PDA सियासी नौटंकी, सपा का चाल-चरित्र दलित विरोधी; मायावती ने फिर याद दिलाया गेस्ट हाउस कांड
कांशीराम की जयंती पर ‘पीडीए दिवस’ मनाने की समाजवादी पार्टी की घोषणा पर बहुजन समाज पार्टी ने इसे राजनीतिक दिखावा बताया। बसपा ने सपा पर बहुजन महापुरुषों के अनादर और वोट बैंक की राजनीति का आरोप लगाया।

आगामी 15 मार्च को कांशीराम की जयंती पर समाजवादी पार्टी द्वारा ‘पीडीए दिवस’ मनाने की घोषणा के बाद यूपी की सियासत गरमा गई है। समाजवादी पार्टी ने इस दिन को पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) एकता के संदेश के रूप में मनाने की बात कही है, वहीं बहुजन समाज पार्टी ने इसे राजनीतिक दिखावा करार दिया है। बसपा का कहना है कि सपा का इतिहास दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग और बहुजन समाज के महापुरुषों के सम्मान के अनुरूप नहीं रहा है। बसपा प्रमुख मायावती ने बयान जारी कर कहा कि कांशीराम की जयंती पर पीडीए दिवस मनाने की घोषणा सपा की ‘राजनीतिक नाटकबाजी’ है।
गेस्ट हाउस कांड की याद दिलाई
उन्होने आरोप लगाया कि सपा समय-समय पर उपेक्षित वर्गों के वोट हासिल करने के लिए प्रतीकात्मक कार्यक्रम करती रही है, जबकि उसके शासनकाल में इन वर्गों को अपेक्षित सम्मान और सुरक्षा नहीं मिली। मायावती ने 1993 में हुए सपा-बसपा गठबंधन और 2 जून 1995 के लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड का उल्लेख करते हुए कहा कि उस दौर की घटनाएं राजनीतिक इतिहास में दर्ज हैं और बहुजन समाज उन्हें नहीं भूला है। उन्होंने आरोप लगाया कि गठबंधन सरकार के दौरान दलितों और कमजोर वर्गों के हितों की अनदेखी की गई, जिसके चलते बसपा ने समर्थन वापस लिया था।
सपा दलित विरोधी- मायावती
बसपा की ओर से यह भी कहा गया कि कांशीराम के नाम पर बनाए गए जिलों और संस्थानों के नाम सपा सरकार में बदले गए। कांशीराम नगर (कासगंज) और संत रविदास नगर (भदोही) के नाम परिवर्तन का जिक्र करते हुए इसे बहुजन समाज के सम्मान के विपरीत कदम बताया गया। साथ ही लखनऊ में कांशीराम के नाम पर स्थापित उर्दू-फारसी-अरबी विश्वविद्यालय और सहारनपुर में उनके नाम पर बने अस्पताल का नाम बदले जाने का भी मुद्दा उठाया गया।
बहुजन समाज के रहें सावधान- मायावती
बीएसपी चीफ ने कहा कि सपा का दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग, मुस्लिम व बहुजन समाज विरोधी जो जातिवादी और साम्प्रदायिक रवैया किसी से छिपा नहीं है। इसके साथ ही सपा, लोगों को इस बात का भी जवाब दे कि कांशीराम को उनके जीते-जी आदर-सम्मान देना और बहुजन एकता के लिये उनके योगदान की सराहना करना तो बहुत दूर, बल्कि उनके देहान्त के बाद एक दिन का भी राजकीय शोक घोषित करके उन्हें श्रद्धांजलि आदि क्यों नहीं दी की गयी थी? सपा के इन सब दलित विरोधी और जातिवादी कृत्यों को ध्यान में रखकर बहुजन समाज के लोगों को हमेशा सावधान रहना चाहिये, यही बीएसपी की अपील है।
15 मार्च को पीडीए दिवस मना रही सपा
वहीं, समाजवादी पार्टी का कहना है कि पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की अवधारणा सामाजिक न्याय और समावेशी राजनीति को आगे बढ़ाने का प्रयास है। पार्टी नेताओं के मुताबिक, कांशीराम के सामाजिक परिवर्तन के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से यह दिवस मनाया जा रहा है।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांशीराम जयंती के बहाने दलित-पिछड़ा एकता और सामाजिक न्याय की राजनीति एक बार फिर चर्चा में है। उत्तर प्रदेश में इन वर्गों की निर्णायक भूमिका को देखते हुए यह मुद्दा आने वाले समय में और भी अहम हो सकता है।




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