India Losing Its Rain and Snow scientists warns Snowfall Drought in Hills पहाड़ों पर बर्फ का सूखा, क्या भारत से कोई छीन रहा बारिश और बर्फबारी?, Uttarakhand Hindi News - Hindustan
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पहाड़ों पर बर्फ का सूखा, क्या भारत से कोई छीन रहा बारिश और बर्फबारी?

उत्तराखंड के साथ ही, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तर-पूर्व भी बर्फबारी की कमी से प्रभावित हैं। उत्तराखंड सबसे ज्यादा प्रभावित है। कम बर्फबारी के पीछे इस बार पश्चिमी विक्षोभ का कमजोर होना मुख्य वजह है।

Wed, 14 Jan 2026 01:00 PMGaurav Kala देहरादून
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पहाड़ों पर बर्फ का सूखा, क्या भारत से कोई छीन रहा बारिश और बर्फबारी?

India Losing Rain and Snow: उत्तराखंड के अनेक गांवों में कभी अक्तूबर महीने में ही बर्फ पड़ने लगती थी, लेकिन आज उन गांवों में बर्फबारी का इंतजार है। बर्फ से ढके रहने वाले पहाड़ सूखे पड़े हैं। बदलते पर्यावरण ने इंसानों को ही नहीं, वन्यजीवों को भी परेशान कर दिया है। पहाड़ों पर मुसीबतें कैसे बढ़ रही हैं? भारत से क्या कोई बारिश और बर्फ छीन रहा है? देहरादून से हिन्दुस्तान के स्थानीय संपादक राजीव पाण्डे की एक रिपोर्ट।

उत्तराखंड के सुदूर कोने मुनस्यारी के नरेंद्र सिंह और सिक्किम की राजधानी गंगटोक के कुमार तमांग हिमालय में बर्फ की कमी से चिंतित हैं। दोनों के अपने-अपने गांव में हिमालय है। एक पंचाचुली को देखते हुए बड़ा हुआ है, तो दूसरे ने कंचनजंगा के सामने होश संभाला है। नरेंद्र और तमांग ने इन चोटियों को न कभी छुआ है और न इनके पास गए हैं, लेकिन आज इन चोटियों की पीड़ा को उनसे बेहतर कोई महसूस नहीं कर सकता।

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मुनस्यारी या गंगटोक आने वाले पर्यटकों की तरह इन चोटियों से उनका केवल सुकून का रिश्ता नहीं है। ये चोटियां नरेंद्र और तमांग के जीवन का आधार हैं। ये दोनों कोई पर्यावरणविद् नहीं, सामान्य टैक्सी चालक हैं, पर दोनों को पता है कि हिमालय रहेगा, तो जीवन रहेगा। पानी, खेती, बिजली, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा सबके पीछे हिमालय है। यह बात जिस तरह नरेंद्र और तमांग समझते हैं, वैसे ही सबको समझनी होगी, क्योंकि हिमालय की बर्फ खत्म होना सिर्फ पहाड़ों की समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक संकट है।

खतरनाक होते पहाड़

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ग्लेशियरों का पिघलना और बर्फबारी का कम होना पहाड़ों को अस्थिर कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु रिपोर्टों एवं राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के विश्लेषणों के अनुसार, समस्त हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रहा है। बर्फ पहाड़ों के लिए ‘सीमेंट’ का काम करती है, जो उन्हें बांधे रखती है। इसके अभाव ने मानसूनी प्रवृत्तियों, अत्यधिक वर्षा, तापमान में वृद्धि और आपदाओं की आवृत्ति, तीव्रता और विस्तार को बढ़ा दिया है।

संदेह के बादल

चीन की कोशिश अपने प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम दोहन की है। साथ ही, वह पिछले 15 वर्ष से तिब्बत में बड़े पैमाने पर कृत्रिम वर्षा (क्लाउड सीडिंग) कार्यक्रम चला रहा है। तिब्बत के बंजर पठारों को उर्वर बनाने की यह कोशिश है। चीन अपने प्राकृतिक व कृत्रिम जल भंडारों को लबालब रखना चाहता है। कृत्रिम वर्षा से खतरा यह है कि हिमालय का प्राकृतिक परिवेश बदल सकता है। अभी सुरक्षा विशेषज्ञ दबी जुबान में मानते हैं कि यह कोशिश दरअसल पानी या वर्षा की चोरी है। वैसे, इसे सीधे साबित करना अभी संभव नहीं, पर अध्ययन जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि हम पड़ोसी के हाथों अपने हिस्से का पानी और बर्फ गंवा दे!

