SIR में रहें सावधान! इन गलतियों की नहीं मिलेगी माफी, कट सकता है वोट
उत्तराखंड में 8 जून से एसआईआर शुरू हो चुका है। ध्यान देने वाली बात यह है कि बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को नाम के इस अंतर को सीधे सुधारने की पावर नहीं दी गई है।

उत्तराखंड में मतदाता सूची को त्रुटिहीन बनाने को निर्वाचन आयोग ने सोमवार से विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान शुरू कर दिया। इसके तहत यदि मौजूदा मतदाता सूची में शामिल किसी व्यक्ति का नाम वर्ष 2003 की मूल मतदाता सूची से थोड़ा भी भिन्न पाया गया तो वोटर लिस्ट से उसका नाम कट भी सकता है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के अनुसार, इस बार नाम सुधारने या मिलान करने के लिए मतदाताओं को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ेगी। यदि मौजूदा डेटाबेस की जानकारी पिछले एसआईआर डेटाबेस या 2003 की सूची से मेल नहीं खाती है, तो निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ईआरओ) की ओर से नोटिस भेजा जाएगा। इसके बाद वोटर को खुद साबित करना होगा कि दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं।
इसी तरह यदि दो भाइयों या भाई-बहनों की उम्र में नौ महीने से कम का अंतर हुआ तो ऐसे लोग भी नोटिस के दायरे में होंगे। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के अनुसार, नोटिस की उपेक्षा करते हुए जवाब नहीं देने पर संबंधित व्यक्ति का वोट कट जाएगा।
बीएलओ सही नहीं कर पाएंगे नाम का अंतर
ध्यान देने वाली बात यह है कि बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को नाम के इस अंतर को सीधे सुधारने की पावर नहीं दी गई है। नोटिस मिलने के बाद मतदाता को खुद सही दस्तावेज जुटाने होंगे और एसडीएम दफ्तर में जाकर अपने दस्तावेजों का प्रस्तुतीकरण कर त्रुटियों को सुधरवाना होगा।
इस गलती की माफी नहीं
● वर्ष 2003 और वर्तमान सूची में मतदाता या उसके परिजनों के नाम की स्पेलिंग में अंतर होना।
● पुराने नाम में नया शब्द जुड़ा होना। उदाहरण के लिए जैसे-पहले किसी का नाम शिव रौतेला था और अब फार्म में शिव शंकर रौतेला भरता है तो उसे खुद साबित करना होगा कि उसका सही नाम दस्तावेजों में क्या है।
● छह अलग-अलग मतदाताओं का नाम किसी एक ही व्यक्ति (मकान मालिक या अभिभावक) के नाम से संबद्ध पाया जाना।
● मतदाता और उसके पिता की उम्र में 15 वर्ष या उससे कम का अंतर अथवा 50 वर्ष से अधिक का अंतर होना।
● दादा और पोते की उम्र में 40 वर्ष से कम का अंतर होना।
● दो भाइयों या भाई-बहनों की उम्र में नौ महीने से कम का अंतर।
एसआईआर: कहीं उत्साह, कहीं चुनौतियों का अंबार
उत्तराखंड में सोमवार से बीएलओ एसआईआर के तहत घर-घर जाकर मतदाताओं के सत्यापन और गणना प्रपत्र वितरित करने में जुट गए। इस अभियान के पहले दिन मिली-जुली तस्वीरें सामने आई हैं। कहीं लोगों ने बड़े उत्साह से बीएलओ का सहयोग किया जबकि कई जगह उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
एसआईआर ड्यूटी को आशाओं की ना
देहरादून आशा कार्यकर्ताओं ने एसआईआर और राशन कार्ड सत्यापन का कार्य करने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि उनके पास पहले से ही डेंगू सर्वे, पोलियो अभियान और स्वास्थ्य विभाग की अन्य जिम्मेदारियां हैं, ऐसे में अतिरिक्त कार्य करना संभव नहीं है।
आशा स्वास्थ्य कार्यकत्री यूनियन की अध्यक्ष शिवा दूबे ने सोमवार को बताया कि जिले में करीब 1400 आशा कार्यकर्ता कार्यरत हैं। उन्हें सुपरवाइजर लगातार सूची देकर सत्यापन कार्य के लिए दबाव बना रहे हैं जबकि जल्द ही डेंगू सर्वे दोबारा शुरू होने जा रहा है। 28 जून से पोलियो अभियान भी शुरू होना है। आशा कार्यकर्ताओं के लिए इतना कार्य करना मुश्किल है। उन्होंने आरोप लगाया कि डेंगू सर्वे के पिछले सीजन के लिए आशाओं को केवल एक हजार रुपये का भुगतान मिला है, जबकि तीन हजार रुपये अब भी बकाया हैं।
बीएलओ का सहयोग करने की अपील
एसआईआर के पहले दिन शाम चार बजे तक दो लाख 55 हजार 269 गणना फार्म का वितरण किया गया। मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बीवीआरसी पुरुषोत्तम, सचिव निर्वाचन दिलीप जावलकर, अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ.विजय कुमार जोगदंडे ने भी पहले दिन गणना फार्म भरकर बीएलओ को सौंपा। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने मतदाताओं से बीएलओ को सहयोग करने व गणना फार्म के साथ नया पासपोर्ट साइज फोटो देने की अपील की। उन्होंने स्पष्ट किया कि आठ जून से सात जुलाई तक घर-घर भ्रमण के दौरान वोटरों को कोई दस्तावेज जमा नहीं करना होगा।
चुनौतियां और विसंगति
एक ओर जहां बीएलओ वोटरों को फॉर्म बांट रहे हैं, वहीं उन्हें ऑनलाइन अपलोडिंग और विसंगतियों जैसी तकनीकी समस्याओं से भी जूझना पड़ रहा है। हरिद्वार के कुछ वार्डों में वोटर संख्या के मुकाबले विसंगतियों का प्रतिशत अधिक होने से बीएलओ असमंजस में हैं। वहीं, पौड़ी जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में नेटवर्क कनेक्टिविटी की समस्या ऑनलाइन कार्यों की गति को धीमा कर रही है। साथ ही, मतदाताओं के पास आवश्यक दस्तावेज या फोटो न होना भी कार्य को अतिरिक्त समय दे रहा है।
रिपोर्ट- विनोद मुसान
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