MBA छात्र रणवीर के सीने पर मारी थी 22 गोलियां; राष्ट्रपति दौरे के बीच देहरादून पुलिस का वो एनकाउंटर
देहरादून में 17 साल बाद पुलिस ने एनकाउंटर में किसी बदमाश को ढेर किया है। 2009 में तब 17 दून पुलिसकर्मियों को एमबीए छात्र रणवीर के फेक एनकाउंटर के उम्रकैद की सजा हुई थी। रणवीर के सीने पर 22 गोलियां मारी थी।

Dehradun Encounter: राजधानी देहरादून की सड़कें एक बार फिर गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंजी। प्रेमनगर में प्रॉपर्टी डीलर को लूटने के बाद गोली मारकर भाग रहे बदमाशों को पुलिस ने पीछा करके मारा। तीन बदमाशों में से एक का सीना तीन गोलियों से छलनी-छलनी कर दिया। दो बदमाश भाग निकले। इस मुठभेड़ में एसएचओ नरेश राठौर भी बुरी तरह जख्मी हुए हैं। 2009 के बाद देहरादून में इस तरह का यह पहला एनकाउंटर है। 17 साल पहले गाजियाबाद के रणवीर सिंह का देहरादून पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर किया था। रणवीर के सीने पर 22 गोलियां मारी थी। इस फेक एनकाउंटर में 17 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा हुई थी।
29 अप्रैल की आधी रात देहरादून पुलिस ने बदमाशों का एनकाउंटर किया। बदमाश गुजरात नंबर की कार में सवार थे। पुलिस ने रोका तो उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी फायरिंग में एक बदमाश की मौके पर मौत हो गई। पुलिस और बदमाशों के बीच यह मुठभेड़ इतने करीब से हुई कि जवाबी फायरिंग में मारे गए बदमाश के सीने के पास तीन गोलियां आर-पार निकल गईं। अस्पताल ले जाने पर चिकत्सिकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मारे गए बदमाश की उम्र करीब 40 साल बताई जा रही है। बदमाश की शिनाख्त के प्रयास किया जा रहे हैं।
इंस्पेक्टर नरेश राठौर घायल
तीन बदमाशों ने खुद को चारों तरफ से घिरता देख पुलिस पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। अचानक हुई इस गोलाबारी में एसएचओ प्रेमनगर नरेश राठौर को दो गोलियां लग गईं। इंस्पेक्टर के घायल होने के बावजूद पुलिस टीम ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए तुरंत मोर्चा संभाला और जवाबी फायरिंग की।
घायल एसएचओ हायर सेंटर रेफर
लूट के शिकार पीड़ित प्रॉपर्टी डीलर और घायल एसएचओ प्रेमनगर, दोनों को ही प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर इलाज के लिए हायर सेंटर रेफर कर दिया गया है। फिलहाल, फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की टीम मौके पर पहुंच चुकी है और बदमाशों की इस्तेमाल की गई गुजरात नंबर की ब्लैक कार के साथ-साथ घटनास्थल की बारीकी से पड़ताल कर साक्ष्य जुटा रही है।
2009 के बाद पहली घटना
तीन जुलाई 2009 के बाद यह देहरादून पुलिस का दूसरा एनकाउंटर है। उस समय एमबीए छात्र रणवीर सिंह एनकाउंटर हुआ था। जिसके फर्जी साबित होने पर पुलिस पर सवाल उठे थे। 2009 के बाद दून पुलिस की बुधवार रात यह बड़ी मुठभेड़ हुई, जिसमें किसी बदमाश की पुलिस की गोलीबारी में जान गई।
राष्ट्रपति दौरे के बीच देहरादून में एनकाउंटर
गाजियाबाद निवासी और देहरादून से एमबीए करने वाले छात्र रणवीर सिंह के फेक इनकाउंटर की गूंज पूरे देश में सुनाई दी थी। मामले की जांच सीबीआई को देनी पड़ी थी। 3 जुलाई 2009 का दिन था। उस समय देश की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल उत्तराखंड दौरे पर थीं और देहरादून से मसूरी जाने का कार्यक्रम था। इसी दौरान रणवीर सिंह अपने दोस्त रामकुमार के साथ बाइक से मोहिनी रोड पर अशोक कुमार से मिलने पहुंचा। तीनों वहीं इंतजार कर रहे थे, जहां आराघर चौकी इंचार्ज जेडी भट्ट वाहनों की चेकिंग कर रहे थे।
रणवीर को थर्ड डिग्री टॉर्चर
राष्ट्रपति के काफिले की सूचना के चलते पुलिस वहां से वाहनों को हटाने में लगी थी। इसी दौरान जेडी भट्ट ने रणवीर को संदिग्ध मानते हुए पूछताछ शुरू की, जो जल्द ही विवाद में बदल गई। आरोप है कि चौकी इंचार्ज ने रणवीर के साथ अभद्रता की और उसकी बाइक पर डंडा मार दिया। इससे गुस्साए रणवीर और उसके साथियों ने मिलकर चौकी इंचार्ज की पिटाई कर दी।
रणवीर पर अवैध हथियार रखने का केस बनाया
घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। मौके पर पहुंचे तत्कालीन डालनवाला थाना प्रभारी संतोष कुमार जायसवाल ने रणवीर को गिरफ्तार कर लिया, जबकि उसके दोनों साथी मौके से फरार हो गए। इसके बाद पुलिस ने रणवीर के खिलाफ सख्त कार्रवाई की योजना बनाई और उस पर अवैध हथियार रखने का आरोप लगाकर केस तैयार करने की बात सामने आई।
पुलिस ने कंट्रोल रूम में संदेश प्रसारित किया कि एक बदमाश को तमंचे के साथ पकड़ा गया है। इसके बाद रणवीर को कथित तौर पर थर्ड डिग्री दी गई और उससे पूछताछ की गई। पुलिस उसे उसके फरार दोस्त रामकुमार की तलाश में धर्मशाला रोड स्थित एक फ्लैट तक भी ले गई, लेकिन वहां कोई नहीं मिला। बाद में उसे वापस थाने लाकर फिर से प्रताड़ित किए जाने के आरोप लगे।
रणवीर के सीने पर 22 गोलियां मारी
इस पूरे मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी कई चौंकाने वाले खुलासे किए, जिससे पुलिस की कहानी पर सवाल खड़े हो गए। रिपोर्ट के मुताबिक रणवीर के शरीर पर कुल 28 चोटों के निशान पाए गए थे, जबकि उसके सीने में करीब 22 गोलियां लगी थीं। इन तथ्यों ने कथित मुठभेड़ की सच्चाई पर गंभीर संदेह पैदा किया। यही वजह रही कि परिजनों ने इन सबूतों को आधार बनाकर पुलिस के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और मामले को न्याय की लड़ाई में बदल दिया।
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