यूपी पंचायत चुनाव को लेकर बड़ा अपडेट, पिछड़ा वर्ग आयोग ने बताया कब तक दे पाएगा आरक्षण पर रिपोर्ट
UP Panchayat elections: यूपी पंचायत चुनाव को लेकर समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग ने बताया है कि छह महीने में आरक्षण पर अपनी रिपोर्ट दे पाएगा। आयोग के अध्यक्ष राम औतार सिंह ने मंगलवार को पत्रकारों को बताया कि आयोग को अपनी रिपोर्ट देने में छह महीने का समय लग सकता है ।

UP Panchayat elections: यूपी पंचायत चुनाव को लेकर बड़ा अपडेट आया है। समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग ने बताया है कि छह महीने में आरक्षण पर अपनी रिपोर्ट दे पाएगा। समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष राम औतार सिंह ने मंगलवार को पत्रकारों से बताया कि आयोग को अपनी रिपोर्ट देने में छह महीने का समय लग सकता है । आयोग ने मंगलवार से कार्य करना शुरू कर दिया है । उन्होंने कहा कि जिलों का भ्रमण कर यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कितना पिछड़ापन है और उसके सापेक्ष कितना राजनीतिक प्रतिनिधित्व है । उनके साथ आयोग के सदस्य भी मौजूद रहे ।
बीते 20 मई को त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में विभिन्न पदों की सीटों पर अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण तय करने के लिए उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कर दिया गया था। उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश राम औतार सिंह की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय आयोग का गठन हो गया है। वहीं राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से 10 जून को अंतिम मतदाता सूची जारी की जाएगी। फिलहाल, अब त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद ही होने की उम्मीद है। राष्ट्रीय पंचायती राज ग्राम प्रधान संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अखिलेश सिंह ने पंचायती राज ग्राम प्रधान संगठन के प्रदेश अध्यक्ष कौशल किशोर पांडेय ने राज्य सरकार के इस निर्णय पर खुशी जताई है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभार जताया है। संगठन मुख्यमंत्री का का आभार जताने को ब्लॉक से लेकर राज्य स्तर तक आयोजित करेगा आभार समारोह।
ओबीसी आयोग का कार्यालय राजधानी के जनपद में स्थित सचिवालय में बनाया गया है। अध्यक्ष राम औतार सिंह व सदस्य अब ओबीसी आरक्षण तय करने का कार्य शुरू कर दिया। आयोग का कार्यकाल छह महीने का है।
कल से ग्राम प्रधान प्रशासक के तौर पर करेंगे काम
मंगलवार को ग्राम प्रधानों का पांच वर्ष का कार्यकाल खत्म हो गया है। ऐसे में 27 मई से यह निर्वतमान ग्राम प्रधान प्रशासक के रूप में काम करेंगे। छह महीने या पंचायत चुनाव होने के बाद नई ग्राम पंचायत की प्रथम बैठक की तिथि तक जो भी पहले हो प्रधानों को प्रशासक पद की जिम्मेदारी दी गई है। प्रशासक के तौर पर ग्राम प्रधान सिर्फ रूटीन कार्यों को ही निपटाएंगे और कोई नीति विषयक निर्णय नहीं लेंगे। सोमवार को प्रमुख सचिव पंचायती राज अनिल कुमार की ओर से ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने का शासनादेश जारी कर दिया गया। वर्ष 2021 में कुल 58195 ग्राम पंचायत प्रधान निर्वाचित हुए थे और उनकी पहली बैठक 27 मई 2021 को हुई थी। ऐसे में ग्राम प्रधानों का पांच वर्ष का कार्यकाल मंगलवार को समाप्त हो रहा है। अभी तक चुनाव न होने की स्थिति में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने पर संबंधित विकास खंड के सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) को उस विकास खंड की ग्राम पंचायतों का प्रशासक बना दिया जाता था। ग्राम प्रधानों की मांग पर पहली बार प्रशासक बनाए जाने का निर्णय लिया गया है। ऐसे में ग्राम प्रधानों के पास ग्राम पंचायत की बागडोर पहले की ही तरह रहेगी।
प्रधान नीति निर्णय नहीं सिर्फ रूटीन काम कर सकेंगे
ग्राम पंचायत प्रधानों को प्रशासक पद की जिम्मेदारी पहली बार दी गई है। यह प्रशासक कोई नीति विषयक निर्णय नहीं ले सकेंगे। प्रशासक के तौर पर अत्यावश्यक एवं विशेष परिस्थितियों में नीति विषय निर्णय संबंधी प्रस्ताव जिला पंचायत राज अधिकारी के माध्यम से जिलाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। जिलाधिकारी की स्वीकृति के बाद ही नीति विषय निर्णय हो सकेगा।
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में देरी के कारण ग्राम पंचायतों में विकास कार्य बाधित न हों इसके लिए प्रशासक की व्यवस्था पंचायती राज विभाग की ओर से किए जाने का प्राविधान है। ग्राम प्रधानों की ओर से उन्हें ही ग्राम पंचायत का प्रशासक बनाने की मांग उठाई जा रही थी। उत्तराखंड, राजस्थान व मध्य प्रदेश में पंचायत चुनाव में देरी के कारण ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाने के निर्णय लिए गए हैं। ऐसे में यूपी में भी यही व्यवस्था लागू करने की मांग की जा रही थी। फिलहाल अब ग्राम प्रधान प्रशासक की भूमिका में ग्राम पंचायतों का संचालन करेंगे।




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