Child Best Interest Lies with Natural Guardian High Court Hands Over Custody 13-Month-Old Infant to Father बच्चे का सर्वोत्तम हित प्राकृतिक अविभावक के पास, हाईकोर्ट ने पिता को सौंपी 13 माह के मासूम की कस्टडी, Uttar-pradesh Hindi News - Hindustan
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बच्चे का सर्वोत्तम हित प्राकृतिक अविभावक के पास, हाईकोर्ट ने पिता को सौंपी 13 माह के मासूम की कस्टडी

मां की मौत के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 13 महीने के मासूम बच्चे अक्षित पांडेय की कस्टडी उसके पिता विपिन कुमार पांडेय को सौंपने का आदेश दिया है।

Wed, 22 April 2026 08:08 PMDinesh Rathour प्रयागराज, विधि संवाददाता
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बच्चे का सर्वोत्तम हित प्राकृतिक अविभावक के पास, हाईकोर्ट ने पिता को सौंपी 13 माह के मासूम की कस्टडी

Allahabad Highcourt: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 13 महीने के मासूम बच्चे अक्षित पांडेय की कस्टडी उसके पिता विपिन कुमार पांडेय को सौंपने का आदेश दिया है। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप जैन ने कहा कि किसी भी बच्चे के विकास के लिए उसका अपने प्राकृतिक अभिभावक यानी पिता के साथ रहना उसके सर्वोत्तम हित में है। कोर्ट ने यह आदेश पिता की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई के बाद दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि बच्चे की मां की मृत्यु के बाद से वह अपने मौसा और मौसी के अवैध कब्जे में है।

मऊ जिले के मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, याचिकाकर्ता की पत्नी दीपिका पांडेय का निधन 10 फरवरी 2025 को एक असफल आईवीएफ प्रक्रिया के दौरान हो गया था। इसके बाद से ही बच्चा अपने ननिहाल पक्ष के पास था। निजी प्रतिवादियों (मौसा-मौसी) ने दलील दी थी कि आईवीएफ प्रक्रिया के दौरान हुई पत्नी की मृत्यु याचिकाकर्ता के आचरण पर सवाल उठाती है और बच्चा समय से पूर्व पैदा होने के कारण उसे विशेष देखभाल की आवश्यकता है, जो उसकी मौसी बेहतर तरीके से कर सकती है। हालांकि, अदालत ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि पत्नी की दुखद मृत्यु के लिए पिता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, विशेषकर तब जब उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित न हो।

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सुप्रीम कोर्ट के उदाहरणों का दिया हवाला

अदालत ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि नाबालिग की कस्टडी के मामलों में सबसे प्रमुख विचार 'बच्चे का कल्याण' होता है। कोर्ट ने कहा कि पिता आर्थिक रूप से सक्षम है और उसके पास बच्चे की देखभाल के लिए उचित व्यवस्था है। साथ ही, पिता की बहन सुनीता पांडेय, जो एक अनुभवी गृहिणी हैं, ने भी बच्चे के पालन-पोषण में सहयोग का आश्वासन दिया है। कोर्ट ने यह भी माना कि यदि इस कोमल आयु में बच्चे को पिता से दूर रखा गया, तो उनके बीच भावनात्मक लगाव कभी विकसित नहीं हो पाएगा, जो बच्चे के भविष्य के लिए हानिकारक होगा।

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बच्चे से मिलने के मौसा-मौसी को दिया रोजाना दो घंटे का समय

कोर्ट के आदेश के अनुपालन में बच्चे को पुलिस द्वारा न्यायालय में पेश किया गया, जहां उसे तुरंत उसके पिता को सौंप दिया गया। हालांकि, ननिहाल पक्ष के साथ बच्चे के भावनात्मक संबंधों को बनाए रखने के लिए न्यायालय ने मौसा-मौसी को प्रत्येक रविवार शाम 4:00 बजे से दो घंटे के लिए पिता के आवास पर मुलाकात करने (विजिटेशन राइट्स) की अनुमति दी है। इसी के साथ कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में बच्चे के कल्याण के विरुद्ध कोई परिस्थिति उत्पन्न होती है, तो प्रतिवादी कानून के अनुसार पुनः न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

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