UP Allahabad High Court said Government Employee no right on job after Acquittal in Criminal Case आपराधिक मुकदमे में बरी हुए तो भी सरकारी कर्मी को बहाली का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट, Uttar-pradesh Hindi News - Hindustan
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आपराधिक मुकदमे में बरी हुए तो भी सरकारी कर्मी को बहाली का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

यूपी के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल आपराधिक मामले में बरी होने के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी को स्वतः सेवा में बहाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि विभागीय जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो ऐसी कार्रवाई बरकरार रह सकती है।

Mon, 20 April 2026 10:44 PMSrishti Kunj विधि संवाददाता, प्रयागराज
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आपराधिक मुकदमे में बरी हुए तो भी सरकारी कर्मी को बहाली का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

यूपी के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल आपराधिक मामले में बरी होने के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी को स्वतः सेवा में बहाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि विभागीय जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो ऐसी कार्रवाई बरकरार रह सकती है, भले ही आपराधिक मुकदमे में अभियुक्त को राहत मिल गई हो। पुलिस कांस्टेबल कुंवर पाल सिंह की याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला दिया।

कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमा और विभागीय कार्यवाही अलग-अलग दायरे में चलते हैं और दोनों के मानक भी भिन्न होते हैं। यूपी के फिरोजाबाद से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि दोनों कार्यवाहियों में आरोप, साक्ष्य और गवाह समान हों और आपराधिक न्यायालय द्वारा ‘सम्मानपूर्वक बरी’ किया गया हो, तो स्थिति अलग हो सकती है। लेकिन यदि बरी होना केवल संदेह का लाभ या गवाहों के मुकर जाने के कारण हुआ हो, तो विभागीय कार्रवाई पर उसका प्रभाव नहीं पड़ता।

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अनुशासनात्मक कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से हाईकोर्ट ने इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। मामले के अनुसार याची फिरोजाबाद जिले में तैनात था। उस दौरान उसे एक मुल्जिम को जेल से एक बंदी को अदालत में पेश करने की जिम्मेदारी मिली। ड्यूटी पर अत्यधिक शराब का सेवन करने के कारण उसकी सरकारी राइफल से गोली चल गई जिसमें दो लोग घायल हो गए। इसका मुकदमा धारा 307 आईपीसी में दर्ज किया गया।

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साथ ही याची के विरुद्ध विभागीय जांच भी शुरू की गई। मेडिकल जांच से साबित हुआ कि घटना के वक्त याची शराब के नशे में था। इस मामले में अदालत ने पाया कि आपराधिक मुकदमे में मुख्य गवाह मुकर गए थे, जिसके कारण याची को बरी किया गया। वहीं, विभागीय जांच में चिकित्सीय परीक्षण सहित पर्याप्त साक्ष्य मौजूद थे, जिससे यह साबित हुआ कि घटना के समय याची ड्यूटी पर नशे की हालत में था और उसकी लापरवाही से गोली चली।

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अदालत ने कहा कि यह “क्लीन एक्विटल” (पूर्णत: निर्दोष साबित होना) का मामला नहीं है। विभागीय जांच में प्रस्तुत साक्ष्य अधिक ठोस और व्यापक थे, जबकि आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पक्ष कमजोर पड़ा। इन तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और पुनरीक्षण प्राधिकारी के आदेशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच में आरोप सिद्ध हो रहे हैं तो कार्यवाही जारी रह सकती है।

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