यूपी चुनाव के लिए चिराग पासवान तैयार, BJP की टेंशन बढ़ाएगी या SP-BSP का वोट काटेगी LJP?
मोदी सरकार में मंत्री और बिहार की सियासत में धमाका कर चुके चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) अब उत्तर प्रदेश में अपना विस्तार कर रही है। पार्टी ने सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं। अब नए नारे के साथ लखनऊ में पोस्टर लगाए गए हैं।

बिहार की राजनीति में अपनी धाक जमाने के बाद मोदी के मंत्री चिराग पासवान उत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात पर अपना दांव खेलने के लिए तैयार हैं। राजधानी लखनऊ की सड़कों पर चिराग की पार्टी लोजपा (रामविलास) ने नए नारों के साथ पोस्टर वार भी छेड़ दिया है। यूपी में कुछ महीने बाद ही विधानसभा चुनाव होने हैं। चिराग की इस सक्रियता ने राजनीतिक गलियारों में यह बहस छेड़ दी है कि उनका यूपी प्रेम किसका वोट बैंक बिखेरेगा। माना जा रहा है कि सपा-बसपा के साथ ही भाजपा की टेंशन भी चिराग के एक्टिव होने से बढ़ेगी।
पोस्टर पॉलिटिक्स: "क्यों मांगे नेता उधार, जब अपना नेता है तैयार"
लखनऊ की सड़कों, खासकर मुख्यमंत्री आवास कालीदास मार्ग के बाहर लगे लोजपा के पोस्टरों ने सबको चौंका दिया है। पोस्टरों पर लिखा नारा 'क्यों मांगे नेता उधार, जब अपना नेता है तैयार' से सीधे तौर पर दलित समाज को एक नया विकल्प देने की कोशिश है। यह स्लोगन उन राजनीतिक दलों पर तंज माना जा रहा है जो दलितों के नाम पर राजनीति तो करते हैं, लेकिन नेतृत्व के लिए दूसरों का मुंह ताकते हैं।
लोजपा (रा) के सांसद और चिराग के करीबी अरुण भारती ने हाल ही में संकेत दिए हैं कि उनकी पार्टी आगामी यूपी विधानसभा चुनाव में प्रदेश की सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति बना रही है। पार्टी केवल पूर्वांचल या बिहार से सटे जिलों तक ही सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि पूरे प्रदेश में दलितों, वंचितों और कमजोर वर्गों की आवाज बनने की तैयारी में है। पार्टी अब बूथ स्तर पर संगठन खड़ा करने में जुटी है। अरुण भारती ने साफ कर दिया है कि हमारा लक्ष्य सत्ता की मलाई खाना नहीं, बल्कि समाज के उस अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना है जिसका उत्पीड़न हो रहा है।
किसकी बढ़ेगी टेंशन?
चिराग पासवान का यूपी में सक्रिय होना कई समीकरणों को बिगाड़ सकता है मायावती की बसपा का ग्राफ लगातार गिर रहा है। ऐसे में चिराग के सक्रिय होने से बसपा के 'कैडर वोट' में सेंध लग सकता है। अगर जाटव और गैर-जाटव दलितों को चिराग में भविष्य दिखा तो मायावती के लिए अपनी जमीन बचाना मुश्किल हो सकता है।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव का भी जोर पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक पर है। अखिलेश 2024 के हिट फार्मूले जरिए ही 2027 फतह करना चाहते हैं। सपा का दावा है कि दलितों के साइकिल पर सवार होने से ही लोकसभा चुनाव में सफलता मिली थी। चिराग की एंट्री दलित वोटों को सपा की ओर जाने से रोक सकती है।
चिराग के एक्टिव होने से सपा-बसपा के साथ ही बीजेपी को भी नुकसान हो सकता है। बीजेपी ने बसपा के 'नॉन जाटव' दलित वोटों को बड़ी संख्या में अपनी ओर खींचा है। चिराग वर्तमान में केंद्र में बीजेपी के सहयोगी हैं, लेकिन अगर वे यूपी में अलग ताकत बनकर उभरते हैं तो बीजेपी के पाले में आया यह नया दलित वोट बैंक छिटक सकता है।
हालांकि यूपी में बीजेपी के पास दलित नेताओं की कमी नहीं है। कमलेश पासवान, मंत्री बेबी रानी मौर्य, असीम अरुण, गुलाब देवी, दिनेश खटीक के अलावा कृष्णा पासवान, सुरेंद्र दिलेर जैसे नेता पहले से हैं। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर, राम शंकर कठेरिया, विनोद सोनकर जैसे नेता हैं।
गठबंधन के सहयोगियों में खलबली
लोजपा की यह रणनीति यूपी में एनडीए के अन्य सहयोगियों सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद के लिए भी चुनौती है। चिराग जिस तरह से पिछड़ों और वंचितों की बात कर रहे हैं, उससे राजभर और निषाद के प्रभाव वाले इलाकों में वोटों का बंटवारा हो सकता है।
यूपी चुनाव लड़ने पर सहनी पर टूटी थी आफत, बिहार लड़कर भी सेफ रहे राजभर
जिस तरह की चुनौती इस बार चिराग पासवान दे रहे हैं, उसी तरह 2022 के यूपी विधानसभा के चुनाव में बिहार की सहयोगी मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी ने दी थी। तब बीजेपी ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए नीतीश सरकार में मंत्री मुकेश सहनी को कैबिनेट से बर्खास्त करवाया था। यही नहीं वीआईपी के सभी तीन विधायकों को तोड़कर भाजपा में शामिल भी कर लिया था।
हालांकि यूपी में बीजेपी के सहयोगी सुभासपा प्रमुख ओपी राजभर 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव लड़े तो उनके साथ ऐसा कुछ नहीं किया गया। राजभर ने बिहार में 64 सीटों पर प्रत्याशी उतारे लेकिन भाजपा ने नजरअंदाज कर दिया था।




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