क्या अब तक किसी ने आपके मुवक्किल को छुआ है? दीपक कुमार की सुरक्षा की मांग पर HC
बजरंग दल के खिलाफ आवाज उठाने के बाद सुर्खियों में आए उत्तराखंड के 'मोहम्मद' दीपक कुमार की याचिका पर हाई कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने दीपक की पुलिस सुरक्षा की मांग पर उनके वकील से पूछा कि क्या अब तक किसी ने आपके मुवक्किल को छुआ है? कोर्ट ने याचिका के मसौदे पर भी असंतोष व्यक्त किया।

बजरंग दल के खिलाफ आवाज उठाने के बाद सुर्खियों में आए उत्तराखंड के 'मोहम्मद' दीपक कुमार की याचिका पर हाई कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने दीपक की पुलिस सुरक्षा की मांग पर उनके वकील से पूछा कि क्या अब तक किसी ने आपके मुवक्किल को छुआ है? कोर्ट ने याचिका के मसौदे पर भी असंतोष व्यक्त किया।
उत्तराखंड के रहने वाले जिम मालिक 'मोहम्मद' दीपक कुमार कोटद्वार में एक मुस्लिम दुकानदार को परेशान करने वाले कुछ बजरंग दल कार्यकर्ताओं के खिलाफ आवाज उठाने के बाद सुर्खियों में आए थे। उनसे पुलिस सुरक्षा मांगने और पुलिस जांच की समीक्षा की मांग करने के संबंध में उत्तराखंड हाई कोर्ट में पूछताछ की गई।
दीपक ने एक मुस्लिम दुकानदार की मदद की थी, जब बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर एक बुजुर्ग व्यक्ति को परेशान किया। उस पर दबाव डाला कि वह अपनी दुकान का नाम हिंदू नाम से बदलकर मुस्लिम नाम रख ले। घटना के बाद पुलिस ने तीन एफआईआर दर्ज कीं, जिनमें से एक दीपक के खिलाफ दर्ज की गई।
बजरंग दल ने कोटद्वार में 26 जनवरी की घटना के संबंध में दीपक पर दंगा करने, चोट पहुंचाने और शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करने का आरोप लगाया है। कुमार ने अब उसी एफआईआर को रद्द करने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। अपनी याचिका में उन्होंने कोर्ट से यह भी अनुरोध किया है कि कथित तौर पर घृणास्पद भाषण देने वालों के खिलाफ बीएनएस की धारा 196 के तहत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। इसके अलावा उन्होंने पुलिस सुरक्षा और पुलिस जांच की समीक्षा की मांग की है।
मामले की सुनवाई कर रही हाई कोर्ट की एकल पीठ ने याचिका की वैधता पर सवाल उठाया और दीपक को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने पक्षपातपूर्ण आचरण का आरोप लगाते हुए मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारियों के खिलाफ संरक्षण और विभागीय जांच की मांग की थी, जबकि वह स्वयं एक 'संदिग्ध आरोपी' हैं।
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने पाया कि ये दीपक और उसके वकील द्वारा मामले को प्रभावित करने और सनसनीखेज बनाने के लिए अपनाई गई दबाव की रणनीति थी। मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस राकेश थपलियाल ने कहा कि चूंकि दीपक एक 'संदिग्ध आरोपी' है, इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि वह पुलिस सुरक्षा कैसे मांग सकता है। जस्टिस थपलियाल ने सरकारी वकील से खतरे की आशंका के बारे में पूछा। इस पर जवाब दिया गया कि जांच अधिकारी को दीपक से ऐसा कोई खतरा नहीं मिला है।
दीपक की ओर से वकील नवनीश नेगी ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को 26 जनवरी की घटना के बाद से धमकियां मिल रही थीं। घटना के कुछ दिनों बाद उनके जिम के बाहर भीड़ जमा हो गई थी, जिससे दहशत का माहौल बन गया था। इस पर जस्टिस थपलियाल ने टिप्पणी की कि पहली घटना 26 जनवरी को हुई और दूसरी 31 जनवरी को। फरवरी बीत चुका है और मार्च का आधा महीना भी बीत गया है। क्या अब तक किसी ने आपके मुवक्किल को छुआ है?
कोर्ट ने याचिका के मसौदे पर भी असंतोष व्यक्त किया। कोर्ट ने पाया कि एक 'संदिग्ध आरोपी' द्वारा मामले को सनसनीखेज बनाने और जांच अधिकारियों पर दबाव डालने के लिए कई राहतें मांगी गई थीं।
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