अखिलेश यादव के निशाने पर मायावती की बसपा, नई रणनीति के साथ पीडीए को मजूबत करने में जुटी सपा
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 2027 के चुनाव के लिए बसपा के पुराने दिग्गजों को साथ लेकर 'पीडीए' फॉर्मूले को मजबूत करना शुरू कर दिया है। लालजी वर्मा, रामअचल राजभर और नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं के जरिए सपा दलित-पिछड़ा वोट बैंक में सेंध लगा रही है।

UP News: समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव अब 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर एक ऐसी आक्रामक रणनीति पर काम कर रहे हैं, जिसका सीधा असर बसपा के वजूद पर पड़ सकता है। सपा का मानना है कि सत्ता की वापसी का रास्ता बसपा के उस पुराने और अनुभवी कैडर से होकर गुजरता है, जो वर्तमान में खुद को नेतृत्व विहीन या उपेक्षित महसूस कर रहा है। पिछले ही हफ्ते बसपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एमएच खान भी सपा में शामिल हुए हैं।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, अखिलेश यादव ने बीआर अंबेडकर और कांशीराम की वैचारिक विरासत को 'पीडीए' की छतरी के नीचे लाने का फैसला किया है। इसके लिए उन चेहरों को प्रमुखता दी जा रही है जिन्होंने कभी कांशीराम के साथ मिलकर गांव-गांव में बसपा का आधार तैयार किया था।
सपा की इस रणनीति में मायावती के करीबी रहे चेहरे सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं।लालजी वर्मा और रामअचल राजभर पिछड़ों और अति-पिछड़ों के बीच गहरी पैठ रखने वाले नेता माने जाते हैं। अब दोनों नेता सपा के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं। नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी कभी मायावती के करीबी थे। अल्पसंख्यक राजनीति का बड़ा चेहरा हैं और अब सपा के पाले में हैं। इसके अलावा इंद्रजीत सरोज, त्रिभुवन दत्त और दद्दू प्रसाद दलित समाज और बसपा के पुराने कैडर पर मजबूत पकड़ रखने वाले ये नेता 'पीडीए' को वैचारिक मजबूती दे रहे हैं।
लोकसभा चुनाव ने बढ़ाया हौसला
सपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, बसपा वर्तमान में अपने पारंपरिक वोट बैंक तक उस प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पा रही है जैसा वह 10-15 साल पहले करती थी। 2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों ने सपा का उत्साह बढ़ाया है। जहां दलित और अल्पसंख्यक वोटों का बड़ा हिस्सा सपा की ओर शिफ्ट होता दिखा। अखिलेश यादव इसी 'शिफ्ट' को 2027 के लिए स्थायी बनाना चाहते हैं।
रणनीति यह है कि उन बसपा नेताओं और पूर्व प्रत्याशियों को जोड़ा जाए जिनकी विचारधारा भाजपा से मेल नहीं खाती। यह एक तरह से बसपा के 'इंजन' को निकालकर सपा की 'साइकिल' में फिट करने जैसी कोशिश है।
इतिहास से सबक: गठबंधन नहीं, विलय पर जोर
1993 में सपा-बसपा गठबंधन ने इतिहास रचा था। इसके बाद दोनों पाटियों में दूरी बन गई। 2019 के गठबंधन हुआ लेकिन इसकी विफलता के बाद अखिलेश यादव ने रणनीति बदल दी है। अब वे दूसरे दल से गठबंधन करने के बजाय, उस दल के मजबूत सामाजिक आधार और नेताओं को सीधे अपनी पार्टी में शामिल करने पर जोर दे रहे हैं।
वहीं, इस सियासी उठापटक पर भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अवनीश त्यागी का कहना है कि अखिलेश यादव चाहे जितने जतन कर लें, यूपी की जनता का विश्वास योगी आदित्यनाथ और पीएम मोदी पर कायम है। 2027 में भी जनता विकास के नाम पर भाजपा को ही चुनेगी।




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