LPG Crisis: सुधा डेयरी में त्राहिमाम, नौकरी छोड़ घर लौटे प्रवासी; ईरान जंग में जल रहा बिहार?
सुधा डेयरी में गैस सिलेंडर की आपूर्ति पर असर पड़ रहा है। प्लांट में प्रति 47 किलोग्राम वाले 45 सिलिंडर की जरूरत पड़ती है।

Iran Israel War: मध्य-पूर्व में जारी जंग की तपिश का असर आनेवाले दिनों में जिले के उद्योग धंधों पर भी पड़ सकता है। खासकर औद्योगिक डीजल की कमी का असर सुधा डेयरी, एनटीपीसी और इंडियन पोटाश जैसी बड़ी इकाइयों पर पड़ सकता है। हालांकि, इसके प्रबंधन से जुड़ लोग फिलहाल किसी संकट से इंकार करते हैं। लेकिन, आनेवाले दिनों में होनेवाली कमी को लेकर चिंता भी जताते हैं।
सुधा डेयरी के प्रबंध निदेशक (एमडी) फूल कुमार झा ने शुक्रवार को बताया कि अभी प्लांट में उत्पादन पूर्व की ही तरह हो रहा है। लेकिन, यही स्थिति रही तो आनेवाले दिनों में इसका असर प्रसंस्करित दुध व अन्य उत्पादों के निर्माण पर पड़ सकता है। इसको लेकर हमने अपनी चिंता से मुख्यालय को पत्र लिखकर अवगत करा दिया है। साथ ही विपरीत परिस्थिति के लिए दिशा निर्देश भी मांगा है।
एमडी ने बताया कि प्लांट को हर माह करीब 20 से 21 हजार लीटर डीजल की जरूरत होती है, जिसे सीधे रिफाइनरियों से मंगाया जाता है। वहीं, प्रतिदिन 47 किग्रा वाले 40 से 45 गैस सिलेंडर की जरूरत होती है। स्थिति बिगड़ रही है। पिछले कुछ दिनों से जो रुझान दिख रहा है, उससे आनेवाले दिनों में गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है।
इधर, कांटी एनटीपीसी के जनसंपर्क अधिकारी चंद्र प्रकाश ने बताया कि उनके प्लांट को औद्योगिक डीजल की बहुत अधिक जरूरत नहीं पड़ती है। कभी कभार जब पूर्ण शटडाउन लेने पर मशीनों को फिर से चालू करने में इसकी जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि आपात स्थिति में प्लांट को शटडाउन लेना पड़ा और डीजल पर्याप्त मात्रा में नहीं होगी तक बिजली उत्पादन में परेशानी हो सकती है।
खाना नहीं मिला तो नौकरी छोड़ लौटे प्रवासी
इधर जालंधर में खाना महंगा हुआ तो गुजर-बसर मुश्किल हो गया। कुछ दिन चले लेकिन बाद में रोटी के लाले पड़ने लगे। मजबूरी में प्लाई फैक्ट्री की नौकरी छोड़ कामगार अपने घर लौट रे हैं। मुजफ्फरपुर के सादपुरा इलाके के निवासी राशिद व विवेक महतो के अलावा सीतामढ़ी के मेजरगंज के केशव पटेल और दिलीप कुमार शामिल हैं। केशव व राशिद ने बताया कि 15 हजार मासिक पगार के साथ फैक्ट्री मालिक ने रहने की सुविधा दे रखी थी। भोजन-नाश्ता का इंतजाम खुद करना होता था। मध्य पूर्व में जारी युद्ध के कारण मार्च के आरंभ से ही गैस की किल्लत होने लगी। पहले एक हजार के गैस सिलेंडर में ग्रुप का महीनेभर का खाना बन जाता था। गैस सिलेंडर नहीं मिलने पर रोज 200 रुपये से अधिक लकड़ी पर खर्च हो रहा था। वहीं, ऑर्डर कम आने से फैक्ट्री में काम कम होने पर कुल 45 में यूपी, झारखंड व बंगाल के 20 मजदूर पहले ही जा चुके थे। परिवार को मासिक खर्च भेजने के बाद बची हुई राशि में गुजारा मुश्किल हो रहा था। विवशता में प्लाई फैक्ट्री की नौकरी छोड़ कर ग्रुप के चारों सदस्य लौट गए।
घर में काम की चिंता सता रही
कामगारों ने बताया कि चार-पांच हजार भोजन-नाश्ता, चाय आदि पर खर्च करने के बाद कितनी राशि बचती? ऐसे में लौटना मजबूरी थी। लेकिन, बदले हालात में अब सभी प्रवासी रोजी-रोटी को लेकर चिंतित हैं। दिलीप के मुताबिक घर पर बैठकर कितने दिन खाएंगे। आखिर बिना पैसे के भोजन-पानी कैसे चलेगा? बेरोजगारी में दवा, कपड़ा, बच्चों की पढ़ाई व अन्य जरूरतें कैसे पूरी करेंगे। फैक्ट्री मालिक ने भविष्य में बेहतर हालात होने पर बुलाने का आश्वासन दिया है, लेकिन तब तक क्या करेंगे? यहां रोजगार का कोई मौका नहीं दिख रहा है। सिर्फ गेहूं कटनी के समय ही कुछ दिनों तक लगातार काम मिलने की उम्मीद है।




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