वंदे मातरम् तुष्टिकरण का पहला शिकार बना, योगी ने कांग्रेस को घेरा; सदन से की ये अपील
सीएम योगी ने कहा कि इतिहास साक्षी है कि 1896-97 में कांग्रेस के अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा वंदे मातरम् का गायन किया गया था। 1922 तक हर कांग्रेस अधिवेशन की यह परंपरा रही। न कोई फतवा था न कोई धार्मिक कोलाहल था। समस्या तब हुई जब राजनीति ने मजहबी मुखौटा ओढ़ा।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में आज वंदे मातरम् पर रात 8 बजे तक चर्चा होगी। चर्चा की शुरुआत करते हुए सीएम योगी ने कहा कि वंदे मातरम् को राष्ट्र के संघर्ष और संकल्प का प्रतीक बताया। उन्होंने इसे लेकर कांग्रेस को जमकर घेरा। सीएम योगी ने कहा कि वंदे मातरम की एक-एक पंक्ति ने देश में नई चेतना का संचार किया। फांसी के फंदे पर चढ़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों का अंतिम उद्घोष था 'वंदे मातरम'। दुर्भाग्यपूर्ण था कि गुलामी के दौर में अंग्रेजों का विरोध करने वाली कांग्रेस जिन्ना के दबाव में झुकती दिखी। भारत की आजादी को दिशा देने वाला मंत्र वंदे मातरम्, कांग्रेस की तुष्टिकरण नीति का पहला और सबसे बड़ा शिकार बना था। छह छंदों वाले राष्ट्रगीत को काटकर दो छंदों में सीमित कर देना किसी मजहबी मजबूरी का नतीजा था या सत्ता बचने के लिए राष्ट्र चेतना को गिरवी रखने की सुनियोजित साजिश थी?
सीएम योगी ने कहा कि इतिहास साक्षी है कि 1896-97 में कांग्रेस के अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा वंदे मातरम् का गायन किया गया था। 1922 तक हर कांग्रेस अधिवेशन की यह परंपरा रही। न कोई फतवा था न कोई धार्मिक कोलाहल था। समस्या तब पैदा हुई जब राजनीति ने मजहबी मुखौटा ओढ़ा। कांग्रेस ने उसी को अपनी नीति बना लिया। खिलाफत आंदोलन के समय तक भी वंदे मातरम् सभी सभाओं में गाया जाता था। मौलाना अब्दुल कलाम आजाद जैसे नेता इसका समर्थन करते थे। किसी ने भी इसे इस्लाम विरोधी नहीं कहा। यानि तब तक मजहब को इससे कोई खतरा नहीं था। खतरा चंद लोगों की राजनीति को था।
सीएम योगी ने कहा 1923 में कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे मोहम्मद अली जौहर ने सबसे पहले वंदे मातरम् के गायन का विरोध किया। गायन पर जौहर मंच छोड़कर चले गए। मंच छोड़ना उनका व्यक्तिगत निर्णय था लेकिन झुकना कांग्रेस की नीति बन गई थी। जौहर की इस राजनीतिक आपत्ति के बाद कांग्रेस ने एक समिति बना दी। 1937 में नीति बना दी गई कि केवल दो पद गाए जाएं, वो भी अनिवार्य न हो। यह धार्मिक सहिष्णुता नहीं, कांग्रेस का समर्पण था। इसके बाद इस मुद्दे पर खुलकर जहर उगला मोहम्मद अली जिन्ना ने। कांग्रेस से अलग होने के बाद जिन्ना ने जानबूझकर इसे मजहबी रंग दिया। 15 अक्टूबर 1937 को इसी लखनऊ से जिन्ना ने इसके खिलाफ नारा बुलंद किया। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। 26 अक्तूबर 1937 को कांग्रेस ने वंदे मातरम् से कुछ अंश निकालने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप मुस्लिम लीग का दुस्साहस बढ़ता गया। जब हमने तुष्टिकरण के चलते राष्ट्रभक्ति को पूरी तरह कैद करके रखने का दुस्साहस किया गया, तभी भारत के विभाजन की नींव पड़ी। जो लोग इस गीत का विरोध कर रहे उन्हें देशवासियों से माफी मांगनी चाहिए।
सीएम योगी ने कहा कि जब वंदे मातरम् अपनी रजत जयंती मना रहा था तब देश में ब्रिटिश हुकूमत थी। वंदे मातरम् की रचना जब की गई थी तब ब्रिटिश हुकूमत दमन और अत्याचार की पराकाष्ठा पर पहुंच चुकी थी। कांग्रेस के मंच पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार 1896 में अपना स्वर प्रदान किया था और यह पूरे देश के लिए एक मंत्र बन गया था लेकिन इस गीत के शताब्दी समारोह के दौरान कांग्रेस ने इमरजेंसी को थोपने का काम किया था। आज जब वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं तो पूरी दुनिया के सामने भारत विकसित भारत की संकल्पना के साथ आगे बढ़ रहा है। इस गीत के रचयिता बंकिम चंद्र चटोपाध्याय का सपना आज के एक भारत, श्रेष्ठ भारत की संकल्पना के साथ आगे बढ़ रहा है।
सीएम योगी ने सदन से किया ये अनुरोध
सीएम ने पूरे सदन से अनुरोध किया कि जिस आनंदमठ उपन्यास का यह गीत है, उस उपन्यास को सभी को देखना चाहिए। वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर हम लोग संकल्प लें कि वंदे मातरम केवल अतीत की स्मृति न रहे। बल्कि हम सभी के लिए भविष्य का भी संकल्प बने।




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