सहमति से लंबे समय तक बनाया गया संबंध रेप नहीं, हाई कोर्ट ने इस कार्यवाही को किया रद्द
अदालत ने कहा कि यदि FIR और बयान को सही भी माना जाए, तो भी उपलब्ध सामग्री से यह मामला ‘सहमति से संबंध’ का प्रतीत होता है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि लंबे समय तक चले संबंधों को केवल बाद में दुष्कर्म नहीं माना जा सकता, यदि स्पष्ट रूप से जबरदस्ती या भय सिद्ध न हो।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि लंबे समय तक सहमति से चले संबंध को दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता है। कोर्ट ने दुष्कर्म, धमकी और आईटी एक्ट से जुड़े मामले में दाखिल चार्जशीट और समस्त आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने नीरज कुमार की याचिका पर दिया है।
मामला बरेली के इज्जतनगर थाने का है। आरोपी नीरज कुमार और एक अन्य के विरुद्ध धारा 376(2)(एन), 323, 506 आईपीसी तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। एफआईआर में पीड़िता ने आरोप लगाया था कि पीसीएस परीक्षा की तैयारी के दौरान उसकी पहचान आरोपी की बहन के माध्यम से नीरज कुमार से हुई। आरोप था कि 7 अगस्त 2022 को होटल में जन्मदिन के बहाने बुलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया गया और अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया गया। बाद में कई बार होटल में बुलाकर दुष्कर्म करने तथा वीडियो वायरल करने की धमकी देने का आरोप लगाया गया। यह भी आरोप था कि आरोपी ने वीडियो अपने रिश्तेदार को भेजे, उसने भी ब्लैकमेल किया।
कोर्ट ने मामले के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए कहा कि पीड़िता एक शिक्षित, विवाहित महिला है और कथित घटनाएं 2022 से 2023 के बीच कई बार होटल में हुईं, लेकिन एफआईआर दिसंबर 2024 में दर्ज कराई गई। पीड़िता ने स्वयं कहा कि उसने कथित वीडियो कभी देखा ही नहीं, फिर भी लंबे समय तक आरोपी से मिलती रही। होटल में ठहरने के रिकॉर्ड उपलब्ध थे, लेकिन सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं थी। पति ने वीडियो मिलने की बात कही, पर उसे डिलीट कर दिया। पिता ने किसी वीडियो के मिलने से इनकार किया। व्हाट्सएप चैट से दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध का संकेत मिलता है।
अदालत ने कहा कि यदि एफआईआर और बयान को प्रथम दृष्टया सही भी माना जाए, तो भी उपलब्ध सामग्री से यह मामला ‘सहमति से संबंध’ का प्रतीत होता है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि लंबे समय तक चले संबंधों को केवल बाद में दुष्कर्म नहीं माना जा सकता, यदि स्पष्ट रूप से जबरदस्ती या भय सिद्ध न हो।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें कहा गया है कि यदि वयस्क और शिक्षित पक्षों के बीच लंबे समय तक संबंध रहे हों और शिकायत में अत्यधिक विलंब हो, तो ऐसे मामलों में सहमति की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने पाया कि आरोपों के समर्थन में पर्याप्त ठोस साक्ष्य नहीं हैं और मुकदमे की सुनवाई जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। कोर्ट ने चार्ज शीट और मुकदमे की कार्यवाही रद्द कर दी है।




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