिल्ली में घर के लिए ट्रेन पकड़ ली।
(विभिन्न जिलों से हिन्दुस्तान संवाददाताओं के इनपुट के आधार पर)




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