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एक हजार रुपये पेंशन में सम्मानजनक जीवन मुमकिन नहीं, यूपी सरकार के रवैये पर हाईकोर्ट नाराज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफतौर पर कहा कि वर्तमान दौर में एसिड अटैक पीड़िता को मात्र एक हजार रुपये प्रतिमाह की पेंशन देना उसके साथ मज़ाक है, क्योंकि इससे सम्मानजनक जीवन जीना मुमकिन नहीं है।

Fri, 29 May 2026 08:18 PMDinesh Rathour ​प्रयागराज, विधि संवाददाता
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एक हजार रुपये पेंशन में सम्मानजनक जीवन मुमकिन नहीं, यूपी सरकार के रवैये पर हाईकोर्ट नाराज

Prayagraj News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में एसिड अटैक के पीड़ितों के मुआवजे और उनके स्थायी पुनर्वास को लेकर राज्य सरकार के ढुलमुल रवैये पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने साफतौर पर कहा कि वर्तमान दौर में एसिड अटैक पीड़िता को मात्र एक हजार रुपये प्रतिमाह की पेंशन देना उसके साथ मज़ाक है, क्योंकि इससे सम्मानजनक जीवन जीना मुमकिन नहीं है। यह टिप्पणी ​न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने फ़रहा की याचिका पर सुनवाई करते हुए की।

​सुप्रीम कोर्ट के आदेश के 10 साल बाद भी नीति नहीं

​हाईकोर्ट ने इस बात पर आश्चर्य और दुख व्यक्त किया कि परिवर्तन केंद्र बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और लक्ष्मी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने अब तक एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कोई ठोस और ढांचागत नीति तैयार नहीं की है। कोर्ट ने कहा कि 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने 10 लाख रुपये मुआवजे को भी कम माना था। आज 2026 में, जब महंगाई और जीवन यापन की लागत इतनी बढ़ चुकी है, तब भी सरकार पुरानी व्यवस्था पर टिकी है। सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ एक बार मामूली मुआवजा देकर खत्म नहीं हो जाती।

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​अफसरों को कोर्ट में होना पड़ा हाजिर

​पिछली सुनवाई में कोर्ट की सख्ती के बाद प्रदेश शासन के अपर मुख्य सचिव गृह और अपर मुख्य सचिव महिला एवं बाल विकास व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। हालांकि उनके हलफनामों से असंतुष्ट कोर्ट ने कहा कि इन हलफनामों में सिर्फ कागजी बैठकों और बातचीत का जिक्र है लेकिन धरातल पर पीड़ितों के रोजगार, मुफ्त इलाज और सामाजिक सुरक्षा को लेकर कोई ठोस खाका नहीं है।

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​कोर्ट ने गिनाया पीड़ितों का आजीवन दर्द

​हाईकोर्ट ने याची फ़रहा का उदाहरण देते हुए कहा कि घटना के 15 साल बीत जाने के बाद भी उसके आर्थिक पुनर्वास के लिए कुछ नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों ने कभी तेजाब के घाव और सर्जरी का कभी न खत्म होने वाला दर्द, शिक्षा व रोजगार और शादी की संभावनाओं का पूरी तरह खत्म होना, समाज का नजरिया और इलाज के लिए ऊंचे ब्याज पर लिया गया कर्ज पर विचार नहीं किया। अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने कोर्ट से एक महीने का समय मांगा और आश्वासन दिया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की भावना के अनुरूप ठोस नीति तैयार करेगी।

​अदालत ने सरकार की मांग को स्वीकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई 10 जुलाई तय करते हुए आदेश दिया कि सरकार अगली तारीख तक पीड़ितों के मुफ्त इलाज, प्लास्टिक सर्जरी, शिक्षा, नौकरी और सम्मानजनक मासिक वित्तीय सहायता की ठोस नीति पेश करे। अगली सुनवाई तक नीति को सक्षम प्राधिकारी द्वारा मंजूरी नहीं मिलती है, तो दोनों अपर मुख्य सचिवों को दोबारा कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से हाजिर होना होगा।

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