रिटायर कर्मचारी की पेंशन से मनमानी कटौती नहीं, 11 लाख वसूली का आदेश हाई कोर्ट से रद्द
याची ने हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी थी। कोर्ट ने 15 दिसंबर 2023 के निर्णय द्वारा बागपत के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के 20 मई.2023 के आदेश तथा ब्लॉक विकास अधिकारी, बड़ौत के 24 मई 2023 के आदेश को रद्द कर दिया था। इसके साथ ही निर्देश दिया था कि याची को विधि अनुसार सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बागपत के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य से लगभग 11 लाख रुपये की वसूली के आदेशों को निरस्त करते हुए कहा है कि सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन से कटौती केवल सिविल सर्विस रेगुलेशन के अनुच्छेद 351-ए के तहत विधिसम्मत अनुमति और विधिवत विभागीय कार्यवाही के बाद ही की जा सकती है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने सुरेंद्र दत्त कौशिक की याचिका पर पारित किया। याची सुरेन्द्र दत्त कौशिक, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य, सर्वोदय मंदिर इंटर कॉलेज (बागपत) पर मिड-डे मील/पीएम पोषण योजना के तहत लगभग 11,14,160 रुपये के कथित गबन का आरोप लगाया गया था।
याची ने हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी थी। कोर्ट ने 15 दिसंबर 2023 के निर्णय द्वारा जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी बागपत के 20 मई.2023 के आदेश तथा ब्लॉक विकास अधिकारी, बड़ौत के 24 मई 2023 के आदेश को रद्द कर दिया था। इसके साथ ही निर्देश दिया था कि याची को विधि अनुसार सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएं। कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि कानूनन संभव हो तो वसूली की जा सकती है। पहले निर्णय के बाद बीएसए ने शासन को पत्र भेजकर अनुच्छेद 351 ए के तहत अनुमति मांगी। बाद में 07 नवंबर 2025 को शासन की ओर से विशेष सचिव द्वारा पत्र जारी कर कहा गया कि उक्त राशि की वसूली अनुच्छेद 351-ए के तहत की जाए। इसके आधार पर याची से वसूली का आदेश जारी कर दिया गया।
इन तीनों आदेशों को याची ने हाई कोर्ट में दायर की गई वर्तमान रिट याचिका में चुनौती दी। कोर्ट ने कहा कि पहली जांच केवल फैक्ट-फाइंडिंग थी। पूर्व निर्णय में स्पष्ट कहा जा चुका था कि जो जांच की गई थी वह विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं थी, बल्कि मात्र तथ्य-संग्रह थी। कोर्ट ने कहा अनुच्छेद 351 ए के तहत सेवानिवृत्ति के बाद विभागीय कार्यवाही शुरू करने के लिए राज्यपाल की विधिवत स्वीकृति अनिवार्य है। कोर्ट ने पाया कि ,7 नवम्बर 2025 का पत्र राज्यपाल की विधिवत स्वीकृति प्रदर्शित नहीं करता। यदि इसे अनुमति मान भी लिया जाए, तब भी आरोपपत्र जारी कर पूर्ण अनुशासनात्मक कार्यवाही करना आवश्यक था। बिना नई विभागीय जांच के केवल पूर्व फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट के आधार पर वसूली का आदेश देना विधि विरुद्ध है। हाईकोर्ट तीनों आदेशों को निरस्त कर दिया।
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोप गंभीर हैं (लगभग 11 लाख रुपये के गबन का मामला), इसलिए संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार, राज्यपाल की वैध अनुमति लेकर और विधिवत विभागीय कार्यवाही प्रारंभ कर आगे कार्रवाई कर सकते हैं।




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