दिनदहाड़े न्यायिक हत्या है ट्रायल जज का फैसला, हाईकोर्ट बरसा, आचरण पर भी गंभीर टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद नगर निगम के एक मामले में निचली अदालत के फैसले को 'दिनदहाड़े न्यायिक हत्या' करार देते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि ट्रायल जज ने एक मृत व्यक्ति के खिलाफ मालिकाना हक की डिक्री जारी कर दी थी, जो कानूनन शून्य है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मृत व्यक्ति के खिलाफ पारित डिक्री कानून में शुरू से ही शून्य है। कोर्ट ने गाजियाबाद नगर निगम से जुड़े एक मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए उसे ‘शून्य’ करार दिया है। अदालत ने संबंधित ट्रायल जज के आचरण पर भी गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि यह फैसला दिनदहाड़े की गई न्यायिक हत्या के समान है। कोर्ट ने संबंधित ट्रायल कोर्ट जज के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई के लिए मामला मुख्य न्यायाधीश को भेजने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति न्यायमूर्ति संदीप जैन ने गाजियाबाद नगर निगम की प्रथम अपील पर पारित किया है।
मामले के अनुसार वादकर्ता इंद्र मोहन सचदेव ने दावा किया था कि वह आनंद इंडस्ट्रियल एस्टेट, जीटी रोड, गाजियाबाद स्थित प्लॉट संख्या 9 (नया नंबर 12/9) के मालिक हैं। उन्होंने यह अधिकार वर्ष 2022 में एक अन्य वाद में पारित एकपक्षीय डिक्री के आधार पर प्राप्त बताया था, जिसमें उन्हें प्रतिकूल कब्जे के आधार पर स्वामित्व घोषित किया गया था।
उन्होंने नगर निगम गाजियाबाद से अपने नाम दर्ज करने के लिए आवेदन किया, लेकिन कार्रवाई न होने पर अनिवार्य निषेधाज्ञा का वाद दायर किया, जिसे सिविल जज (सीनियर डिवीजन), गाजियाबाद ने 13 मई 2025 को स्वीकार कर लिया।
अपील में नगर निगम की ओर से कहा गया कि जिस वाद में वादी का स्वामित्व घोषित किया गया था, उस वाद की प्रतिवादी श्रीमती सुशीला मेहरा की मृत्यु वर्ष 1996 में ही हो चुकी थी जबकि मुकदमा वर्ष 2019 में दायर किया गया और 2022 में एकपक्षीय डिक्री पारित हुई।
वादी के अधिवक्ता ने भी स्वीकार किया कि सुशीला मेहरा की मृत्यु 2 अप्रैल 1996 को हो चुकी थी। ऐसे में मृत व्यक्ति के विरुद्ध पारित डिक्री को न्यायालय ने पूर्णतः शून्य माना।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया। इन फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि यदि किसी मृत व्यक्ति के विरुद्ध डिक्री पारित होती है, तो वह विधि की दृष्टि में शून्य होती है और उसे कभी भी चुनौती दी जा सकती है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल हाउस टैक्स जमा करने या नगर निगम के अभिलेखों में नाम दर्ज होने से स्वामित्व सिद्ध नहीं होता। म्यूटेशन प्रविष्टियां केवल राजस्व/कर वसूली के उद्देश्य से होती हैं, वे स्वामित्व का प्रमाण नहीं हैं।
ट्रायल जज पर सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के जज के आचरण पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्होंने साक्ष्यों की अनदेखी कर कानून की अवहेलना की है। कोर्ट ने इसे कहा कि यह मामला न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोरने वाला है। न्यायालय ने आदेश दिया कि प्रकरण की फाइल मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रशासनिक कार्रवाई के लिए प्रस्तुत की जाए।




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