तिब्बत से गुजरने वाली यारलुंग सांगपो (भारत में ब्रह्मपुत्र) के सबसे तेज धार वाले मोड़ पर चीन अपनी सबसे बड़ी पनबिजली परियोजना विकसित कर रहा है। इस पर 168 अरब डॉलर की लागत का अनुमान है। यह परियोजना चीन के लिए ऊर्जा क्षेत्र में वरदान साबित हो सकती है। हालांकि, यह परियोजना जलवायु परिवर्तन को धीमा करने के वैश्विक प्रयासों में मदद कर सकती है, क्योंकि दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक चीन कोयले से चलने वाली ऊर्जा से छुटकारा पा सकेगा। फिर भी, इस परियोजना को कुछ सुरक्षा विशेषज्ञ ‘वाटर बम’ मानते हैं।

हर वर्ष दिसंबर और जनवरी में बर्फबारी

हालांकि, यह संकट एकदम से नहीं आया है। मैंने इस परिवर्तन को सबसे पहले उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में विस्तृत घाटी में बसे अपने छोटे से गांव देवलथल में देखा। अपने जन्म के 20 साल बाद तक मैंने हर वर्ष दिसंबर या जनवरी में कम से कम दो या तीन बार अपने गांव को बर्फ से ढका पाया। मेरे गांव में तब दो-दो दिन तक बर्फ टिक जाती थी। साल 2000 के बाद नियमित बर्फबारी का यह क्रम टूटने लगा। इसके बावजूद 2005 तक मेरे गांव ने कभी-कभी ही सही, बर्फ देखी। इसके बाद यहां जन्मे बच्चों को पता ही नहीं कि कभी उनके गांव में हर साल बर्फ पड़ती थी। मेरी पीढ़ी आखिरी है, जिसने अपने गांव में बर्फ पड़ती देखी है।

पर्यावरणीय चिंता

पहाड़ों में पर्यावरणीय परिवर्तन का मेरा पहला अनुभव घटती बर्फबारी थी, जिसने मेरा ध्यान खींचा, क्योंकि मैं और मेरे बचपन के साथी हर साल बर्फ में खूब खेलते थे, इसलिए हमें इसका इंतजार रहता था। इसके बाद मेरी नजर अपने गांव की उन छोटी-छोटी नदियों पर पड़ी, जिन्हें उत्तराखंड में गाड़ कहते हैं। पिथौरागढ़-थल रोड को हमारे गांव से अलग करने वाली गाड़ का नाम मुसरो गाड़ था। बरसात में अत्यधिक विकराल रूप धारण करने के कारण ही इस नदी का नाम मुसरो गाड़ रखा गया था। कुमाउनी में मुसरो का मतलब मसान होता है। मैंने अपने बचपन में यह नदी खुद कभी चलकर पार नहीं की, किसी न किसी की गोद में रहते ही पार हुआ। बाद में इसके विकराल रूप को देखते हुए नदी के ऊपर एक पुल बनाना पड़ा था, जो अब बेमानी है, क्योंकि पुल के नीचे नदी एक पतली धारा में बदल गई है। कभी यही वह नदी थी, जो बारहबीसी पट्टी के सैकड़ों गांवों को खेत सींचने के लिए और पीने के लिए पानी देती थी। इसके पानी से करीब 20 से 30 घराट (पनचक्कियां) चला करते थे। यह घराट पहाड़ में खेती-किसानी व पशुपालन के अलावा उत्तराखंड की सेहत और समृद्धि के भी प्रतीक थे। इन घराटों का बंद होना कोई छोटी घटना नहीं थी। बर्फ की कमी और बरखा चक्र में परिवर्तन का समाज पर सीधा असर था।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी चरमराई

