भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से ‘मलमास’ बना पुरुषोत्तम मास
भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से 'मलमास' को 'पुरुषोत्तम मास' का दर्जा मिला है। अधिकमास में मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं। इस दौरान भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की आराधना, जप और दान का विशेष महत्व है। श्रद्धालुओं को संयमित जीवन अपनाने और सात्विक भोजन करने की सलाह दी जाती है।

भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से ‘मलमास’ बना पुरुषोत्तम मास पूजा, जप, दान और भागवत श्रवण का है विशेष महत्व अधिक मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होने से मांगलिक कार्य है वर्जित फोटो: कुंड: मलमास मेले के लिए सज-धजकर तैयार राजगीर के कुंड क्षेत्र का विहंगम नजारा। पावापुरी, निज संवाददाता। सनातन परंपरा में अधिकमास विशेष आध्यात्मिक साधना और भगवान विष्णु-श्रीकृष्ण की आराधना का विशेष महीना माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से ही ‘मलमास’ को ‘पुरुषोत्तम मास’ के रूप में सम्मान प्राप्त हुआ। इसी कारण यह मास सभी महीनों में श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना जाता है।
धार्मिक मान्यता
पंडित कृष्णदेव पाण्डेय ने बताया कि अधिकमास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती है। इसलिए प्राचीन काल में इसे शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था। विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण और देव प्रतिष्ठा जैसे मांगलिक कार्य इस मास में वर्जित बताए गए हैं। इसी कारण लोग इसे मलमास कहकर तिरस्कृत करने लगे थे। धार्मिक कथा के अनुसार लोक अपमान से दुखी होकर मलमास भगवान विष्णु की शरण में वैकुण्ठ पहुंचा। भगवान विष्णु उसे लेकर गोलोक पहुंचे, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी व्यथा सुनकर उसे अपना नाम ‘पुरुषोत्तम’ प्रदान किया। श्रीकृष्ण ने कहा कि आज से यह मास सभी महीनों में श्रेष्ठ होगा और इसमें की गई भक्ति, साधना और दान का फल अनंत गुना प्राप्त होगा। तभी से यह मास ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
विशेष धार्मिक मेला
पंडित अभिराज कुमार अकेला ने बताया कि वेद और पुराणों के अनुसार मगध की प्राचीन राजधानी राजगृह, वर्तमान राजगीर में पुरुषोत्तम मास के दौरान विशेष धार्मिक मेला लगता है। मान्यता है कि श्रद्धालु यहां स्नान, दान, जप और पूजा कर पुण्य अर्जित करते हैं। पूजा और साधना का है विशेष महत्व: पंडित सूर्यमणि पांडेय ने बताया कि पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और शिव की उपासना अत्यंत फलदायी मानी जाती है। इस दौरान श्रद्धालुओं को सूर्योदय से पूर्व स्नान कर भगवान पुरुषोत्तम का पूजन, मंत्र जप और श्रीमद्भागवत महापुराण का श्रवण करना चाहिए। उन्होंने बताया कि इस मास में दिन में सोना, किसी की निंदा करना और असत्य बोलना त्याज्य माना गया है। साधकों को संयमित जीवन, सत्संग और सेवा भाव अपनाने की सलाह दी जाती है।
व्रत और भोजन के नियम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुरुषोत्तम व्रत करने वालों को एक समय सात्विक भोजन करना चाहिए। गेहूं, जौ, मूंग, तिल, दूध, दही, फल और सेंधा नमक आदि का सेवन श्रेष्ठ माना गया है। वहीं मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज, उड़द, मसूर और बासी भोजन से परहेज करने का विधान बताया गया है।उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं को पुरुषोत्तम कहा है। इसलिए यह पूरा महीना भगवान श्रीकृष्ण की आराधना, जप, तप और आत्मशुद्धि का विशेष अवसर माना जाता है। श्रद्धालुओं को इस मास को उत्सव और साधना के रूप में मनाना चाहिए। (पावापुरी से अनिल उपाध्याय)
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