बेटियों का उत्पीड़न, निषादों को ठगा; सरकार अपनी फिर क्यों मंच पर रोए कैबिनेट मंत्री संजय निषाद?
गोरखपुर में निषाद पार्टी के अधिवेशन के दौरान कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद भावुक होकर रो पड़े। प्रदेश में सरकार उनकी ही है इसके बाद भी निषाद समाज की बहू-बेटियों के उत्पीड़न और हक छीने जाने का आरोप लगाया। राजनीतिक विश्लेषक उनके आंसुओं को कई नजरिए से देख रहे हैं।

Up News: निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी की योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद ने रविवार को गोरखपुर के महंत दिग्विजय नाथ पार्क से शक्ति प्रदर्शन के साथ चुनावी हुंकार भरी। इस 'प्रांतीय अधिवेशन' की सबसे बड़ी चर्चा राजनीतिक दांव-पेच से ज्यादा डॉ. निषाद के आंसुओं की रही। आरक्षण की मांग और समाज के उत्पीड़न का जिक्र करते हुए मंत्री जी मंच पर ही फूट-फूटकर रोने लगे, जिसने वहां मौजूद समर्थकों के साथ-साथ प्रदेश की सियासत में भी हलचल पैदा कर दी है। उनके आंसुओं के निहितार्थ निकाले जा रहे हैं।
'आज भी लूटी जा रही इज्जत' : सरकार में रहकर गंभीर आरोप
संजय निषाद ने अपने संबोधन में अत्यंत गंभीर और चौंकाने वाले आरोप लगाए। उन्होंने कहा, "निषाद समाज की बहू-बेटियों का आज भी उत्पीड़न हो रहा है। दशकों से शोषण करने वाले लोग आज भी वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं। हमारे समाज का हक छीना गया, उन्हें ठगा गया और उनकी इज्जत लूटी जा रही है।" यह भी कहा कि हम लोगों से वोट छीना जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि डॉ. निषाद खुद सरकार का हिस्सा हैं, फिर भी उन्होंने मंच से ही पुलिस अधिकारियों को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि भाजपा सरकार में निषादों का उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं होगा। उन्होंने मांग की कि किसी भी निषाद पर मुकदमा दर्ज करने से पहले उसकी गहन जांच की जाए।
160 सीटों पर दावेदारी और आरक्षण का मुद्दा
डॉ. निषाद ने घोषणा की कि उत्तर प्रदेश की 160 विधानसभा सीटों पर निषाद मतदाता निर्णायक हैं और पार्टी इन सभी सीटों पर अपनी मजबूती दर्ज कराएगी। उन्होंने 5 अप्रैल तक प्रदेश भर में चार बड़ी रैलियां करने का ऐलान भी किया। अधिवेशन का मुख्य एजेंडा निषाद समाज को SC (अनुसूचित जाति) वर्ग में आरक्षण दिलाना था। इसकी मांग हालांकि वह लंबे समय से कर रहे हैं। उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि अंग्रेज निषादों से डरते थे, इसलिए उन्हें अपराधी जातियों की सूची में डाला गया, लेकिन आजादी के बाद भी उन्हें हक नहीं मिला।
इमोशनल कार्ड या दबाव वाली राजनीति
राजनीतिक गलियारों में डॉ. संजय निषाद के इन आंसुओं को महज भावुकता नहीं, बल्कि एक सोची-समझी 'इमोशनल कार्ड' वाली रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए भी जब 'निषाद आरक्षण' जैसे मुख्य वादे पर कोई ठोस प्रगति नहीं दिखी, तो समाज के भीतर उठ रहे असंतोष को शांत करने के लिए यह सबसे कारगर हथियार अपनाया है। रोकर संजय निषाद ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे अपनी ही सरकार में 'मजबूर' हैं, लेकिन अपने समाज के हक के लिए आज भी उतने ही संजीदा हैं जितने पहले थे।
यह आंसू उन कार्यकर्ताओं को भावनात्मक रूप से जोड़ने का एक प्रयास है जो सत्ता में भागीदारी के बावजूद खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। साथ ही, 160 सीटों पर दावेदारी ठोकने से पहले इस तरह का प्रदर्शन गठबंधन के बड़े साथी (भाजपा) पर दबाव बनाने की एक 'प्रेशर पॉलिटिक्स' मानी जा रही है, ताकि आगामी चुनावों में निषाद पार्टी को अधिक सीटें और तवज्जो मिल सके।




साइन इन