वीआईपी कल्चर त्याग, ई-रिक्शा और वर्चुअल बैठकों के ''''गियर'''' में जनप्रतिनिधि और प्रशासन
Kannauj News - फोटो 26 पीएम मोदी की बीते माह हरदोई में हुई रैली में कुछ इस तरह बस में बैठकर लोगों के साथ गए थे मंत्री असीम अरुण फोटो 27 मंत्री असीम असीम अरुणफोटो 8

छिबरामऊ/कन्नौज। राजनीति में अक्सर सत्ता का मतलब ''काफिला और धमक'' समझा जाता है, लेकिन बदलती वैश्विक परिस्थितियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊर्जा संरक्षण के आह्वान ने इस धारणा को उलट दिया है। पश्चिम एशिया के संकट और ईंधन की बढ़ती कीमतों के बीच देश को आर्थिक मजबूती देने के लिए कन्नौज जिले के जनप्रतिनिधियों ने सादगी की एक नई मिसाल पेश की है। विधायक अर्चना पांडेय और राज्यमंत्री कैलाश राजपूत ने अपने तामझाम को त्याग कर यह संदेश दिया है कि ''बचत'' ही सबसे बड़ा राष्ट्रवाद है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और कोविड काल की तरह ''वर्चुअल वर्किंग'' अपनाने की भावुक अपील की थी। इसके तुरंत बाद, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में मंत्रियों और अधिकारियों के काफिले में 50 प्रतिशत की कटौती के आदेश जारी कर दिए। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक धन की बर्बादी और ईंधन की फिजूलखर्ची पर अब कड़ा अंकुश लगेगा। नेताओं द्वारा ई-रिक्शा की सवारी करना केवल एक सांकेतिक कदम नहीं, बल्कि एक आर्थिक युद्ध का हिस्सा है। जब नेतृत्व सादगी अपनाता है, तो प्रशासन और जनता स्वतः ही उस मार्ग पर चल पड़ते हैं। छिबरामऊ से उठी यह लहर यदि पूरे प्रदेश में फैलती है, तो यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए ''संजीवनी'' साबित होगी।
लोकल में ई-रिक्शा, दूर के लिए रोडवेज: अर्चना पांडेय
पूर्व राज्यमंत्री और भाजपा विधायक अर्चना पांडेय ने इस मुहिम को जमीन पर उतार दिया है। उन्होंने अपने काफिले की सभी अतिरिक्त गाड़ियां हटा दी हैं। विधायक ने घोषणा की है कि वह शहर के भीतर (लोकल) किसी भी कार्यक्रम में जाने के लिए ई-रिक्शा का उपयोग करेंगी। लंबी दूरी के लिए वह अपनी निजी एक गाड़ी या यथासंभव रोडवेज बस का सहारा लेंगी। उन्होंने कार्यकर्ताओं से भी कहा है कि वे वाहनों के साथ भागदौड़ करने के बजाय मोबाइल और डिजिटल माध्यमों से जनता से संपर्क बढ़ाएं।
स्वागत में भी सादगी, राज्यमंत्री कैलाश राजपूत का संकल्प
15 मई को राज्यमंत्री बनने के बाद पहली बार छिबरामऊ आ रहे कैलाश राजपूत ने अपने स्वागत समारोह को ''ईंधन बचत अभियान'' में बदल दिया है। उन्होंने समर्थकों को सख्त निर्देश दिए हैं कि उनके काफिले में सिर्फ एक चारपहिया वाहन होगा। उन्होंने साफ किया कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के सादगी के मंत्र को ही अपना मार्गदर्शन मानेंगे और डीजल-पेट्रोल की खपत को न्यूनतम स्तर पर लाएंगे।
मंत्री असीम अरुण, सादगी के पुराने सिपाही
