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भाजपा में जिला कमेटियों के गठन में फंसा पेंच, महिलाओं को खोजने में नेताओं को छूट रहा पसीना

यूपी भाजपा संगठन में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू होने से जिला कमेटियों का गठन मुश्किल हो गया है। 21 सदस्यीय टीम में 7 महिलाएं अनिवार्य होने से ग्रामीण जिलों में सक्रिय कार्यकर्ताओं का संकट खड़ा हो गया है, जिसके कारण प्रदेश अध्यक्ष की चेकलिस्ट और पर्यवेक्षकों की मेहनत फिलहाल अटकी हुई है।

Tue, 17 March 2026 07:14 AMYogesh Yadav लखनऊ, राजकुमार शर्मा
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भाजपा में जिला कमेटियों के गठन में फंसा पेंच, महिलाओं को खोजने में नेताओं को छूट रहा पसीना

भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार संगठन में एक तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए हैं। 21 सदस्यीय जिला कार्यकारिणी में सात पद महिलाओं को दिए जाने हैं। एक ओर आधी आबादी को जोड़ने के लिए इसे पार्टी का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है तो दूसरी तरफ इस आरक्षण ने पेंच भी फंसा दिया है। चुनावी साल में सात ऐसे सक्रिय चेहरे खोजना मुश्किल हो रहा है। खासतौर से ग्रामीण इलाकों में ऐसी महिलाएं खोजने में जिला संगठन और पर्यवेक्षकों के पसीने छूट रहे हैं। वहीं नये नियम ने सक्रिय पुरुष कार्यकर्ताओं की भी बेचैनी बढ़ा दी है।

मोदी सरकार ने वर्ष 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम लागू किया था। इसके जरिए महिलाओं के लिए सदन में 33 फीसदी सीटें आरक्षित की जानी हैं। सदन से पहले भाजपा ने अपने संगठन से इसकी शुरुआत कर दी है। प्रदेश में इन दिनों 94 संगठनात्मक जिलों के गठन की प्रक्रिया चल रही है। सभी जिलों में आपसी समन्वय से टीमें तय करने के लिए पर्यवेक्षक भेजे गए थे।

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इन पर्यवेक्षकों को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी के हस्ताक्षर वाली एक चेक लिस्ट दी गई थी। क्या मानक हैं। किनसे रायशुमारी करनी है। किस आयु वर्ग तक के लोगों का चयन करना है, किन बातों का ध्यान रखना है आदि बातें उसमें थीं। सबसे महत्वपूर्ण बिंदु था, सात पद महिलाओं को दिए जाने का।

जनप्रतिनिधियों की सिफारिश में पुरुषों के नाम अधिक

पार्टी सूत्रों की मानें तो कई महानगरों में तो ऐसी सक्रिय महिलाओं के नाम मिल भी गए हैं, लेकिन ऐसे जिलों की संख्या कम है। ज्यादातर जनप्रतिनिधियों ने भी रायशुमारी में पुरुष कार्यकर्ताओं के नाम ही अधिक सुझाए हैं। वहीं जिलाध्यक्षों के लिए भी यह आसान नहीं है। खासतौर से ग्रामीण जिलों में समस्या अधिक है। खबर है कि सात नामों की खोज में एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बाद भी तमाम पर्यवेक्षकों को सफलता नहीं मिल सकी है।

पार्टी के प्रदेश नेतृत्व तक भी जिलाध्यक्षों व पर्यवेक्षकों ने यह समस्या पहुंचाई है। यह तय है कि पार्टी जिला इकाइयों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने जा रही है। मगर जहां ज्यादा दिक्कत है, ऐसे जिलों में आरक्षण के मानकों में कुछ ढील दी जा सकती है।

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संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की चुनौती

संगठन के भीतर इस नए बदलाव ने उन पुरुष कार्यकर्ताओं के बीच भी असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है, जो लंबे समय से जिला कमेटियों में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। एक-तिहाई पद आरक्षित होने के कारण कई वरिष्ठ और सक्रिय पुरुषों को इस बार सूची से बाहर होना पड़ सकता है। जिलाध्यक्षों का कहना है कि पार्टी की मंशा तो अच्छी है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में जहां राजनीति अब भी पुरुष प्रधान बनी हुई है, वहां अचानक सात प्रभावशाली महिला चेहरों को ढूंढना और उन्हें जिम्मेदारी के लिए तैयार करना एक बड़ी संगठनात्मक चुनौती है। यही कारण है कि कई पर्यवेक्षकों ने प्रदेश नेतृत्व से इस मानक में आंशिक ढील देने या सूची फाइनल करने के लिए अतिरिक्त समय देने का अनुरोध किया है।

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