पुरानी पेंशन पर इंजीनियरों को बड़ी राहत, राज्य सरकार की 11 विशेष अपीलें एक साथ खारिज
हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए पीडब्ल्यूडी (PWD) के जूनियर इंजीनियरों से जुड़ी 11 विशेष अपीलों को खारिज कर दिया है। इस फैसले से बड़ी संख्या में जूनियर इंजीनियरों की पुरानी पेंशन योजना (OPS) का रास्ता साफ हो गया है।

UP News: हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में राज्य सरकार द्वारा दाखिल 11 विशेष अपीलों को खारिज कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि सरकार अपीलें दाखिल करने में हुई देरी के लिए पर्याप्त कारण प्रस्तुत नहीं कर सकी। सरकार की विशेष अपीलें खारिज होने के बाद पीडल्यूडी के तमाम जूनियर इंजीनियरों को बड़ी राहत मिली है। इस फैसले के बाद 1984-1989 के बीच नियुक्त जूनियर इंजीनियरों को साल 2001 से विनियमित माना जाएगा, जिससे उनके लिए पुरानी पेंशन योजना (OPS) का रास्ता साफ हो गया है। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रशासनिक सुस्ती और फाइलों के मूवमेंट को देरी का उचित कारण नहीं माना जा सकता।
यह आदेश मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने राम गोपाल गुप्ता व अन्य के विरुद्ध राज्य सरकार द्वारा अलग-अलग दाखिल विशेष अपीलों पर एक साथ सुनवायी करते हुए पारित किया। ये सभी अपीलें 9 सितंबर 2025 को एकल पीठ द्वारा दिये गए फैसले के खिलाफ दाखिल की गई थीं।
एकल पीठ ने पीडब्ल्यूडी में 1984 से 1989 के बीच डेली वेजेज अथवा वर्क चार्ज कर्मचारी के रूप में बड़ी संख्या में नियुक्त याची जूनियर इंजीनियरों को 2006 के बजाय 2001 से विनियमित करने का आदेश दिया था, जिसके परिणाम स्वरूप इन जूनियर इंजीनियरों को अन्य तमाम लाभों के साथ-साथ पुरानी पेंशन स्कीम का लाभ मिलना भी तय हो गया है। राज्य सरकार ने एकल पीठ के आदेश को विशेष अपीलें दाखिल कर, दो जजों की खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी थी।
अपीलों पर सुनवायी करते हुए खंडपीठ ने पाया कि सभी अपीलें समय सीमा समाप्त होने के बाद दाखिल की गई थीं, जिनमें देरी 93 दिन से लेकर 195 दिन तक की थी। राज्य सरकार की ओर से अपीलों के दाखिल में देरी के लिए फाइलों के मूवमेंट, विभागीय प्रक्रिया, छुट्टियों और विधानमंडल सत्र जैसे कारण बताए गए, लेकिन खंडपीठ ने इन्हें पर्याप्त नहीं माना।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि सरकार के पास सुव्यवस्थित तंत्र और संसाधन होते हैं, ऐसे में सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रियाओं का हवाला देकर देरी को उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह भी स्पष्ट किया कि देरी माफी के आवेदन पर विचार करते समय मुख्य प्रश्न यह होता है कि देरी के लिए उचित कारण है या नहीं, सरकारी विभागों की सुस्ती को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता, यदि ऐसी देरी को स्वीकार किया गया, तो यह न्याय व्यवस्था में अनिश्चितता पैदा करेगा और आम वादकारियों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। इन टिप्पणियों के साथ न्यायालय ने सभी विलंब माफी प्रार्थना पत्र खारिज कर दिए, जिसके परिणामस्वरूप सभी 11 विशेष अपीलें भी स्वतः निरस्त हो गईं।




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