आगरा के 'कैलाश' को थैंक्यू कहने पहुंचे CEC ज्ञानेश कुमार, डबल शिवलिंग वाला मंदिर क्यों खास
देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार आगरा के कैलाश महादेव का दर्शन करने पहुंचे हैं। उन्होंने कहा कि पांच राज्यों के सफल चुनाव के बाद कैलाश का आशीर्वाद लेने आए हैं।

देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार आगरा में कैलाश महादेव का दर्शन-पूजन करने और उनका आशीर्वाद लेने पहुंचे हैं। मंगलवार की सुबह पत्नी अनुराधा के साथ ज्ञानेश कुमार ने सिकंदरा में स्थित कैलाश महादेव का विधिवत पूजन किया और मंदिर से निकलने के बाद मीडिया से दिल की इच्छा भी साझा की। ज्ञानेश कुमार ने कहा कि पांच प्रदेशों के सफल चुनाव के बाद कैलाश मंदिर में महादेव का दर्शन करने और उनका आशीर्वाद लेने आए हैं। सोमवार को आगरा पहुंचे ज्ञानेश कुमार ने इससे पहले विजय नगर स्थित अपने पुश्तैनी घर भी गए और माता-पिता से मुलाकात कर उनका भी आशीर्वाद लिया। ज्ञानेश कुमार जिस कैलाश महादेव मंदिर में पहुंचे हैं उसे त्रेतायुग का मंदिर कहा जाता है। इसकी खासियत यह भी है कि यहां दो शिवलिंग हैं।
शुद्ध मतदाता सूची ही पारदर्शी चुनाव की आधारशीला
ज्ञानेश कुमार ने कैलाश महादेव का आशीर्वाद लेने के बाद मीडिया से बातचीत में कहा कि कहा कि सभी मतदाता अपना वोट जरूर बनवाएं और चुनाव में मतदान जरूर करें। शुद्ध मतदाता सूची ही पारदर्शी चुनाव की आधारशीला है। हम सभी को चुनावों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए।
यूपी में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव पहली प्राथमिकता है। यह तभी संभव है जब मतदाता सूची दुरुस्त हों। उत्तर प्रदेश में 32 साल बाद विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (SIR) चलाकर मतदाता सूची की कमियों को दूर किया गया है। यह एक अच्छी पहल थी, जिससे डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम हट गए हैं।
यमुना तट के किनारे अमूल्य खजाना है कैलाश मंदिर
आगरा शहर से 8 किलोमीटर दूर सिकंदरा में कैलाश महादेव मंदिर स्थापित है। यह भारतीय संस्कृति और धार्मिक विरासत का एक अनमोल रत्न है। यमुना नदी के तट पर विराजमान यह मंदिर न केवल अपनी प्राचीनता बल्कि अद्भुत कथाओं और अनूठी विशेषताओं के लिए भी जाना जाता है। इसका इतिहास लगभग 5000 वर्ष पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि पवित्र स्थल की स्थापना स्वयं भगवान परशुराम और उनके पिता ऋषि जमदग्नि ने की थी।
त्रेता युग से जुड़ा है इतिहास
त्रेता युग में एक रोचक कथा इस मंदिर के इतिहास से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि परशुराम और उनके पिता ऋषि जमदग्नि कैलाश पर्वत पर गए और वहां भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी अटूट भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर, भगवान शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा।
दोनों भक्तों ने भगवान शिव से उनके साथ रहने का वरदान मांगा। इस पर भगवान शिव ने उन्हें एक-एक शिवलिंग उपहार स्वरूप प्रदान किया। जब वे अपने आश्रम रेणुका की ओर लौट रहे थे तो मार्ग में रुके। अगली सुबह जब वे शिवलिंगों की पूजा करने पहुंचे तो देखा कि वे जुड़वां ज्योतिर्लिंग पृथ्वी में समा गए थे।
जब उन्होंने शिवलिंगों को उठाने का प्रयास किया तो आकाशवाणी हुई कि अब यह स्थान कैलाश धाम के नाम से जाना जाएगा। इस घटना के बाद से यह पवित्र स्थल कैलाश के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
दो शिवलिंग यहां की खासियत
कैलाश महादेव मंदिर की विशेषता यह है कि यहां दो शिवलिंग स्थापित हैं। इसे दुर्लभ माना जाता है। भारत के केवल कुछ ही मंदिरों में ऐसा देखने को मिलता है। यमुना के किनारे होने से आध्यात्मिक शांति और प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव एक साथ मिलता है।
यहां आने वाले श्रद्धालु न केवल पूजा-अर्चना करते हैं, बल्कि आत्म-चिंतन और ध्यान के माध्यम से आंतरिक शांति की खोज भी करते हैं। मंदिर का शांत वातावरण और यमुना नदी की निकटता इसे आध्यात्मिक साधना के लिए एक आदर्श स्थान बनाते हैं।




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