उत्तराखंड के आधे से ज्यादा मदरसों पर बंदी की तलवार, ये मानक बने मदरसों की चुनौती
उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड के भंग होने के बाद, मदरसों को शिक्षा विभाग और अल्पसंख्यक प्राधिकरण से मान्यता की सख्त शर्तों का सामना करना पड़ रहा है। लगभग 452 मदरसों को मान्यता मिली है, लेकिन कई मदरसे बंद हो चुके हैं। धार्मिक शिक्षा के लिए मान्यता को बाध्य न करने की मांग उठाई गई है।
उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड भंग होने और मदरसों को शिक्षा विभाग एवं अल्पसंख्यक प्राधिकरण से मान्यता लेने के सख्त नियमों के बाद आधे से ज्यादा मदरसों पर बंदी की तलवार लटकी है। प्राधिकरण से मान्यता के लिए तय की गई 11 शर्तों ने मदरसा संचालकों के पसीने छूटे हैं। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री खजानदास एवं प्राधिकरण अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह तक मदरसा संचालक पहुंचे हैं। जमीयत उलमा ए हिंद और मदरसा एसोसिएशन की ओर से मदरसों में धार्मिक शिक्षा के लिए मान्यता को बाध्य न करने की मांग उठाई गई है। प्रदेशभर में मदरसा बोर्ड से 452 मदरसों को मान्यता मिली है। इनमें से यूएसनगर, हरिद्वार और देहरादून में करीब 150 मदरसे ऐसे है। जो पहले से ही स्कूल की तर्ज संचालित होते है और दीनी तालीम भी देते है। बच्चों से फीस भी लेते है। इन्होंने मान्यता मदरसा बोर्ड से ली हुई है। बताया गया है कि इन मदरसों को शिक्षा विभाग से मान्यता में दिक्कत नहीं आएगी। वहीं, करीब 50 अन्य मदरसे भी इस स्तर के है, जिन्हें मान्यता मिल सकती है। अन्य मदरसे दीनी तालीम और मदरसा बोर्ड के मानकों और पाठ्यक्रम तक ही सीमित है। चंदे पर ही उनका निजाम चलता है। ऐसे में इनके प्राधिकरण की 11 शर्तों को पूरा करने की संभावना नहीं के बराबर है। हाल ही में मदरसा बोर्ड के निदेशक गिरधारी सिंह रावत ने भी मदरसों में मानकों के संबंध में रिपोर्ट मांगी है।
दून में छह मदरसे हो गए बंद
दून जिले में छह मदरसे बंद हो गए हैं। इनके संचालकों ने लिखकर अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को दे दिया है कि वह संचालन नहीं करना चाहते। जिले में पहले 41 मदरसे पंजीकृत थे, अब 36 रह गए हैं। अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा हाल ही में प्राधिकरण के निर्देश पर मदरसों की जानकारी लेने पर यह बात सामने आई।
ये मानक सबसे बड़ी चुनौती
सबसे बड़ी चुनौती शिक्षा विभाग से मान्यता की होगी। क्योंकि मदरसा बोर्ड के मुकाबले शिक्षा विभाग के मानक ज्यादा सख्त है। खेल मैदान की अनिवार्यता में जगह की कमी मुश्किल होगी। प्राधिकरण की 11 शर्तों में डिग्रीधारी शिक्षक रखने की चुनौती होगी। मदरसों को महंगे शिक्षक रखना मुश्किल होगा। क्योंकि अधिकांश मदरसे लोगों के चंदे पर चलते है। सोसायटी के नाम जमीन काफी कम मदरसों की है। बिल्डिंगों में भी मानकों का अभाव है।
धार्मिक शिक्षा के लिए मान्यता को बाध्य न करें
जमीयत जिला अध्यक्ष मौलाना अब्दुल मन्नान कासमी, कोषाध्यक्ष मास्टर अब्दुल सत्तार, शहर सदर मुफ्ती अयाज और प्रदेश प्रवक्ता हाफिज शाहनजर कहते है कि किसी भी धर्म को धार्मिक शिक्षा देना लोकतांत्रिक अधिकार है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी ऐसा फैसला पिछले दिनों दिया है। उत्तराखंड में अल्पसंख्यक प्राधिकरण के कुछ बिंदुओं पर हाईकोर्ट नैनीताल में वाद दायर है। ऐसे में मान्यता के लिए दबाव बनाना गलत है। उम्मीद है कि सरकार एवं मंत्री स्तर पर समस्या का समाधान निकाला जाएगा।
मंत्री बोले, छात्रों की बेहतरी के लिए कदम, संशय दूर करने को बुलाई बैठक
मदरसा छात्रों को बेहतर आधुनिक शिक्षा मिले, वह भी मुख्यधारा से जुड़े। इसीलिए सरकार ने अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया है। मदरसों में अच्छी गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा, बेहतर इंतजाम होंगे और उनके प्रमाण पत्रों की मान्यता होगी तो छात्रों का भी विकास होगा। आठवीं तक मान्यता जिले से देने का प्रावधान कर दिया है। जो भी संशय है उसके लिए प्राधिकरण, मदरसा बोर्ड, शिक्षा विभाग, मदरसा प्रतिनिधियों और धर्मगुरुओं की एक उच्च और प्रदेश स्तरीय बैठक बुला रहे है।
खजानदास, अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री
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