Severe Water Crisis and Heatwave Affect Slum and Dalit Communities in Chhapra भीषण गर्मी में तड़प रहीं मलिन बस्तियां, जिले भर में गरीब परिवारों की बढ़ी मुश्किलें, Chapra Hindi News - Hindustan
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भीषण गर्मी में तड़प रहीं मलिन बस्तियां, जिले भर में गरीब परिवारों की बढ़ी मुश्किलें

छपरा में भीषण गर्मी ने गरीब बस्तियों को प्रभावित किया है। टीन और छप्पर के घरों में रह रहे लोग अत्यधिक गर्मी से परेशान हैं। पेयजल संकट भी गंभीर है, जहां महिलाएं और बच्चे सीमित जलापूर्ति के लिए जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से लू और अन्य बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं। प्रशासन से राहत की उम्मीद है।

Sat, 25 April 2026 09:07 PMNewswrap हिन्दुस्तान, छपरा
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भीषण गर्मी में तड़प रहीं मलिन बस्तियां, जिले भर में गरीब परिवारों की बढ़ी मुश्किलें

शहर की झोपड़पट्टियों से गांव की दलित बस्तियों तक पेयजल संकट, उपचार का अभाव और टीन-छप्पर के घरों में तपिश फोटो 6: राजेंद्र स्टेडियम के पास स्थित बस्ती में भीषण गर्मी के बीच शनिवार को टीन-छप्पर वाले घरों के बाहर दिन गुजारते लोग, तपिश बढ़ने पर झोपड़ियों के अंदर रहना हुआ मुश्किल। फोटो 7: राजेंद्र स्टेडियम के पास स्थित बस्ती की पानी टंकी पर जुटी महिलाएं और बच्चे सीमित जलापूर्ति के बीच पेयजल के लिए रोजाना जूझते परिवार पेज चार की लीड हिन्दुस्तान पड़ताल छपरा, हिन्दुस्तान संवाददाता। भीषण गर्मी ने जिले भर में जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है, लेकिन सबसे अधिक मार मलिन, गरीब और श्रमिक बस्तियों पर पड़ रही है।

