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गाय की हत्या में रासुका को हाईकोर्ट ने सही ठहराया, अपने आदेश में जज ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोहत्या के आरोपी पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) को सही ठहराया है। कोर्ट ने आरोपी की याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की कि गोहत्या एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जो समाज के एक बड़े वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है।

Wed, 22 April 2026 06:55 AMYogesh Yadav प्रयागराज विधि संवाददाता
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गाय की हत्या में रासुका को हाईकोर्ट ने सही ठहराया, अपने आदेश में जज ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले साल होली के समय के जंगल में एक गाय और दो बछड़ों की हत्या करने के आरोपी की रासुका के तहत हिरासत को सही ठहराया है। यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने समीर की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर दिया है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि गाय की हत्या स्वतः ही तीव्र भावनाएं और हिंसक प्रतिक्रियाएं भड़काती है क्योंकि इससे समाज के एक बड़े वर्ग की धार्मिक भावनाओं को स्पष्ट रूप से ठेस पहुंचती है। कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे कृत्य के समाज में तत्काल और व्यापक परिणाम होते हैं, जिससे लगभग हमेशा बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठती है। यह हिंसा एक शांत समाज को नुकसान पहुंचाती है और जीवन की सामान्य गति को पूरी तरह से बाधित कर देती है।

खंडपीठ ने अपने आदेश में टिप्पणी की कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिनके प्रति समुदाय इतना संवेदनशील होता है कि यदि वे सामने आते हैं तो उनमें समाज में व्यापक उथल-पुथल मचाने की अंतर्निहित क्षमता होती है, जो जीवन की सामान्य गति को प्रभावित करती है। इनमें से एक मुद्दा गाय की हत्या है। कोर्ट ने यह देखते हुए कि इस कृत्य में जीवन की सामान्य गति को बाधित करने की क्षमता है और यह सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन करता है, हिरासत आदेश करने में हिरासत प्राधिकारी को पूरी तरह उचित पाया। प्राधिकारी ने यह सोचकर आदेश दिया कि जेल से रिहा होने पर याची सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए हानिकारक गतिविधियों में शामिल हो सकता है।

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इसी के साथ कोर्ट ने याची समीर की रासुका के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी। समीर की हिरासत का आदेश शामली के ज़िला मजिस्ट्रेट ने रासुका की धारा 3(3) के तहत दिया था, जिसे बाद में राज्य सरकार ने भी सही ठहराया था।

क्या है पूरा मामला

मामले के तथ्यों के अनुसार 15 मार्च 2025 को पुलिस को शामली ज़िले के एक गांव के खेत में गाय के बछड़ों के अवशेष मिले। उस समय होली का त्योहार था इसलिए इस घटना से हिंदू आबादी के बीच अशांति फैल गई, जिसके कारण शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए वहां अतिरिक्त बल तैनात करना पड़ा। पुलिस ने दावा किया कि स्थानीय ग्रामीणों और विभिन्न हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं की आक्रोशित भीड़ घटनास्थल पर जमा हो गई। उन्होंने इस कृत्य के लिए ज़िम्मेदार अपराधियों की तत्काल गिरफ़्तारी की मांग करते हुए नारेबाजी करते हुए सड़क जाम कर दी। इससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई। पुलिस को कई गांवों में डेरा डालना पड़ा ताकि घटना से बिगड़ी सार्वजनिक व्यवस्था को बहाल किया जा सके। पुलिस ने जांच के बाद याची और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्होंने जंगल में एक गाय और दो बछड़ों की हत्या करने की बात कबूल कर ली थी।

आरोपी की दलील

हाईकोर्ट के सामने याची की ओर से दलील दी गई कि उस पर लगाया गया आरोप छोटा-मोटा अपराध है, जिसकी सुनवाई मजिस्ट्रेट कर सकता है और यह साबित भी हो जाता है कि यह अपराध उसी ने किया तो भी यह कानून-व्यवस्था के उल्लंघन से ज़्यादा कुछ नहीं माना जाएगा। इसलिए यह तर्क दिया गया कि रासुका के तहत हिरासत में रखना अनुचित था।

राज्य सरकार ने क्या कहा

दूसरी ओर राज्य सरकार के वकील ने हाईकोर्ट ने 2002 के एक आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि गोहत्या सांप्रदायिक तनाव भड़काती है, वैमनस्य पैदा करती है और ऐसी स्थिति उत्पन्न करती है जिससे सार्वजनिक व्यवस्था भंग हो जाती है।

कोर्ट ने इस तर्क पर भी विचार किया कि क्या जेल में बंद किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत में रखा जा सकता है। इसने कमरुन्निशा बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए कहा कि अधिकारी ऐसे व्यक्ति के ख़िलाफ़ हिरासत का आदेश वैध रूप से कर सकता है, यदि इस बात की वास्तविक संभावना हो कि उसे ज़मानत पर रिहा कर दिया जाएगा और ऐसे विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद हों जिनसे यह पता चलता हो कि रिहा होने पर वह सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक गतिविधियों में शामिल हो सकता है। हाईकोर्ट ने याची के इस तर्क को भी ख़ारिज किया कि राज्य सरकार और सलाहकार बोर्ड ने उसकी हिरासत के ख़िलाफ़ उसके अभ्यावेदन पर निर्णय लेने में अत्यधिक विलंब किया।

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