आरा शहर समेत ग्रामीण कस्बों की मलिन बस्तियों तक नल जल का पाइप पर पानी का संकट बरकरार
हि. पड़ताल गरीब और मलिन बस्तियों के लोगों को तो और परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। जिला मुख्यालय के आरा शहर समेत ग्रामीण कस्बों की मलिन बस्तियों तक नल जल का पाइप जरूर बिछा है पर पीने के पानी और बिजली...

हि. पड़ताल -भीषण गर्मी में बिजली के पंखे तक नहीं, हाथ वाला पंखा ही सहारा -जहां बाग-बागीचे हैं, वहां पहुंच गर्मी से राहत पाने की कर रहे कोशिश -तबीयत खराब होने पर अस्पतालों में पहुंच कराते हैं परिजनों का इलाज आरा, हमारे संवाददाता। अप्रैल माह में ही इस साल पड़ रही भीषण गर्मी से हर वर्ग के लोगों का बुरा हाल है। गरीब और मलिन बस्तियों के लोगों को तो और परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। जिला मुख्यालय के आरा शहर समेत ग्रामीण कस्बों की मलिन बस्तियों तक नल जल का पाइप जरूर बिछा है पर पीने के पानी और बिजली की समस्या बरकरार है।
भीषण गर्मी में बिजली के पंखे तक इनके घरों में नहीं हैं। इनके लिए हाथ वाला पंखा ही सहारा है। घरों में इतनी गर्मी महसूस हो रही है कि बस्ती के लोग जहां बाग-बागीचे हैं, वहां जाकर गर्मी से राहत पाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं तबीयत खराब होने पर नजदीकी अस्पतालों में पहुंचकर परिजनों का इलाज कराते हैं। शहर के जवाहर जवाहर टोला की मलिन बस्ती के लोगों के लिए पक्का घर बना है, परन्तु पानी के लिए यहां के लोग परेशान हैं। घर के बरामदे में गर्मी से परेशान लालबाबू राम का परिवार हाथ वाले पंखे से राहत ले रहा था। बताया कि पहले दो चापाकल लगे थे। कई बार मरम्मत कराये गये, लेकिन कामयाब नहीं हो सके और अब उखड़ कर बेकार पड़े हैं। वहीं रामू राम एवं अन्य का परिवार गर्मी से राहत के लिए घर के आगे गली में थोड़ी छांव के बीच बैठा था। बंगाली देवी, कृष्णा राम और राम कुमार राम ने बताया कि नल जल का पाइप बिछा है, परन्तु कभी-कभार ही पानी मिलता है। पहले वाली पानी टंकी से काम चल रहा है। लगभग दो सौ परिवार यहां रहते हैं। सबका पक्का घर बना है। - पेड़ की छाया और बरामदे में आश्रय लेते हैं गरीब बस्तियों के लोग पीरो, संवाद सूत्र। प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण अथवा शहरी का लाभ मिलने के बाद भी गरीब बस्तियों में रहने वालों की दशा नहीं बदली है। शनिवार को पड़ताल के क्रम में अधिकतर महादलित बस्तियों में रहने वाले लोग टिन-टप्पर वाले घरों को छोड़ चुके थे। कुछ पास में पेड़ के नीचे चले गए थे तो कुछ पास के स्कूल अथवा प्राइवेट मकान के नीचे बरामदे में चले गए थे। नगर परिषद क्षेत्र के देवचंदा बाल की निवासी राजकली देवी बताती हैं कि दस बजे के बाद घर तपने लगता है। बच्चों के साथ घरों में रहना मुश्किल हो जाता है। पास के बागीचे में शरण लेनी पड़ती है अथवा प्राइमरी स्कूल के बरामदे का सहारा लेना पड़ता है। कटरिया गरीब बस्ती के लाल मोहन मुसहर का कहना है कि प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ कइयों को मिल चुका है, लेकिन भीषण गर्मी में झोपड़ियां भी आरामदेह नही होती हैं। मलिन बस्ती कातर में चापाकल तो है परंतु मरमत नहीं होने से पीने लायक पानी नहीं मिल पाता है। दो चापाकल कब के खराब हो चुके हैं और एक से कभी-कभार साफ पानी मिलता है। अधिक चलाने पर गंदा पानी निकलता है। गरहथा की गरीब बस्ती का हाल भी अन्य बस्तियों से अच्छा नहीं है। राजेन्द्र मुसहर की बात सही मान ली जाये तो गर्मी का दिन कभी भी आरामदायक नहीं रहा है। नगर परिषद के मंगरू राम का परिवार लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग की पानी टंकी के नीचे रहता है, लेकिन पानी टंकी बंद रहने से पीने का पानी नहीं मिलता है। - बिहिया : आजादी के अमृतकाल में भी पेड़ की छांव ही सहारा बिहिया। निज संवाददाता बिहिया नगर पंचायत के वार्ड नंबर आठ की मलिन बस्ती का स्वरूप आज भी नहीं बदला है। करीब 600 की आबादी वाली इस बस्ती के लोग घरों में नहीं, बल्कि मुगरिया बाबा के पास एक पेड़ के नीचे शरण लेने को मजबूर हैं। विडंबना देखिए कि पाइप बिछ गए, बोरिंग हो गई, लेकिन पानी नहीं पहुंचा। सरकारी चापाकल का नामोनिशान नहीं है। अधिकतर घर छप्पर या टिन के हैं। दोपहर में ये घर भट्ठी बन जाते हैं, जिससे बचाव के लिए महिलाएं और बच्चे पेड़ों के नीचे वक्त गुजारते हैं। बच्चों के लिए न तो कोई सरकारी स्कूल है और न ही सार्वजनिक शौचालय। पड़ताल के दौरान मुगरिया बाबा स्थान के पास पुरुषों की भारी भीड़ जमा दिखी। ग्रामीण शंकर राम,ज्योति, त्रिवेणी, पचन, दु:खी और भुअर ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि घर में दोपहर में पैर रखने लायक नहीं रहता है।
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