Rent receipts alone cannot provide tenancy rights allahabad High Court makes significant observation सिर्फ लगान रसीदों से नहीं मिल सकता किराएदारी का अधिकार, हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी, Uttar-pradesh Hindi News - Hindustan
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सिर्फ लगान रसीदों से नहीं मिल सकता किराएदारी का अधिकार, हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल लगान की रसीदों के आधार पर कोई व्यक्ति किसी कृषि भूमि का कानूनी किरायेदार होने का दावा नहीं कर सकता है। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने कानपुर के एक 45 साल पुराने दीवानी मामले की सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया।

Wed, 25 Feb 2026 11:20 PMDinesh Rathour प्रयागराज, विधि संवाददाता
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सिर्फ लगान रसीदों से नहीं मिल सकता किराएदारी का अधिकार, हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल लगान की रसीदों के आधार पर कोई व्यक्ति किसी कृषि भूमि का कानूनी किरायेदार होने का दावा नहीं कर सकता है। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने कानपुर के एक 45 साल पुराने दीवानी मामले की सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पास पट्टा या अन्य कोई औपचारिक लीज दस्तावेज नहीं है, तो मात्र रसीदें उसे किरायेदार का दर्जा दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं और ऐसी स्थिति में उसका कब्जा केवल एक 'लाइसेंसधारी' या 'अतिक्रमणकारी' के रूप में ही माना जाएगा।

यह मामला मूल रूप से वर्ष 1971 में शुरू हुआ था, जब वादी देवी दयाल ने नगर महापालिका कानपुर के विरुद्ध स्थायी निषेधाज्ञा के लिए एक वाद दायर किया था। वादी का कहना था कि वह विवादित भूखंडों पर एक किरायेदार के रूप में खेती कर रहा है और उसने इसके प्रमाण के रूप में लगान की रसीदें भी प्रस्तुत की थीं । हालांकि, प्रतिवादी पक्ष यानी नगर महापालिका का कहना था कि वादी को केवल एक फसली वर्ष (1372 फसली) के लिए अनुमति के आधार पर भूमि दी गई थी, जिसके बाद उसका कब्जा अवैध हो गया और वह एक अतिक्रमणकारी बन गया।

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ट्रायल कोर्ट ने खारिज किया था विवाद

ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 1976 में ही इस वाद को खारिज कर दिया था, जिसे बाद में प्रथम अपीलीय न्यायालय ने भी वर्ष 1980 में इस आदेश को बरकरार रखा। इसके विरुद्ध वादी ने वर्ष 1981 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में दूसरी अपील दायर की थी, जो पिछले साढ़े चार दशकों से लंबित थी। हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों का बारीकी से अवलोकन करते हुए पाया कि वादी ने कभी भी खुद को 'असामी' या 'भूमिधर' के रूप में स्थापित करने के लिए ठोस दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए। कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी द्वारा दी गई अस्थायी अनुमति की समाप्ति के बाद वादी का अधिकार समाप्त हो गया था।

अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 'चंद्रभान बनाम सरस्वती' और अन्य महत्वपूर्ण नजीरों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि दूसरी अपील में हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब कोई गंभीर कानूनी त्रुटि या 'सारवान कानूनी प्रश्न' मौजूद हो। इस मामले में चूंकि दोनों निचली अदालतों ने वादी को अतिक्रमणकारी माना था, इसलिए हाई कोर्ट ने उन निष्कर्षों को सही पाया और अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट के इस आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकारी या नगर निकाय की जमीनों पर केवल पुराने कब्जे या रसीदों के बल पर मालिकाना हक या स्थायी किरायेदारी का दावा नहीं किया जा सकता।

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भरण-पोषण का अधिकार निरंतर चलने वाला अधिकार: हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार को सतत अधिकार मानते हुए क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्ति खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का अधिकार एक निरंतर चलने वाला अधिकार है। अतः जिस स्थान पर पत्नी निवास कर रही है, वहीं की अदालत को वाद सुनने का अधिकार होगा। केवल इस आधार कि मूल कारण किसी अन्य स्थान से संबंधित है, पर न्यायालय के क्षेत्राधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने सीमा पांडेय की याचिका पर उसकी ओर से एडवोकेट गौरव द्विवेदी के ब्रीफ पर एडवोकेट प्रखर शुक्ल को सुनकर दिया है। अधिवक्ता द्वय ने तर्क रखा कि सैन्यकर्मी की पत्नी याची को भारतीय सेना अधिनियम 1950 की धारा 90 के तहत पति के वेतन से भरण-पोषण के लिए कटौती का वैधानिक अधिकार प्राप्त है और संबंधित अधिकारी के समक्ष लंबित अभ्यावेदन पर समयबद्ध निर्णय आवश्यक है। कोर्ट ने प्रारंभिक क्षेत्राधिकार पर विपक्षी को आपत्ति को अस्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि संबंधित कमांडिंग ऑफिसर याची के अभ्यावेदन पर 60 दिन के भीतर विधि अनुसार निर्णय लें।

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