पति-पत्नी के झगड़े, मानहानि के मामलों में अब सीधे FIR नहीं, DGP राजीव कृष्ण का निर्देश
यूपी डीजीपी ने निर्देश दिया है कि वैवाहिक विवाद, मानहानि और घरेलू हिंसा जैसे मामलों में अब सीधे एफआईआर दर्ज करने के बजाय परिवाद दाखिल कराया जाए। हाईकोर्ट की आपत्ति और नई दंड संहिता (BNSS) के नियमों के तहत यह कदम उठाया गया है ताकि तकनीकी खामियों का लाभ आरोपियों को न मिल सके।

उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) राजीव कृष्ण ने प्रदेश की पुलिस कार्यप्रणाली में सुधार लाते हुए एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किया है। अब पति-पत्नी के वैवाहिक विवाद, घरेलू हिंसा और मानहानि जैसे मामलों में पुलिस सीधे एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं करेगी। इसके बजाय, इन मामलों में पीड़ित पक्ष को अदालत में 'परिवाद' (Complaint) दाखिल करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। यह निर्णय इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा व्यक्त की गई कड़ी आपत्ति और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS)-2023 के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
सीधे एफआईआर से आरोपी को मिलता था लाभ
डीजीपी राजीव कृष्ण ने स्पष्ट किया कि जिन अपराधों में कानून के अनुसार केवल परिवाद के आधार पर ही अदालत संज्ञान ले सकती है, उनमें थानों पर सीधे एफआईआर दर्ज करना कानूनी रूप से उचित नहीं है। अक्सर देखा गया है कि सीधे एफआईआर दर्ज होने से कानूनी प्रक्रिया में तकनीकी खामियां रह जाती हैं, जिसका सीधा लाभ आरोपी को मिलता है और पीड़ित को न्याय मिलने में देरी या नुकसान उठाना पड़ता है। डीजीपी ने निर्देश दिया है कि पुलिस अधिकारी अब ऐसे मामलों में सीधे मुकदमा दर्ज करने से बचें।
बीएनएसएस-2023 और हाईकोर्ट का रुख
दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा सीधे एफआईआर दर्ज करने पर नाराजगी जताई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS)-2023 की विभिन्न धाराओं के तहत कई ऐसे अपराध हैं, जिनमें अदालत तभी संज्ञान लेती है जब पीड़ित स्वयं कोर्ट में परिवाद दाखिल करे। हाईकोर्ट की इसी टिप्पणी के बाद डीजीपी ने प्रदेश के सभी कप्तानों और थाना प्रभारियों को विस्तृत दिशा-निर्देश भेजे हैं।
इन मामलों में लागू होगी नई व्यवस्था
डीजीपी के निर्देशों के अनुसार, निम्नलिखित श्रेणियों के मामलों में अब परिवाद की व्यवस्था अनिवार्य होगी:
वैवाहिक प्रकरण: दहेज से संबंधित मामले और घरेलू हिंसा।
वित्तीय विवाद: निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट (चेक बाउंस आदि)।
विशेष कानून: माइंस एंड मिनरल एक्ट, कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट।
अन्य: पशुओं के साथ क्रूरता और मानहानि के मामले।
पीड़ितों के लिए क्या बदलेगा?
इस नई व्यवस्था से थानों पर बेवजह के मुकदमों का बोझ कम होगा और पुलिस का ध्यान गंभीर अपराधों पर केंद्रित हो सकेगा। वहीं, पीड़ितों को अब सीधे कानूनी विशेषज्ञों की सलाह से कोर्ट में अपनी बात रखने का मौका मिलेगा, जिससे मामले की मेरिट कमजोर नहीं होगी। डीजीपी ने सभी पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे जनता को इन कानूनी बारीकियों के बारे में जागरूक करें ताकि न्याय प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे।




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