किस आधार पर दिए मदरसों की ATS जांच के आदेश? हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में चार हजार मदरसों की एटीएस से जांच को चुनौती देने वाली याचिका पर राज्य सरकार और एटीएस से जवाब मांगा है। कोर्ट ने पूछा है कि किस आधार पर एंटी-टेररिज्म स्क्वाड को इन मदरसों की जांच करने करने का निर्देश दिया गया है।

UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में लगभग चार हजार मदरसों की एटीएस से जांच को चुनौती देने वाली याचिका पर राज्य सरकार और एटीएस से जवाब मांगा है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि किस आधार पर एंटी-टेररिज्म स्क्वाड को इन मदरसों की जांच करने करने का निर्देश दिया गया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा एवं न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया व अन्य की प्रबंध समितियों की याचिका पर वरिष्ठ अधिवक्ता वीके सिंह व अधिवक्ता औसाफ बी और सरकारी वकील को सुनकर दिया है।
याचिका में प्रदेश के मदरसों की जांच एटीएस से कराने के आईजी एटीएस के नौ दिसंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई है। याचियों का तर्क है कि राज्य के मदरसे उत्तर प्रदेश बोर्ड ऑफ मदरसा एजुकेशन एक्ट 2004 और 2016 की नियमावली के तहत कानूनी रूप से संचालित हो रहे हैं। ऐसे में अचानक एटीएस जांच का आदेश देना उनके अधिकारों का हनन है।
सीनियर एडवोकेट वीके सिंह ने कहा कि जांच का आदेश पूरी तरह मनमाना और निराधार है। एटीएस के मांग पत्र में विदेशी फंडिंग या किसी भी संदिग्ध गतिविधि का कोई ठोस जिक्र नहीं है। साथ ही बिना किसी पूर्व सूचना या संदेह के ऐसी कार्रवाई संस्थानों की छवि खराब करने वाली है। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि यह याचिका समय से पहले दाखिल की गई है क्योंकि यह केवल एक सामान्य जांच है। यदि जांच में कुछ गलत नहीं पाया जाता है तो रिपोर्ट में भी वही तथ्य सामने आएंगे। इससे किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। सुनवाई के बाद खंडपीठ ने कहा कि याचिका में आदेश को मनमाना बताया गया है और याची कानूनी ढांचे के भीतर काम करने का दावा कर रहे हैं इसलिए सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि इस आदेश को जारी करने के पीछे ठोस आधार क्या थे। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए चार मई की तारीख लगाई है।
न्यायिक हिरासत के विरुद्ध बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पोषणीय नहीं
एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी नाबालिग लड़की को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के आदेश पर बाल गृह में रखा गया है, तो उसे ‘अवैध हिरासत’ नहीं माना जा सकता और ऐसे मामलों में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका सुनवाई योग्य नहीं होती।
न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने यह आदेश उस याचिका पर दिया, जिसमें एक व्यक्ति ने दावा किया था कि उसकी पत्नी दीक्षा को उसकी इच्छा के विरुद्ध मथुरा के वृंदावन स्थित राजकीय बालिका गृह में रखा गया है और उसे उसकी कस्टडी दी जानी चाहिए।
याची ने कहा कि दीक्षा उसकी विधिवत विवाहित पत्नी है और राज्य द्वारा उसे बालिका गृह में रखना अवैध है। वहीं, राज्य की ओर से प्रस्तुत अधिवक्ता ने दलील दी कि याची के खिलाफ नाबालिग से विवाह करने का आपराधिक मामला लंबित है। इसलिए दीक्षा को विधिक प्रक्रिया के तहत बालिका गृह में रखा गया है।




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