सदर विधायक और राज्यमंत्री असीम अरुण की पहचान हमेशा से एक ''डाउन टू अर्थ'' नेता की रही है। वह मंत्री पद की शपथ लेने के बाद से ही केवल एक गाड़ी से चलते आए हैं। न कोई सुरक्षा का भारी तामझाम, न ही लग्जरी गाड़ियों की कतार। उनके इस व्यवहार ने अब जिले के अन्य जनप्रतिनिधियों के लिए एक मानक स्थापित कर दिया है। यहां तक कि बीते माह 29 अप्रैल को पीएम मोदी की हरदोई में हुई रैली में भी मंत्री असीम अरुण अपनी गाड़ी को छोड़कर आम लोगों के साथ परिवहन निगम की बस से कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे। उन्होने भी पार्टी कार्यकर्ताओं अपने समर्थकों और लोगों से अपील की है कि देश हित में जितना सहयोग हो सकता है करें और पीएम की अपील को सार्थक करने में अपना योगदान करें।
प्रशासनिक मोर्चे पर ''वर्चुअल'' प्रहार
पीएम की अपील के बाद जिल प्रशासन ने भी अपनी कार्यशैली बदलनी शुरू कर दी है।
एसपी विनोद कुमार ने साफ किया है कि अब रूटीन बैठकें वर्चुअल होंगी। अधिकारियों को बेवजह मुख्यालय आने-जाने के लिए सरकारी तेल फूंकने की जरूरत नहीं है।
यद्यपि घटनाओं के समय वाहन जरूरी हैं, लेकिन अपराध नियंत्रण के लिए अब ''फुट पेट्रोलिंग'' यानी पैदल गश्त पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, जिससे ईंधन भी बचेगा और जनता के बीच पुलिस की पहुंच भी बढ़ेगी।
काफिले का ''कट साइज'' - समर्थकों को भी सीख
नेताओं के काफिले में नेताजी की गाड़ी से ज्यादा उनके समर्थकों की गाड़ियां होती हैं। अक्सर एक विधायक के पीछे गाड़ियों का रेला चलता है, जिससे हजारों लीटर डीजल रोजाना धुआं बनकर उड़ता है। असीम अरुण, अर्चना पांडेय और कैलाश राजपूत की पहल के बाद अब समर्थकों के बीच भी यह संदेश गया है कि यदि ''बड़ा नेता'' ई-रिक्शा पर चल सकता है, तो कार्यकर्ता को भी लग्जरी गाड़ियों का मोह छोड़ना होगा।
वर्चुअल बैठकों से समय और संसाधन की बचत
मंडल और जिला स्तर पर होने वाली बैठकों के लिए अधिकारियों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। एक जिले से दूसरे जिले या राजधानी जाने में हजारों रुपये का ईंधन खर्च होता है। यदि ये बैठकें 2020-21 के कोरोना काल की तरह ज़ूम या गूगल मीट पर हों, तो साल भर में जिले स्तर पर करोड़ों रुपये बचाए जा सकते हैं।
ई-व्हीकल और सार्वजनिक परिवहन का ''शिफ्ट''
सरकारी मशीनरी में अब ई-व्हीकल्स को प्राथमिकता देने की तैयारी है। प्रशासन का मानना है कि यदि रोडवेज बसों की फ्रीक्वेंसी बढ़ाई जाए और सरकारी दौरों में ट्रेन या बस का उपयोग हो, तो ''वीआईपी कल्चर'' की समाप्ति के साथ-साथ पर्यावरण को भी लाभ होगा। ''नो व्हीकल डे'' जैसे अभियान इसे और मजबूती देंगे।
सरकारी तेल का हिसाब - अनुमानित रिपोर्ट
प्रदेश के बजट 2025-26 के आंकड़ों और सरकारी खर्चों के पैटर्न को देखें तो एक जिले में प्रशासनिक और पुलिस बेड़े के वाहनों पर मासिक औसतन 20 लाख से 50 लाख रुपये का पेट्रोल-डीजल खर्च होता है। यदि 50 फीसद कटौती का पालन पूरी ईमानदारी से हो, तो केवल कन्नौज जिले में ही सालाना 3 से 5 करोड़ रुपये की बचत की जा सकती है।
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