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छपरा शहर से लेकर प्रखंडों के गांवों तक 39 से 41 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच कच्चे घरों, टीन-टप्पर और छप्परनुमा मकानों में रहने वाले लोग भारी परेशानी झेल रहे हैं। दोपहर होते ही घरों की छतें तपने लगती हैं और अंदर बैठना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में लोग पेड़ की छांव, सड़क किनारे, बरामदे या खुले स्थानों में दिन काटने को मजबूर हैं। जिले के शहरी और ग्रामीण इलाकों की गरीब बस्तियों की पड़ताल में गर्मी के बीच बदहाल व्यवस्था की तस्वीर सामने आई है। शहर की बस्तियों में घर छोड़ बाहर रहने की मजबूरी छपरा शहर के राजेंद्र स्टेडियम, रेलवे लाइन किनारे, बस पड़ाव क्षेत्र और अन्य मलिन बस्तियों में दोपहर के समय अधिकांश लोग घरों से बाहर दिखे। महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे पेड़ की छांव या दीवार के किनारे बैठे मिले। कई झोपड़ियों में ताले लगे थे, क्योंकि परिवार के लोग कहीं और राहत की जगह तलाशने चले गए थे। टीन और प्लास्टिक की छत वाले घरों में इतनी गर्मी थी कि दोपहर में रहना मुश्किल हो गया था। बच्चों के चेहरे पर थकान और बुजुर्गों में बेचैनी साफ दिखी। राजेंद्र स्टेडियम क्षेत्र की सावित्री देवी ने बताया कि दोपहर में झोपड़ी के अंदर बैठना मुश्किल हो जाता है। ग्रामीण बस्तियों में भी कम नहीं परेशानी मशरक, तरैया, अमनौर, बनियापुर, जलालपुर, दरियापुर, मढ़ौरा, सोनपुर और अन्य प्रखंडों के गांवों की गरीब बस्तियों में भी हालात आसान नहीं हैं। गांवों में पेड़ और खुली हवा से थोड़ी राहत जरूर मिलती है, लेकिन कच्चे घरों और छप्परनुमा मकानों में दोपहर की तपिश लोगों को परेशान कर रही है। मजदूरी करने वाले लोग काम से लौटने के बाद भी राहत नहीं पा रहे हैं। कई परिवार शाम होने तक घर के बाहर ही समय बिताते हैं। मशरक के रामविलास मांझी, तरैया की फूलमती देवी और अमनौर के शिवनाथ राम ने बताया कि दिन में घर के अंदर बैठना मुश्किल हो जाता है। पेयजल बना सबसे बड़ा संकट शहर की कई गरीब बस्तियों में सरकारी हैंडपंप या चापाकल की सुविधा पर्याप्त नहीं है। कुछ जगह सामाजिक संस्थाओं या स्थानीय सहयोग से पानी की टंकी और मोटर लगाई गई है, जिससे लोग पानी भरते हैं। सुबह-शाम लंबी कतार लगती है। ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर नल-जल योजना की पाइपलाइन जरूर पहुंची है, लेकिन अधिकांश जगह पानी सीमित समय के लिए आता है। दिन में जरूरत पड़ने पर लोगों को चापाकल चलाना पड़ता है। कई पुराने चापाकलों में पहले पानी डालना पड़ता है, तब जाकर पानी निकलता है। बनियापुर के उमेश पासवान ने बताया कि सुबह पानी आता है, दिन में दिक्कत होती है। उपचार की व्यवस्था कमजोर भीषण गर्मी के बीच गरीब बस्तियों में स्वास्थ्य सुविधा भी कमजोर है। लू लगना, चक्कर आना, उल्टी, बुखार, सिरदर्द और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। शहरी बस्तियों में लोग निजी क्लीनिक या सदर अस्पताल जाते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या उपकेंद्र तक पहुंचना पड़ता है। आर्थिक तंगी के कारण कई लोग घरेलू उपायों से ही काम चला रहे हैं। बच्चों और बुजुर्गों की स्थिति सबसे ज्यादा संवेदनशील बनी हुई है। जलालपुर की मीना देवी ने बताया कि दवा कराने में पैसा भी लगता है और अस्पताल दूर है। टीन-टप्पर और छप्पर के घर बने तंदूर जिले की गरीब बस्तियों में बड़ी संख्या में परिवार टीन, प्लास्टिक, बांस, फूस और मिट्टी के घरों में रहते हैं। दोपहर में ये घर आग की तरह गर्म हो जाते हैं। लोग छत पर बोरा, गीला कपड़ा, प्लास्टिक या घास डालकर गर्मी कम करने का प्रयास करते हैं। कुछ लोग घरों के बाहर पानी छिड़कते हैं। रात में भी गर्म हवा और बिजली कटौती से चैन की नींद नहीं मिलती। कई परिवार खुले आंगन या सड़क किनारे सोने को मजबूर हैं। दरियापुर के महेंद्र राम ने बताया कि रात में भी गर्मी से नींद नहीं आती। सबसे ज्यादा मार गरीबों पर गर्मी का सबसे ज्यादा असर उन्हीं परिवारों पर पड़ रहा है जिनके पास पक्का मकान, पंखा, कूलर, फ्रिज या पर्याप्त पानी की सुविधा नहीं है। मजदूर, रिक्शाचालक, ठेला चालक और दिहाड़ी कामगार दिनभर काम के बाद भी राहत नहीं पा रहे हैं। महिलाओं का समय पानी लाने और बच्चों की देखभाल में बीत रहा है। प्रशासन यदि जिले की मलिन और गरीब बस्तियों में पेयजल, अस्थायी शेड, स्वास्थ्य शिविर और राहत व्यवस्था सुनिश्चित करे तो हजारों जरूरतमंद परिवारों को राहत मिल सकती है। छपरा से प्रवीण कुमार

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