बारिश-बर्फबारी की कमी से केवल घराट बंद नहीं हुए, उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही चरमरा गई। उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में आज भी 80 फीसदी से ज्यादा खेती बारिश के भरोसे ही होती है। बर्फबारी-बारिश की बेरुखी से खेत बंजर होने के साथ ही पशुपालन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। उत्तराखंड में खेती और पशुपालन संयुक्त जीवन पद्धति का हिस्सा हैं। खेतों से निकलने वाला भूसा, पराली और फसल अवशेष पशुओं का मुख्य चारा हैं, जबकि पशु खेती के लिए खाद उपलब्ध कराते हैं और अन्य काम भी आते हैं। यह एक पूरक चक्र है, जो पीढ़ियों से पहाड़ी समाज को आत्मनिर्भर बनाए हुए है। इस चक्र के टूटते ही ग्रामीण व्यवस्था डगमगाने लगी। इसके बाद ही मेरा गांव और आसपास के गांव धीरे-धीरे वीरान होने लगे। बर्फबारी और बारिश की कमी से देवलथल और उसके आसपास के गांवों में उपजा यह बड़ा संकट आज पूरे उत्तराखंड की वास्तविकता बन गया है। हां, दुनिया का ध्यान जरूर इस तरफ तब गया है, जब हिमालय की चोटियां काली नजर आने लगी हैं। इस मौसम में औली जैसे बर्फ से लकदक रहने वाले हिल स्टेशन काले पड़े हुए हैं।

कम हुआ बर्फ का गिरना-टिकना

मौसम विज्ञानियों के अनुसार, हिमालय के जिन पहाड़ों को इस समय बर्फ की सफेद चादर से ढका होना चाहिए था, वे अब सूखे और पथरीले नजर आ रहे हैं। साल 1980 से 2020 के औसत की तुलना में पिछले पांच वर्षों की अधिकांश सर्दियों में बर्फबारी में बड़ी कमी दर्ज की गई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, दिसंबर में उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में न के बराबर वर्षा हुई है। अनुमान है, जनवरी से मार्च के बीच उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर व लद्दाख जैसे क्षेत्रों में औसत से 86 प्रतिशत कम वर्षा और बर्फबारी हो सकती है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट की रिपोर्ट बताती है कि 2024-25 की सर्दियों में बर्फ के टिके रहने की अवधि में 24 प्रतिशत की रिकॉर्ड कमी देखी गई है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण यह संकट यूरोप में भी दिख रहा है।

उत्तराखंड सबसे ज्यादा प्रभावित

उत्तराखंड के साथ ही, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तर-पूर्व भी बर्फबारी की कमी से प्रभावित हैं। उत्तराखंड सबसे ज्यादा प्रभावित है। कम बर्फबारी के पीछे इस बार पश्चिमी विक्षोभ का कमजोर होना मुख्य वजह है। पहले भूमध्य सागर से आने वाली ठंडी हवाएं हिमालयी क्षेत्रों में भरपूर बर्फबारी लाती थीं। ये विक्षोभ उच्च क्षेत्रों को बर्फ से पूरी तरह ढक देता था, जिससे उत्तराखंड में अलकनंदा, मंदाकिनी, भागीरथी, भिलंगना, पिंडर, कोसी आदि नदियां और जल स्रोत भरे रहते थे।

हिमालय पर दोहरी मार

विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय अब ‘दोहरी मार’ झेल रहा है। एक तरफ, पुराने ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और दूसरी तरफ, नई बर्फ जम नहीं रही है। स्नो लाइन 60 मीटर के आसपास पीछे खिसक गई है। यह स्थिति आने वाले समय में दक्षिण एशिया के एक बड़े हिस्से के लिए गंभीर जल और पर्यावरणीय संकट पैदा कर सकती है। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में जल स्रोतों, कृषि और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञ समय पर बर्फबारी और बारिश के साथ-साथ जल संरक्षण, मौसम के अनुरूप खेती और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने को इस संकट से निपटने का एकमात्र रास्ता बता रहे हैं।

इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की रिपोर्टों के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण न केवल बर्फबारी कम हो रही है, बल्कि जो थोड़ी-बहुत बर्फ गिरती है, वह भी तेजी से पिघल रही है। निचले इलाकों में अब बर्फ के बजाय बारिश देखी जा रही है। वैज्ञानिक इसे ‘स्नो ड्रॉट’ (बर्फ का सूखा) कह रहे हैं, जो आने वाले समय में एक बड़े जल संकट की ओर इशारा कर रहा है।

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