लखनऊ में आग लगी तो दिल्ली से भयावह हो सकते हैं हालात, राजधानी में हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म तक नहीं
देश की राजधानी दिल्ली की तरह अगर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गलियों में बने होटलों या ऊंची इमारतों में आग लगी तो भगवान ही मालिक है। यहां भी बिना एनओसी ही 80 प्रतिशत होटल चल रहे हैं। राजधानी में हाइट्रोलिक प्लेटफार्म तक नहीं है।

UP News: दिल्ली के होटल में आग लगने से 21 लोगों की मौत ने हर किसी को दहला दिया है। इतनी मौतों के पीछे लापरवाही बड़ी वजह सामने आ रही है। सबसे ज्यादा उंगलियां सिस्टम की ओर उठ रही हैं। कोई ऐसा शहर नहीं है जहां दिल्ली जैसी लापरवाही नहीं दिख रही हो। राजधानी लखनऊ में भी ऐसे ही हालात दिखाई देते हैं। शहर में ही तीन हजार से अधिक होटल एंव रेस्टोरेंट संचालित हैं। 80 फीसदी में अग्निशमन सुरक्षा व्यवस्थाएं मानक के अनुरूप नहीं हैं। सैकड़ों बिना एनओसी के चल रहे है। 500 के करीब ऐसे होटल हैं जो मौत को दावत दे रहे। यही नहीं, ऊंची इमारतों में आग लगी तो भगवान ही मालिक है। राजधानी होने के बाद भी यहां फायर ब्रिगेड के पास हाईड्रोलिक प्लेटफार्म तक नहीं हैं।
सबसे ज्यादा खतरनाक होटलों की मंडी चारबाग में है। 150-200 स्क्वायर फीट में चार से पांच मंजिला होटल तने हैं। जीने डेढ़ से दो फीट के हैं। प्रवेश और निकास का एक ही द्वार है। हादसा हुआ तो न भागने के साधन हैं न आग बुझाने के। फायर एस्टिंगुशर भी दिखावे के लिए लगे हैं। आलम यह है कि हादसा होने पर अगर दमकल गई तो वह भी मौके पर नहीं पहुंच सकेगी।
चारबाग में होटल विश्वनाथ, मोहन, बालाजी समेत कई अन्य में तो अग्निकांड की घटनाएं भी हो चुकी हैं। विश्वानाथ और मोहन होटल में बार भी चल रहा है इसके बाद भी यहां अग्निसुरक्षा व्यवस्थाएं मानक के अनुरूप नहीं हैं। चारबाग रेवड़ी मंडी और गुरुनानक मार्केट में अवैध होटलों की भरमार है। कमरों में 4 गुणा 5 का बेड पड़ा है। एक कुर्सी तक रखने की जगह नहीं है। कमरों और होटल में न ही वेंटिलेशन के लिए खिड़की है और न अग्नि सुरक्षा की दृष्टि से कोई उपकरण। 500-600 में डबल बेड उपलब्ध है।
गुरुनानक मार्केट स्थित होटल प्रीत कॉन्टिनेंटल में भी प्रवेश और निकास का एक ही रास्ता है। हजरतगंज हनुमान मंदिर के ठीक सामने मोती महल रेस्टोरेंट का भी हाल यही है। यहां शाम से एक ओर भट्ठी और दूसरी ओर चाट के स्टाल पर चूल्हा जलता है। बेसमेंट और पहले और दूसरे तल पर खानपान की व्यवस्था। दोनों जगह जाने के लिए संकरा जीना है। एक ही प्रवेश और निकास द्वार है।
ऊंची इमारतों में आग बुझाने का इंतजाम नहीं
उत्तर प्रदेश के 32 बड़े शहरों में तेजी से बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो रही हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन इमारतों में ऊपरी मंजिलों पर आग लगने की स्थिति में राहत और बचाव के लिए अग्निशमन विभाग के पास एक भी आधुनिक हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म उपलब्ध नहीं है। वर्षों की अनदेखी के बाद अब विकास प्राधिकरणों की नींद खुली है। प्रदेशभर में हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म खरीदने की तैयारी शुरू की गई है, जिस पर 502 करोड़ खर्च होंगे।
शहरों में 15 से 40 मंजिल तक की इमारतों को मंजूरी दी जा रही है, लेकिन आग लगने पर ऊंचाई तक पहुंचने वाले उपकरणों की व्यवस्था नहीं की गई। अग्निशमन विभाग ने सभी विकास प्राधिकरणों से बजट उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
योजना के तहत गाजियाबाद में 102 मीटर ऊंचाई वाले दो हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म खरीदे जाएंगे। इनकी खरीद पर करीब 100 करोड़ रुपये खर्च होंगे। वहीं लखनऊ के लिए 90 मीटर ऊंचाई के दो प्लेटफॉर्म प्रस्तावित हैं, जिनकी लागत 68 करोड़ रुपये होगी। वाराणसी में भी 90 मीटर ऊंचाई का एक प्लेटफॉर्म खरीदा जाएगा, जिस पर 34 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
टेंडर जारी किया लेकिन पैसा अभी भी नहीं
अग्निशमन विभाग ने प्लेटफॉर्म खरीदने के लिए टेंडर जारी कर दिया है, लेकिन अभी तक बजट की व्यवस्था नहीं हो सकी है। विभाग ने सभी विकास प्राधिकरणों को पत्र भेजकर अपने हिस्से की धनराशि तत्काल उपलब्ध कराने को कहा है।
30 फायर स्टेशन की जरूरत मौजूद सिर्फ आठ
लखनऊ। आबादी और भारतीय भवन निर्माण संहिता (एनबीसी) 2016 के अनुसार शहर में 30 फायर स्टेशन होने चाहिए, जबकि वर्तमान समय में हैं सिर्फ आठ। इतना ही नहीं मानक के अनुरूप स्टाफ भी नहीं है। कम संसाधनों में दमकल विभाग के जवान हर आग की लपटों से जूझकर लोगों की सुरक्षा कर रहे हैं। एनबीसी के मानक के तहत दो लाख की जनसंख्या अथवा पांच से सात किमी की परिधि में एक फायर स्टेशन होना चाहिए। शहर की आबादी करीब 60 लाख है। फायर स्टेशन हजरतगंज, चौक, गोमतीनगर, पीजीआई सरोजनीनगर, आलमबाग और बीकेटी इलाके में हैं। राजभवन और हाईकोर्ट में रिजर्व फायर स्टेशन हैं। अमीनाबाद, गोसाईंगंज व महिलाबाद में फायर सीजन में एक दमकल रहती है।




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