लाल से नीला-सफेद, अब भगवा की बारी? बंगाल में कैसे सत्ता के साथ बदलता रहता है रंग
पश्चिम बंगाल में सत्ता के साथ रंग भी बदलता रहता है। एक समय था जब करीब 34 साल तक लेफ्ट फ्रंट की अगुवाई में राइटर्स बिल्डिंग लाल रंग में रंगी हुई थी। फिर आया ममता बनर्जी का शासन और सत्ता कर रंग बदलकर नीला-सफेद हो गया।

पश्चिम बंगाल में सत्ता के साथ रंग भी बदलता रहता है। एक समय था जब करीब 34 साल तक लेफ्ट फ्रंट की अगुवाई में राइटर्स बिल्डिंग लाल रंग में रंगी हुई थी। फिर आया ममता बनर्जी का शासन और सत्ता कर रंग बदलकर नीला-सफेद हो गया। ममता ने नए प्रशासनिक भवन, नाबन्ना को इसी रंग में रंगकर रखा। ममता का यह लगातार तीसरा टर्म है। 2026 के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने वाले हैं। एग्जिट पोल्स में भाजपा की सरकार बनने के दावे किए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस बार बंगाल में सत्ता का रंग बदलकर भगवा हो जाएगा?
लगातार 34 साल तक लाल रंग
लेफ्ट फ्रंट ने पश्चिम बंगाल में लगातार 34 साल तक निर्बाध शासन किया। इस दौरान पश्चिम बंगाल की सत्ता राइटर्स बिल्डिंग से चलती रही। यह भवन लाल रंग में रंगा रहा। यह कोई एक्टीरियर या फिर स्ट्रक्चरल चॉयस नहीं थी। बल्कि यह लेफ्ट का परंपरागत रंग था। लेफ्ट के शासन के दौरान पश्चिम बंगाल में रहने वाले लोगों का कहना है कि इन दशकों में सार्वजनिक स्थानों और सरकारी भवनों का रंग लाल ही रहा।
फिर आया नीले-सफेद का दौर
साल 2011 में बंगाल में सत्ता परिवर्तन हुआ। इसके साथ ही बदल गई राजधानी की इमारतों के रंग की तासीर। 34 साल तक लाल रंग में नहाई बिल्डिंगें और सरकारी भवन अब रंग बदलने लगे थे। वैसे ममता के साथ मामला थोड़ा पर्सनल भी रहा। साल 1993 में जब ममता कांग्रेस में थीं तो एक विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा उन्हें जबरन राइटर्स बिल्डिंग के परिसर से बाहर निकाल दिया गया था। तभी ममता ने कसम खाई थी कि अब अगर इस बिल्डिंग में वापस आएंगी तो मुख्यमंत्री ही बनकर आएंगी। 18 साल लगे, लेकिन ममता की कसम पूरी हुई। हालांकि उन्होंने राइटर्स बिल्डिंग को पूरी तरह से नहीं अपनाया।
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बनाया नाबन्ना
बतौर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, प्रदेश के प्रशासनिक मुख्यालय को एक नई बिल्डिंग में लेकर गईं, जिसका नाम रखा गया नाबन्ना। यहीं पर उन्होंने नई कलर स्कीम को अपनाया। नीला और सफेद। इसके साथ ही कोलकाता भी इसी रंग में रंगने लगा। ममता का दावा है कि यह रंग आसमान को दर्शाता है और इसके पीछे आइडिया है, ‘आसमान की कोई सीमा नहीं’। ममता के पहनावे में भी उनकी इस रंग की झलक दिखती है। सफेद रंग की साड़ी और नीले रंग का बॉर्डर। भले ही ममता की इसके लिए आलोचना हुई हो कि उन्होंने जनता की गाढ़ी कमाई को उड़ाया, लेकिन उनका मकसद स्पष्ट था। लेफ्ट फ्रंट के लाल रंग को जनता की नजरों से दूर कर देना।
तो क्या अब चढ़ेगा भगवा रंग
फिलहाल सियासी हलकों के साथ-साथ आम जनता की निगाहें भी चार मई का इंतजार कर रही हैं। भाजपा समर्थकों को उम्मीद है कि एग्जिट पोल के आंकड़े हकीकत बन जाएं। अगर ऐसा हुआ तो कोलकाता की फिजाओं में इस बार नीले-सफेद की जगह, भगवा का बोल-बाला नजर आ सकता है।




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