पहली मोहर्रम आज, अजादारों की आंखों से छलके आंसू
Mirzapur News - मिर्जापुर में मोहर्रम का चांद मंगलवार को दिखाया गया, जिसके अनुसार पहली मोहर्रम बुधवार को है। शिया समुदाय ने अपने घरों और इमामबाड़ों में अजाखाने सजाने शुरू कर दिए हैं। महिलाएं काले कपड़े पहनकर शोक का इजहार कर रही हैं। 10 मोहर्रम को ताजिए इमामबाड़ा में दफन किए जाएंगे।

मिर्जापुर। मोहर्रम का चांद मंगलवार को दिखाया। चांद के मुताबिक पहली मोहर्रम बुधवार को होगा। चांद दिखाई देते ही गम और अजादारी का दौर भी शुरू हो गया। इसी के साथ शिया समुदाय के लोगों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और कर्बला के शहीदों की याद में अपने घरों और इमामबाड़ों में अजाखाने सजाने शुरू कर दिए हैं।
गम और अजादारी का दौर
समुदाय की महिलाओं ने गहने, चूड़ियां और श्रृंगार उतारकर काले कपड़े पहन लिए। जबकि पुरुषों ने भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और शहीदान-ए-कर्बला की याद में शोक का इजहार किया। पहली मोहर्रम से मजलिस, मातम और जुलूसों का सिलसिला शुरू हो जाएगा। जो दो महीने आठ दिन तक जारी रहेगा।
सफाई और तैयारी
वहीं सुन्नी समुदाय की ओर से तरकापुर, फतेह खां का बाड़ा, छोटा मीरजापुर, मकरी खोह, बल्ली का अड्डा, रमईपट्टी, रामबाग और कुरैश नगर स्थित इमाम चौकों और इमामबाड़ा स्थित कर्बला की साफ-सफाई पूरी कर ली है। नजर-ओ-नियाज और फातिहा का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। नौ मोहर्रम को विभिन्न इमाम चौकों पर ताजिए रखे जाएंगे। दस मोहर्रम को दोपहर दो बजे के बाद उन्हें इमामबाड़ा स्थित कर्बला में दफन किया जाएगा।
इमाम हुसैन का कर्बला पहुंचना
शाहिद वारसी ने बताया कि रिवायतों के मुताबिक, 61 हिजरी में जब इमाम हुसैन इब्न अली अलैहिस्सलाम का काफिला कर्बला पहुंचा, तो उन्होंने उस सरजमीन का नाम पूछा। लोगों ने बताया कि इस जगह का नाम कर्बला है। यह सुनकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि यही वह जगह है, जहां हमारे खेमे लगेंगे और यही वह सरजमीन है, जहां हमारा खून बहाया जाएगा।
युद्ध के दौरान संघर्ष
इसी मोहर्रम के महीने में हजरत कासिम की जवानी कुर्बान हुई, औन और मोहम्मद शहीद हुए। एक-एक करके इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का घर उजड़ता गया, लेकिन सब्र का दामन हाथ से न छूटा। कर्बला की जमीन पर पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे ईमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का लहू बहाया गया। इसी मोहर्रम के महीने में यजीदी फौज के बढ़ते जुल्म के बीच तीन दिन से प्यासे बच्चों की सिसकियां खेमों से उठ रही थीं। कभी ईमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के 6 माह के मासूम बच्चे मौला अली असगर अपनी सूखी जुबान से तड़पते थे, तो कभी ईमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की चार साल की मासूम बच्ची बीबी सकीना पानी-पानी पुकारती थीं। फरात का दरिया सामने था, मगर अहल-ए-बैत अलैहिस्सलाम के लिए एक कतरा पानी भी मयस्सर नहीं था।
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