UP SIR: मुस्लिम बहुल सीटों पर कम कटे वोट, भाजपा वर्चस्व वाले बड़े शहरों में ज्यादा घटे, जानकार क्या बोले
उत्तर प्रदेश में एसआईआर (SIR) की अंतिम सूची जारी होने के बाद एक नया चुनावी गणित उभरकर सामने आया है। भाजपा के वर्चस्व वाले बड़े शहरों में मतदाताओं की संख्या में 20 से 23 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आई है। जबकि मुस्लिम बहुल जिलों में वोटों की कटौती का प्रतिशत 9 से 11 फीसदी के बीच रहा है।

UP News: यूपी में मतदाता पुनरीक्षण के बाद एसआईआर की फाइनल वोटर लिस्ट जारी हो गई है। प्रदेश में मतदाता सूची से दो करोड़ नाम कटने के बाद सियासी दलों के सामने नई चुनौती आ खड़ी हुई है। कारण यह कि भाजपा के वर्चस्व वाले बड़े शहरों में भारी संख्या में वोट कम हुए हैं। वहीं कमोबेश हर जिले की वीआईपी सीटों पर जहां मतों का अंतर बहुत कम था, वोट कटने से असर पड़ना तय माना जा रहा है। दूसरी ओर मुस्लिम बहुल जिलों में कमोबेश कम प्रतिशत में वोट कटने से भी सवाल उठ रहे हैं कि वोट कटने से किसे नफा होगा और किसे नुकसान...।
सियासी जानकार कहते हैं कि वोट तो कटे हैं लेकिन कहां किस दल के कितने वोट कट गए? यह तस्वीर साफ नहीं है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि मतदाता जोड़ने के अभियान में सत्ता पक्ष ने बाजी मारी है या फिर विपक्ष के वोट ज्यादा जुड़े हैं। ऐसे में इतना तो तय है कि मिशन-2027 के समर में सियासी दलों को रणनीति पर नए सिरे से मशक्कत करनी होगी। साथ ही ऐसी करीब 49 सीटें जहां अंतर 5000 से कम रहा था, वहां अब मुकाबला रोचक होना तय है।
मुस्लिम बहुल सीटों पर कम कटे वोट
वोट कटने के प्रतिशत पर नज़र डालें तो मुस्लिम बहुल जिलों में अपेक्षाकृत कम वोट कटे हैं। मसलन, सहारनपुर में 10.48 फीसदी वोट कटे थे। मुजफ्फरनगर में 10.38 फीसदी, शामली में 10.93, मुरादाबाद में 10 फीसदी, अमरोहा में 8.92 फीसदी, आजमगढ़ में 9.46, मऊ में 11.53 फीसदी, गाजीपुर में 10.89 फीसदी वोट कटे हैं। ये ऐसे जिले हैं जहां पर वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में ध्रुवीकरण का असर देखा गया था। ऐसे में इन सीटों पर भी मिशन-2027 में क्या नतीजे देखना दिलचस्प होगा।
बड़े शहरों में कट गए ज्यादा वोट
दूसरी ओर ऐसे शहर जहां पर भाजपा का वर्चस्व देखने को मिलता रहा है। मसलन, लखनऊ में करीब 22.89, गौतमबुद्धनगर में 19.33, कानपुर नगर में 19.42 फीसदी, अलीगढ़ में जहां वर्ष 2022 में भाजपा की झोली में सभी सीटें गई थीं, यहां 13.81 फीसदी मत कटे हैं। इसी तरह मेरठ में जहां सपा-भाजपा की वर्ष 2022 में कांटे की टक्कर हुई थी, 18.75 फीसदी वोट कटे हैं। गाजियाबाद में जहां भाजपा ने क्लीनस्वीप की थी, वहां सबसे ज्यादा 20 फीसदी के करीब वोट कटे हैं। आगरा में 17.71, शाहजहांपुर में 17.90 फीसदी वोट कटे हैं। इन सीटों पर भाजपा का वर्ष 2022 में दबदला रहा था। इन सीटों पर बदले समीकरण दोनों ही दलों के लिए रोचक जंग का सबब बनेंगे।
वीआईपी सीटों पर बड़ी चुनौती
मसलन, प्रयागराज में जहां करीब 8.26 लाख वोट कटे हैं। वहां मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी की इलाहाबाद शहर दक्षिणी सीट पर 99059 वोट कटे हैं। वर्ष 2022 के चुनाव में नंदी सपा प्रत्याशी रईस चंद शुक्ला को 26182 मतों से हराकर विधानसभा पहुंचे थे। ऐसे में वोटों की इस कटान से क्या असर पड़ेगा? यह कहना मुश्किल है।
प्रतापगढ़ की कुंडा सीट पर राजा भैया को वर्ष 2022 के चुनाव में 30418 वोटों से जीत मिली थी। कुंडा विधानसभा में 53539 मत कम हो गए हैं। इसी तरह देवरिया में कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही की पथरदेवा सीट पर 28637 मतदाता कम हो गए हैं। वर्ष 2022 में सूर्यप्रताप शाही ने सपा के ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को 28631 मतों के अंतर से हराया था। अब इस सीट पर चुनौतियां नए सिरे से मुंह बाए खड़ी हैं।
राजनीतिक जानकार सवाल उठाते हैं कि इन कटे वोटों में कितने सत्ता पक्ष के थे और कितने विपक्ष के इसकी गिनती कैसे होगी? फिर भी वोटों की यह कटौती किसे नफा पहुंचाएगी किसे नुकसान, यह कहना फिलहाल जल्दबाजी होगा लेकिन इतना जरूर है कि सभी दलों के सामने अपने वोटों को सहेजे रखने की नई चुनौती आ खड़ी हुई है। राजनीतिक विश्लेषक पूर्व आईजी अरुण कुमार गुप्ता तर्क देते हैं कि दो करोड़ मतदाता जिनके नाम कटे हैं, उनमें अधिकांश ऐसे होने की संभावना ज्यादा है जो या तो विस्थापित हो गए, या फिर उनकी मृत्यु हुई या फिर किसी अन्य कारणों से उनके पास दस्तावेज नहीं थे। उन्होंने कहा कि वर्ष 2003 में हुई एसआईआर के बाद अब सघन पुनरीक्षण में संख्या घटना स्वाभाविक है।




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