सीएम के स्तर पर प्रयास, हमारे स्तर पर प्रार्थना; अविमुक्तेश्वरानंद को मनाने की पहल पर बोले केशव
एक तरफ जहां प्रशासन और शंकराचार्य के बीच इस तरह का गतिरोध है वहीं डिप्टी सीएम केशव मौर्य अपने स्तर पर शंकराचार्य को मनाने की कोशिशों में भी जुटे हैं। वह दो बार शंकराचार्य से अपील कर चुके हैं। रविवार को चर्चा थी कि वह माघ मेला में पहुंचकर अपने शिविर के बाहर बैठे शंकराचार्य से मुलाकात कर सकते हैं।

मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान को जा रहे ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पालकी रोके जाने से नाराज हैं। उस दिन से अभी तक उन्होंने शिविर में प्रवेश नहीं किया है। प्रशासन और शंकराचार्य के बीच में गतिरोध बना हुआ है। इस बीच डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा है कि इस मामले में सीएम के स्तर पर प्रयास और मेरे स्तर पर प्रार्थना की जा रही है। डिप्टी सीएम ने रविवार को एक बार फिर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से प्रार्थना की कि वह संगम स्नान करके अपने विरोध को समाप्त करें। केशव मौर्य इसके पहले भी ऐसी अपील कर चुके हैं।
रविवार को बड़ी चर्चा थी कि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य माघ मेला में पहुंचकर अपने शिविर के बाहर बैठे शंकराचार्य से मुलाकात कर सकते हैं। डिप्टी सीएम शाम को प्रयागराज पहुंचे भी लेकिन शंकराचार्य से मिलने नहीं गए। उन्होंने सर्किट हाउस पर कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की और पिछले दिनों प्रयागराज में एक तालाब में गिरे विमान के पायलटों को बचाने वाले तीन लोगों को सम्मानित किया। इसके बाद मीडिया से बातचीत में डिप्टी सीएम ने कहा कि शंकराचार्य जी से मुलाकात का अभी कोई कार्यक्रम नहीं है। मैंने प्रार्थना की है शंकराचार्य जी से कि वे अपना जो विरोध है उसे समाप्त करके पवित्र संगम में स्नान करके एक अनुकूल संदेश देने की कृपा करें। मेरी हाथ जोड़कर विनती है, प्रार्थना है। एक और प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि जो भी होगा, उसकी जांच करके समाधान निकाला जाएगा। मेरी प्रार्थना पुन: है कि यदि वह विरोध को समाप्त करके वह संगम स्नान कर लेंगे तो एक बहुत अच्छा संदेश जाएगा। डिप्टी सीएम ने कहा कि वह एक बड़े संत हैं उनके द्वारा कोई बात कही गई तो मैं उस पर कोई टिप्पणी करूं यह मर्यादा के अनुरूप नहीं है। एक अन्य प्रश्न पर उन्होंने कहा कि माननीय मुख्यमंत्री जी के स्तर से इस पर जो भी प्रयास किया जा रहा है वो किया जा रहा है, मेरे द्वारा प्रार्थना की जा रही है।
इसके पहले लखनऊ में भी मीडिया से बातचीत के दौरान केशव मौर्य ने कहा था कि मुझसे जब कहा जाएगा तो मैं उनसे बात जरूर करूंगा लेकिन मैं प्रार्थना तो कर ही सकता हूं। चरणों में शीश झुका सकता हूं। निवेदन कर सकता हूं। वह निवेदन किया हूं। आगे भी मैं निवेदन यही करता हूं।मैं यही निवेदन करता हूं कि जो भी विरोध है उसको समाप्त करके, संगम में स्नान करके और जो एक संदेश अनुकूल जाना चाहिए वो देने की कृपा करें, ऐसी मैं प्रार्थना करता हूं।अ
उधर, माघ मेले में शंकराचार्य रविवार को भी अपने शिविर के बाहर ही रहे। उनकी मांग है कि प्रशासन मौनी अमावस्या के दिन की गई कार्रवाई के लिए उनसे माफी मांगे और ससम्मान स्नान कराए। जबकि मेला प्रशासन उन्हें दो बार नोटिस देकर यह पूछ चुका है कि वह खुद को शंकराचार्य कैसे कहते हैं? मेला प्रशासन उन्हें माघ मेला से हमेशा के लिए प्रतिबंधित करने की चेतावनी भी दी दे चुका है। रविवार को शंकराचार्य ने पत्रकारों और आम लोगों के कई सवालों के जवाब दिए। इस दौरान किसी ने शंकराचार्य की परिभाषा पूछी तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने जवाब दिया कि एक समय में अपने देश में 772 मत हो गए थे, मनमानापन बढ़ गया था जिसको जो मन करता था वही करता था, धर्म नाम की चीज नहीं रह गई थी।
ऐसे समय में आदि शंकराचार्य का अवतार हुआ। वह आठ वर्ष में ही चारों वेदों के ज्ञाता हो गए थे। 12 वर्षों में तो उनके समान कोई विद्धान भारत में था ही नहीं। इसके बाद उन्होंने पूरे भारत में अलग-अलग जगहों पर जाकर सब मत वालों को ललकारा कि आपका मत गलत है। शास्तार्थ हुआ, 772 मतों को उन्होंने पराजित कर दिया और सत्य सनातन धर्म की देश में स्थापना कर दी। उन्होंने चार शंकराचार्य पीठ देश के चार दिशा में बनाया। अपने चार शिष्यों को बिठाया और अपने अनुयायियों से कहा कि इन पीठों पर जो योग्य आचार्य बैठेंगे आप ये समझना कि हम ही हैं।
एक अन्य प्रश्न के जवाब में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि शंकराचार्यों की कद्र समाज में आज भी इसीलिए है कि वे नियम कायदे से चलते हैं। वे जो भी कार्य करते या बोलते हैं सब शास्त्र अनुसार करते और बोलते हैं, मनमाना नहीं करते। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य सर्वोच्च इसीलिए माने जाते हैं कि एक तो ढाई हजार साल से इनकी परंपरा चल रही है। दूसरे वे शास्त्र से कभी नहीं हटते। भले उनके पास छोटा मठ हो, उनके पास भले छोटी कार हो, लेकिन फिर कद्र शंकराचार्य की ज्यादा है। शास्त्र से बंधे होने के कारण जनता समझती है कि ये जो कहेंगे वो एकदम सच कहेंगे।




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